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लॉकडाउन के बाद नौकरी गंवाई, गिरते-पड़ते पहुंचे घर, अब जैसे-तैसे गुजर-बसर
Mon, 11 May 2020 11:28 AM IST
शिखा पांडेय
रजत यादव, अमर उजाला, कानपुर
रजत यादव, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Mon, 11 May 2020 11:28 AM IST
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चौबेपुर क्षेत्र के मोहनपुर व पेम गांव लौटे मजदूरों का बुरा हाल
- फोटो : अमर उजाला
एक बार का वेतन भी नहीं बना था कि लॉकडाउन हो गया। जो कुछ घर से लेकर गए, वह भी खत्म हो गया। खाने तक के लाले हो गए तो पैदल ही घरों को चल पड़े। कोई 500 तो कोई हजार किलोमीटर पैदल चलकर घर पहुंचा। मुसीबतें यहां भी कम न हुईं, दिशानिर्देशों के अनुसार 14 दिन के लिए घर से दूर क्वारंटीन होना पड़ा। किसी ने खेत में मड़ैया बनाकर दिन गुजारे तो किसी ने गांव के बाहर किसी स्कूल में। पढ़ें लॉकडाउन के मारे ऐसे ही मजबूर लोगों की कहानी...
घर पहुंचा लाठी-डंडे लेकर आ गए ग्रामीण
एक साल से जयपुर में प्लाई बोर्ड फैक्ट्री में काम करता था। लॉकडाउन के बाद कंपनी बंद हो गई। एक सप्ताह बाद खाने पीने की परेशानी होने लगी। साथियों के साथ यहां से निकलने की तैयारी कर ली। कोई वाहन न मिलने के कारण पूरा एक दिन पैदल चले। अगले दिन कुछ दूरी ट्रक पर बैठकर तय की। इसके बाद फिर पैदल चले। रास्ते में खाने का भी कोई इंतजाम नहीं था, केवल बिस्किट खाकर और पानी पीकर सफर तय किया। पांच दिन बाद शाम सात बजे गांव पहुंचा। सूचना मिलते ही गांव के लोग लाठी-डंडा लेकर घर आ गए। गांव के बाहर जाने को कहने लगे। इसके बाद पुलिस ने गांव के बाहर स्कूल में 14 दिन के लिए क्वारंटीन कर दिया। अब घर में हूं। घर के कामों में हाथ बंटा रहा हूं। - आकाश कुमार, मोहनपुर, चौबेपुर ब्लॉक
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घर पहुंचा लाठी-डंडे लेकर आ गए ग्रामीण
एक साल से जयपुर में प्लाई बोर्ड फैक्ट्री में काम करता था। लॉकडाउन के बाद कंपनी बंद हो गई। एक सप्ताह बाद खाने पीने की परेशानी होने लगी। साथियों के साथ यहां से निकलने की तैयारी कर ली। कोई वाहन न मिलने के कारण पूरा एक दिन पैदल चले। अगले दिन कुछ दूरी ट्रक पर बैठकर तय की। इसके बाद फिर पैदल चले। रास्ते में खाने का भी कोई इंतजाम नहीं था, केवल बिस्किट खाकर और पानी पीकर सफर तय किया। पांच दिन बाद शाम सात बजे गांव पहुंचा। सूचना मिलते ही गांव के लोग लाठी-डंडा लेकर घर आ गए। गांव के बाहर जाने को कहने लगे। इसके बाद पुलिस ने गांव के बाहर स्कूल में 14 दिन के लिए क्वारंटीन कर दिया। अब घर में हूं। घर के कामों में हाथ बंटा रहा हूं। - आकाश कुमार, मोहनपुर, चौबेपुर ब्लॉक
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क्वारंटीन के बाद भी पास में नहीं बैठते लोग
गांव के मित्र के साथ जयपुर की कपड़ा फैक्ट्री में नौकरी करने के लिए 15 मार्च को निकला था। कुछ कमा भी नहीं पाए और लॉकडाउन हो गया। जो घर से पैसे ले गए थे, वह भी खर्च हो गए। पांच दिन पैदल सफर तय करने के बाद रात में घर पहुंच पाया था। सुबह पड़ोसियों ने देखा तो गांव के बाहर जाने की बात कहने लगे। थोड़ी देर बाद घर के बाहर पुलिस पहुंच गई और गांव के बाहर स्कूल में क्वारंटीन कर दिया। दो सप्ताह बाद जब घर पहुंचा तो गांव के लोग पास में बैठने से कतराते हैं। कोई घर के बाहर नहीं बैठने देता है। अब दोबारा बाहर कहीं नौकरी करने नहीं जाऊंगा। - रितिक, मोहनपुर, चौबेपुर ब्लॉक
खेत में मड़ैया बनाकर खुद को किया क्वारंटीन
10 मार्च को घर से लखनऊ एक मार्केटिंग कंपनी में नौकरी करने गया था। दो हफ्ते बाद ही लॉकडाउन हो गया। करीब 40 दिन किराये के कमरे में काटे। अपने पैसों से ही खाने पीने की व्यवस्था करते रहे। जब पैसे खत्म हो गए तो घर लौटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। एक मई की सुबह निकला। लखनऊ से उन्नाव पैदल पहुंचा। यहां एक वाहन में लिफ्ट मिली, महज दो किलोमीटर ले जाने के बाद उसने भी छोड़ दिया। शाम को किसी तरह घर पहुंचा। लोगों का विरोध देखकर खेत में ही मड़ैया बनाकर खुद को क्वारंटीन कर लिया। यहीं पर किताब पढ़कर, टमाटर की खेती की देखमाल करके अपना समय काट रहा हूं। - सुरजीत कुशवाहा, मोहनपुर, चौबेपुर ब्लॉक
परिवार की खातिर खुद को उपस्वास्थ्य केंद्र में कर लिया क्वारंटीन
पुणे में मोटर पार्ट्स बनने की फैक्ट्री में काम करने 20 मार्च को गया था। काम मिल भी नहीं पाया था कि लॉकडाउन हो गया। घर आने का कोई साधन नहीं था। किसी तरह से लगभग एक माह तक वहीं पर समय काटा। जेब में पैसे भी नहीं बचे। दो दिन जब खाने का कोई इंतजाम नहीं हुआ तो पैदल ही घर के लिए निकल पड़ा। 500 किलोमीटर पैदल सफर तय किया। कुछ वाहनों की भी मदद ली। 10 दिन में गांव पहुंच पाया। परिवार के लोगों की सुरक्षा के लिए खुद ही गांव के बाहर उपस्वास्थ्य केंद्र में क्वारंटीन हो गया। गांव के लोग गेट से ही मिलकर लौट जाते हैं। घर से ही खाना आता है। अभी तक अपने परिजनों से ठीक से मिल भी नहीं पाया हूं। - श्रीकांत गौतम, पेम, चौबेपुर ब्लॉक
गांव के मित्र के साथ जयपुर की कपड़ा फैक्ट्री में नौकरी करने के लिए 15 मार्च को निकला था। कुछ कमा भी नहीं पाए और लॉकडाउन हो गया। जो घर से पैसे ले गए थे, वह भी खर्च हो गए। पांच दिन पैदल सफर तय करने के बाद रात में घर पहुंच पाया था। सुबह पड़ोसियों ने देखा तो गांव के बाहर जाने की बात कहने लगे। थोड़ी देर बाद घर के बाहर पुलिस पहुंच गई और गांव के बाहर स्कूल में क्वारंटीन कर दिया। दो सप्ताह बाद जब घर पहुंचा तो गांव के लोग पास में बैठने से कतराते हैं। कोई घर के बाहर नहीं बैठने देता है। अब दोबारा बाहर कहीं नौकरी करने नहीं जाऊंगा। - रितिक, मोहनपुर, चौबेपुर ब्लॉक
खेत में मड़ैया बनाकर खुद को किया क्वारंटीन
10 मार्च को घर से लखनऊ एक मार्केटिंग कंपनी में नौकरी करने गया था। दो हफ्ते बाद ही लॉकडाउन हो गया। करीब 40 दिन किराये के कमरे में काटे। अपने पैसों से ही खाने पीने की व्यवस्था करते रहे। जब पैसे खत्म हो गए तो घर लौटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। एक मई की सुबह निकला। लखनऊ से उन्नाव पैदल पहुंचा। यहां एक वाहन में लिफ्ट मिली, महज दो किलोमीटर ले जाने के बाद उसने भी छोड़ दिया। शाम को किसी तरह घर पहुंचा। लोगों का विरोध देखकर खेत में ही मड़ैया बनाकर खुद को क्वारंटीन कर लिया। यहीं पर किताब पढ़कर, टमाटर की खेती की देखमाल करके अपना समय काट रहा हूं। - सुरजीत कुशवाहा, मोहनपुर, चौबेपुर ब्लॉक
परिवार की खातिर खुद को उपस्वास्थ्य केंद्र में कर लिया क्वारंटीन
पुणे में मोटर पार्ट्स बनने की फैक्ट्री में काम करने 20 मार्च को गया था। काम मिल भी नहीं पाया था कि लॉकडाउन हो गया। घर आने का कोई साधन नहीं था। किसी तरह से लगभग एक माह तक वहीं पर समय काटा। जेब में पैसे भी नहीं बचे। दो दिन जब खाने का कोई इंतजाम नहीं हुआ तो पैदल ही घर के लिए निकल पड़ा। 500 किलोमीटर पैदल सफर तय किया। कुछ वाहनों की भी मदद ली। 10 दिन में गांव पहुंच पाया। परिवार के लोगों की सुरक्षा के लिए खुद ही गांव के बाहर उपस्वास्थ्य केंद्र में क्वारंटीन हो गया। गांव के लोग गेट से ही मिलकर लौट जाते हैं। घर से ही खाना आता है। अभी तक अपने परिजनों से ठीक से मिल भी नहीं पाया हूं। - श्रीकांत गौतम, पेम, चौबेपुर ब्लॉक