समीक्षाः माया-अखिलेश अपनी जाति में रह गए, इसलिए मुंह की खाई

Dushyant Sharma हिमांशु मिश्र, कानपुर Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Fri, 24 May 2019 04:21 AM IST
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अखिलेश यादव और मायावती
अखिलेश यादव और मायावती - फोटो : अमर उजाला

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दलित और पिछड़े वर्ग के बुद्धिजीवियों का मानना है कि लोकसभा चुनाव के नतीजों से साफ हो गया है कि दलितों और पिछड़ों ने प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन को नकार दिया है। इसका मुख्य कारण है कि सपा-बसपा के मुखिया केवल अपनी-अपनी जाति के नेता बनकर रह गए हैं। 
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छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) के सीनियर प्रोफेसर और दलित चिंतक डॉ. मुनीश कुमार बताते हैं कि मायावती और अखिलेश अपनी पार्टी का मूल मंत्र भूल चुके हैं। मायावती जो पहले बहुजन समाज की नेता हुआ करती थीं, वो अब केवल जाटव जाति की नेता बनकर रह गई हैं वहीं अखिलेश जिनको पिछड़ों का नेतृत्व करना चाहिए था, वह केवल यादव जाति के नेता बनकर रह गए हैं। इसका फायदा भारतीय जनता पार्टी ने उठाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुजन और पिछड़ों की सभी जातियों को पार्टी से जोड़ा।


कभी बसपा की थीं ये जातियां, अब भाजपा से जुड़ीं

प्रो. मुनीश के मुताबिक सोनकर, पासी, वाल्मिकी, कोरी, अगरिया, बधिक, बजनिया, बालाहर, बलाई, घसिया, हरी, हाबुरा, करवल जैसी दलित जातियां पहले बसपा के साथ होती थीं। इनकी संख्या कानपुर के अलावा पूरे यूपी में है। लेकिन अब ये सभी भाजपा के साथ जुड़ चुकी हैं। यहां तक कि मायावती जिस जाटव जाति से आती हैं उनमें भी 20 से 30 प्रतिशत शिक्षित लोगों का रुझान भाजपा की तरफ हुआ है। इसका कारण है कि मायावती खुद को स्थापित करने के चक्कर में इन जातियों से आने वाले अन्य नेताओं को दबाने में जुट गईं। जिन्हें भाजपा ने अपने साथ मिला लिया।

सपा काडर से खिसक गईं पिछड़ी जातियां

प्रो. मुनीश बताते हैं कि उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान प्रदेश के कई जिलों का भ्रमण किया। दलित-पिछड़ों के इलाकों में लोगों से बातचीत की। इसमें सामने आया कि कभी समाजवादी पार्टी के साथ मजबूती से खड़े रहने वाली पिछड़ी जातियां अब भाजपा के साथ जुड़ने लगी हैं। इनमें कुर्मी, निषाद, बिंद, मल्लाह, कश्यप, भर, धीवर, बाथम, मछुआरा, प्रजापति, राजभर, कहार, मांझी, तुरहा, गौड़, धीमर आदि जातियां शामिल हैं। इन जातियों से जुड़े ज्यादातर लोगों को लगने लगा है कि समाजवादी पार्टी केवल यादवों की पार्टी बनकर रह गई है।

राष्ट्रवाद के मुद्दे पर जाटव, यादव भी मोदी के साथ
प्रो. मुनीश के मुताबिक जातिगत समीकरणों को प्रधानमंत्री मोदी के राष्ट्रवाद के नारे ने भी नुकसान पहुंचाया। राष्ट्रवाद के नाम पर ही मायावती की जाति जाटव और अखिलेश की जाति यादव से जुड़े बड़ी संख्या में शिक्षित लोग मोदी को अपना नेता मानने लगे हैं।

मोदी की योजनाओं का भी मिला लाभ

डीएवी में केमिस्ट्री विभाग के सीनियर प्रोफेसर और दलित चिंतक डॉ. डीपी राव भी स्वीकार करते हैं कि गैर जाटव और गैर यादव जातियां भाजपा से जुड़ चुकी हैं। दलित और पिछड़े वर्ग में बड़ी संख्या में लोगों को मोदी की कई योजनाओं का लाभ मिला। मसलन उज्जवला गैस योजना, आयुष्मान योजना, आवास योजना आदि का लाभ मिला और इसका फायदा भाजपा को मिला।

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