सत्ता संग्राम 2019: डिंपल के सामने हैट्रिक बनाने की चुनौती, मुलायम परिवार की बादशाहत रहेगी कायम
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इत्र नगरी कन्नौज सपा और भाजपा के लिए प्रतिष्ठा वाली सीट बन गई है। सपा प्रत्याशी डिंपल यादव के सामने जीत की हैट्रिक लगाकर मुलायम सिंह यादव परिवार की बादशाहत बरकरार रखने की चुनौती है, जबकि भाजपा प्रत्याशी सुब्रत पाठक दो बार की हार का बदला लेने को आतुर दिख रहे हैं। डिंपल जीतती हैं तो तीन बार लगातार इस सीट पर जीत दर्ज करने वाली पहली उम्मीदवार होंगी। जबकि सुब्रत की जीत से 1998 से लगातार सपा का गढ़ बनी कन्नौज में सेंध लगेगी, जो इतिहास रचने से कम नहीं होगा। कांग्रेस ने लगातार चौथे चुनाव में प्रत्याशी नहीं उतारा है। 1998 से इस सीट पर यादव परिवार का ही कब्जा है। मुलायम से लेकर अखिलेश और पुत्रवधू डिंपल यादव तक जीत चुकी हैं।
चुनाव से पहले एक-दूसरे के प्रमुख नेताओं को जोड़ा: पिछले चुनाव में मोदी लहर में भी सपा का कब्जा बरकरार रहा था। हालांकि टक्कर कांटे की हुई थी। लेकिन इस बार समीकरण कुछ बदले हुए हैं। सपा और बसपा गठबंधन से मुस्लिम और यादव के बाद दलित वोट भी डिंपल को मिलने उम्मीद जगी है। वहीं, भाजपा ब्राह्मण, ठाकुर और पिछड़ी जाति के वोट बैंक को अपने पक्ष में मान रही है। अनुसूचित जाति के वोट बैंक में सेंधमारी भी हो रही है।
भाजपा ने सपा खेमे को झटका देकर बैस ठाकुर को साधने के लिए मजबूत नेता पूर्व विधायक अरविंद प्रताप सिंह को अपने खेमे में शामिल कर लिया। इसके बाद रसूलाबाद के पूर्व ब्लाॅक प्रमुख कुलदीप यादव ने भी भाजपा की सदस्यता ले ली है।
कुलदीप के भाजपा में आने से पार्टी को यादव वोट भी मिलने की उम्मीद जगी है। उधर, सपा ने भी भाजपा को झटका दिया है। पिछले दिनों पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की जनसभा में भाजपा से पूर्व एमएलसी डॉ. रामबख्स सिंह ने पत्नी पूर्व विधायक रामनंदिनी वर्मा और बेटे आलोक वर्मा के साथ सपा की सदस्यता ले ली। सपा ने अपने इस दांव से लोधी वोट बैंक पर निशाना साध लिया। इसी सीट में करीब दो लाख लोधी मतदाता हैं।
तीन लाख से ज्यादा वोटों से जीते थे अखिलेश
कन्नौज लोकसभा सीट में पांच विधानसभा सीटें आती हैं। इनमें से एक पर सपा और बाकी सीटों पर भाजपा का कब्जा है। अखिलेश और डिंपल दोनों ने उपचुनाव से ही कन्नौज में शुरुआत की। अखिलेश ने 2000 और डिंपल ने 2012 में हुए उपचुनाव में पहली बार जीत दर्ज की थी। अखिलेश यादव ने बसपा प्रत्याशी राजेश सिंह को 3,07,373 मतों से परास्त किया था।
सीट पर पहले सांसद थे लोहिया
यहां हुए 15 लोकसभा चुनावों में भाजपा को मात्र एक बार जीत मिली है। 1996 में भाजपा प्रत्याशी चंद्रभूषण सिंह विजयी हुए थे। 1967 में बनी इस सीट पर पहले सांसद डॉ. राममनोहर लोहिया बने थे। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में लोहिया को 472 वोटों से जीत मिली थी।
पिछड़ाें का रुख महत्वपूर्ण
होटल संचालक बंटी शुक्ला कहते हैं कि भाजपा और सपा में कड़ी टक्कर दिख रही है। देवेश सिंह का कहना है कि चुनावी ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है। तिर्वा में विनीत को भाजपा मजबूत दिख रही है। पिछड़ा वर्ग जिसका साथ देगा, नतीजे उसी के पक्ष में होंगे।
मंडी तक नहीं बन पाई
तालग्राम के अमोलर में राजेंद्र, प्रेमकुमार, रंजीत, सर्वेश का कहना है कि हर बार वादे होते हैं लेकिन जिले में आलू किसानों के लिए एक मंडी तक नहीं है। सपा सरकार में मंडी निर्माण तो शुरू हुआ लेकिन आजतक अधूरा है। किसान आज भी कानपुर की मंडियों में उपज बेचने को मजबूर हैं।