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ओशो और हिंदू धर्म को लेकर मोरारी बापू ने दिया ये बड़ा बयान, आप भी जानिए ऐसा क्या कह दिया
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Updated Fri, 03 Aug 2018 08:22 AM IST
सार
- समाज को पाखंडियों ने घेरा, धर्म के नाम पर डराते
- सीएसए कृषि विश्वविद्यालय में पांचवें दिन मोरारी बापू ने रामकथा का किया बखान
- कहा, धर्म मनुष्य का कवच है, कमजोरी नहीं, अधूरे ज्ञान से व्यक्ति का नाश होता है
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संत और कथा वाचक मोरारी बापू का कहना है कि 'समाज को पाखंडियों ने घेर रखा है। धर्म के नाम पर डराया जा रहा है। ये करो, वो करो। ऐसे पूजा मत करो, वैसे पूजा मत करो। मैं तो कहता हूं पूजा ही क्यों करो, बस एक बार सच्चे मन से राम का नाम ले लो तुम्हारे सारे संकट दूर हो जाएंगे।'
कानपुर पहुंचे मोरारी बापू
मोरारी बापू ने कहा कि धर्म मनुष्य का आवरण होता है। यह कवच होता है, कमजोरी नहीं। धर्म पूर्ण होता है। इसे किसी की आवश्यकता नहीं होती है। अधूरे ज्ञान और जानकारी से व्यक्ति का नाश होता है। यदि जानकारी आप किसी के सामने बांट रहे हैं तो ज्यादा से ज्यादा वो व्यक्ति आपकी प्रशंसा ही कर सकता है। लोगों को जानकारी की नहीं जागरुकता की जरूरत है। मोरारी बापू ने कहा कि गुरु का स्मरण करने के लिए तो हरि का ध्यान भी त्याग देना चाहिए। गुरु की कृपा से ही शिष्य को हरि की प्राप्ति होती है। इसलिए गुरु हरि से भी बड़ा होता है। प्राचाीन काल में छात्र गुरु आश्रम में शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाते थे। प्रभु श्री राम भी गुरु वशिष्ठ के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने गए थे। ‘गुरु ग्रह गए पढ़न रघुराई, अल्पकाल विद्या सब पाई।’ यह गुरु आश्रम का ही प्रताप है जिससे राम ने बहुत थोड़े से ही समय में शिक्षा प्राप्त कर ली। व्यक्ति को बिना गुरु की कृपा के कुछ भी नहीं प्राप्त हो सकता है। गुरु के घर में की गई साधना अखंड होती हे।
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गृहस्थ जीवन में व्यक्ति के पास धर्म, अर्थ, काम होता है पर गुरु के घर में सिर्फ प्रेम होता है। गुरु के घर के आंगन के चक्कर लगाने से ज्ञान की प्राप्ति होती है। गुरु के घर जाने से विवेक प्राप्त होता है। शिष्य का वैराग्य दृढ़ होता है। विचारों में शालीनता आती है। मन से मलिनता दूर होती है। महाभारत के द्रोपदी स्वयंवर का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि जब लाक्षागृह में पांडवो को जलाया गया तो सभी को यही लग रहा था कि पांडवो की मौत हो गई है। कृष्ण को पता था कि पांडव जीवित हैं। जब द्रोपदी का स्वयंवर हुआ तो वहां पांडवों को छोड़कर सभी मौजूद थे। उन्होंने बताया कि द्रोपदी को पता था कि कृष्ण के प्राण अर्जुन में बसते हैं इसलिए अर्जुन से विवाह करने का अर्थ होगा कृष्ण के प्राणों से विवाह करना।
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कानपुर पहुंचे मोरारी बापू
बापू ने बताया कि वक्ता और श्रोता में मन का विवेक होना चाहिए। दोनो का मन डोलना नहीं चाहिए। पहला होता है तन का विवेक। श्रोता और वक्ता दोनो में तन का विवेक होना चाहिए। अर्थात शरीर से ऐसी कोई भी अभद्र चेष्टा न हो जो गलत दिशा में ले जाए। इसके अलावा वचन का विवेक और नयन यानी आंखों का विवेक भी होना चाहिए। वक्ता और श्रोता दोनों की आंखे शिकारी नहीं पुजारी की होनी चाहिए। वक्ता में चयन का विवेक होना चाहिए। चयन से आशय है किस वक्त, किस समय, किस तरह के विषय पर वार्ता करनी है। वक्ता को पता होना चाहिए किसके सामने कैसी बात करनी है। सभी के सामने एक जैसी बात नहीं की जा सकती है।
आगे की स्लाइड में पढ़ेंः- एक मुख से हरि भजन और गाली कैसे ...
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कानपुर पहुंचे मोरारी बापू
वंदे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम् इसका अर्थ है जिसकी शरण में जाकर दूज का चंद्रमा जो टेढ़ा होता है समस्त संसार में पूज्यनीय हो गया है मैं उन भगवान शंकर के ज्ञान स्वरूप गुरुदेव की नित्य वंदना करता हूं। उन्होंने कहा कि तुलसी दास जी ने स्वामी नरहरि स्वामी के नर स्वरूप में शंकर जी को प्राप्त किया है। गुरु तो शिव का स्वरूप होता है। शिव एक साक्षात गुरु है और वो गुरु रूपी शिव प्रभु राम के नाम में डूबे रहते हैं। बापू ने कहा जिस मुंह से लोग हरि भजन करते हैं उसी मुंह से गाली कैसे देते हैं। इन्हें पूर्व जन्म का पाप ही कहा जाएगा।
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