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UP: अब शरीर खुद कर रहा है अपने आपको बीमार, हो रहे हैं ऑटो इम्यून रोग…डॉक्टर बोले- एहतियात कर बचें, पढें डिटेल

Sun, 23 Mar 2025 10:47 AM IST
हिमांशु अवस्थी रजा शास्त्री, अमर उजाला, कानपुर
रजा शास्त्री, अमर उजाला, कानपुर Published by: हिमांशु अवस्थी Updated Sun, 23 Mar 2025 10:47 AM IST
सार

Kanpur News: डॉक्टर्स का कहना है कि एहतियात से मेटाबोलिक रोगों से बचा जा सकता है। अगर हो गए, तो जिंदगी भर चलते हैं। इसके साथ गंभीर भी होते जाते हैं। एचआईवी, हेपेटाइटिस बी सरीखे वायरल संक्रमण को छोड़कर ज्यादातर बैक्टीरियल और वायरल संक्रमण को दवाओं से बिल्कुल ठीक किया जा सकता है।

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Now body is making itself sick auto immune diseases are occurring doctors said take precautions and stay safe
ऑटो इम्यून रोग - फोटो : freepik.com

विस्तार

लोगों को अब बैक्टीरिया, वायरस के बजाय उनकी शरीर के अंदर की रासायनिक प्रतिक्रियाएं अधिक बीमार कर रही हैं। शरीर के अंदर की बिगड़ी गतिविधि ही गंभीर बीमारी बन रही है। डायबिटीज, हाइपरटेंशन, यूरिक एसिड, फैटी लिवर, गुर्दा रोग, थायरॉइड, ऑटो इम्यून रोग समेत गैर संचारी बीमारियां बढ़ गई हैं। अस्पतालों में आने वाले रोगियों के आंकड़ों की पड़ताल से पता चला कि अब गैर संचारी रोगों के रोगियों की संख्या 60 फीसदी हो गई है। 40 फीसदी रोगी संचारी रोगों के होते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बिगड़ी लाइफ स्टाइल और खानपान के साथ बढ़ते तनाव ने रोगों का आंकड़ा बदल दिया है।

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हैलट, उर्सला, निजी अस्पतालों और क्लीनिकों में बैक्टीरियल वायरल संक्रमण की तुलना में मेटाबोलिक रोगों के रोगी अधिक आ रहे हैं। यह संख्या बढ़ती जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि मेटाबोलिक रोग हो गए तो फिर तकरीबन जिंदगी भर चलते हैं। बैक्टीरियल और वायरल संक्रमण दवा का कोर्स पूरा करने पर बिल्कुल ठीक हो जाते हैं। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन के प्रोफेसर डॉ. विशाल कुमार गुप्ता कहते हैं कि 10 साल पहले डायबिटीज क्लीनिक में मुश्किल से रोगी आते थे, लेकिन अब इनकी संख्या औसत 100 हो गई है। मेटाबोलिक रोग तेजी से बढ़ रहे हैं।

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शरीर में ऑटो इम्यून रोग हो रहे हैं
मेडिकल कॉलेज की पूर्व प्राचार्य डॉ. आरती लालचंदानी का कहना है कि एक मेटाबोलिक रोग होने पर दूसरा होने लगता है। मसलन डायबिटीज के बाद न्यूरो, गुर्दा, लिवर आदि रोग अपने-आप पनप जाते हैं। हाईपरटेंशन गुर्दा फेल, हार्ट अटैक, ब्रेन स्टोक की स्थिति में ले जाता है। मेटाबोलिक रोग शरीर में गुच्छा बना लेते हैं, इसे सिंड्रोम एक्स कहते हैं। इसके अलावा शरीर की रासायनिक प्रतिक्रियाओं की वजह से शरीर में ऑटो इम्यून रोग हो रहे हैं। इनमें शरीर की एंटी बॉडीज अपने ही अंगों पर हमला कर क्षतिग्रस्त कर देती हैं। इसके अलावा नसों की खराबी और सांस तंत्र की खराबी इन्हीं मेटाबोलिक रोगों के दुष्प्रभाव से होती है।

एहतियात कर बचें, हो गए तो ठीक नहीं होते मेटाबोलिक रोग
मेडिसिन के प्रोफेसर डॉ. जेएस कुशवाहा का कहना है कि एहतियात से मेटाबोलिक रोगों से बचा जा सकता है। अगर हो गए, तो जिंदगी भर चलते हैं। इसके साथ गंभीर भी होते जाते हैं। एचआईवी, हेपेटाइटिस बी सरीखे वायरल संक्रमण को छोड़कर ज्यादातर बैक्टीरियल और वायरल संक्रमण को दवाओं से बिल्कुल ठीक किया जा सकता है। 10 साल में मेटाबोलिक रोगों की संख्या संचारी रोगों को पार कर गई। अब संचारी रोग 40 फीसदी और गैर संचारी 60 फीसदी है। यह फर्क और बढ़ता जाएगा।

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मेटाबोलिक रोगों की दवाओं की खपत 60 फीसदी
फुटकर दवा व्यापार मंडल के चेयरमैन संजय मेहरोत्रा ने बताया कि मेटाबोलिक दवाओं की खपत बढ़ रही है। मेटोबोलिक रोग संबंधी दवाओं की खपत कुल की 60 फीसदी है। 40 फीसदी एंटीबाॅयोटिक, एंटी वायरल आदि दवाओं के रोगी आते हैं। 10 साल में यह बदलाव अधिक देखने को मिल रहा है।

शहर के रोगियों का आंकड़ा

  • शहर में संचालित अस्पतालों, क्लीनिकों की संख्या-10 हजार।
  • प्रतिदिन ओपीडी में आते हैं औसत 03 लाख रोगी।
  • मेटाबोलिक रोगों के औसत रोगी एक लाख 80 हजार।
  • संक्रमण से संबंधित रोगों के रोगी एक लाख 20 हजार रोगी।

(यह आंकड़ा नर्सिंगहोम एसोसिएशन, निजी क्लीनिकों और सरकारी अस्पतालों में आने वाले रोगियों के आकलन पर आधारित है)

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