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गठबंधन का ब्राह्मण मोह: कुछ इस तरह बिछाई जा रही चुनावी बिसात
Thu, 14 Mar 2019 04:21 PM IST
राजेश सैनी
प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
Published by: राजेश सैनी
Updated Thu, 14 Mar 2019 04:21 PM IST
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मायावती-अखिलेश (फाइल फोटो)
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ब्राह्मण और दलित के गठजोड़ की बसपा की पुरानी सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला इस लोकसभा चुनाव में भी आजमाया जाएगा। फर्क सिर्फ इतना रहेगा कि इस बार सपा का मुस्लिम और यादव फैक्टर भी साथ साथ चलेगा।
इसी वजह से कानपुर के मिजाज को ध्यान में रखते हुए सपा-बसपा गठबंधन यहां से ब्राह्मण प्रत्याशी पर दांव खेलने की तैयारी कर चुका है। हालांकि यह सीट सपा के खाते में है, लेकिन प्रत्याशी की घोषणा बसपा से चर्चा के बाद ही होगी।
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इसी वजह से कानपुर के मिजाज को ध्यान में रखते हुए सपा-बसपा गठबंधन यहां से ब्राह्मण प्रत्याशी पर दांव खेलने की तैयारी कर चुका है। हालांकि यह सीट सपा के खाते में है, लेकिन प्रत्याशी की घोषणा बसपा से चर्चा के बाद ही होगी।
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गठबंधन पार्टियों के पदाधिकारी बताते हैं कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस मुस्लिमों का वोट काटती है। लेकिन यह बात प्रत्याशी के चयन पर निर्भर करती है। यदि मुस्लिमों का वोट कटता है तो भी काफी मुसलमान सपा के पक्ष में रहते हैं।
इसी तरह यादवों का परंपरागत वोट सपा के पक्ष में जाता है, लेकिन दलित बसपा और भाजपा में बंटता है। इस वजह से सवर्णों का वोट काटने के लिए गठबंधन पार्टियां शहर में ब्राह्मण प्रत्याशी उतारने का मन बना चुकी है।
इसी तरह यादवों का परंपरागत वोट सपा के पक्ष में जाता है, लेकिन दलित बसपा और भाजपा में बंटता है। इस वजह से सवर्णों का वोट काटने के लिए गठबंधन पार्टियां शहर में ब्राह्मण प्रत्याशी उतारने का मन बना चुकी है।
इस तरह से ब्राह्मण, दलित और मुसलमान की तिकड़ी के जरिए गठबंधन पार्टियों ने भाजपा को टक्कर देने की रणनीति बनाई है। यादवों का वोट इनके लिए बोनस का काम करेगा। माना जा रहा है कि 18 मार्च से पहले सपा की सूची में कानपुर के प्रत्याशी की घोषणा हो जाएगी।
कानपुर में मतदाताओं का जातिगत आंकड़ा
दलित तीन लाख 50 हजार (लगभग)
मुसलिम तीन लाख
ब्राह्मण दो लाख 50 हजार
ठाकुर एक लाख 50 हजार
वैश्य एक लाख 50 हजार
पिछड़ा पांच लाख
अन्य दो लाख
कानपुर में मतदाताओं का जातिगत आंकड़ा
दलित तीन लाख 50 हजार (लगभग)
मुसलिम तीन लाख
ब्राह्मण दो लाख 50 हजार
ठाकुर एक लाख 50 हजार
वैश्य एक लाख 50 हजार
पिछड़ा पांच लाख
अन्य दो लाख