फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Kanpur News ›   languishing-in-the-big-cities-became-the-state-s-child-labor

बड़े शहरों में श्रमिक बन पिस रहे प्रदेश के बच्चे

Thu, 04 Jun 2015 01:31 AM IST
अमर उजाला कानपुर
अमर उजाला कानपुर Updated Thu, 04 Jun 2015 01:31 AM IST
विज्ञापन
languishing-in-the-big-cities-became-the-state-s-child-labor
उत्तर प्रदेश के 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को बाल श्रमिक के तौर पर देश के कई बड़े शहरों में भेजा जा रहा है। बेहद सुनियोजित तरीके से चल रहे इस धंधे (चाइल्ड ट्रैफिकिंग) में महज एक हजार रुपये महीने में बच्चों से 15-16 घंटे काम कराया जाता है। थोड़े से रुपयों के लालच में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इस धंधे में बच्चों के अभिभावकों के भी शामिल होने की बात सामने आई है। श्रम विभाग के सर्वे में यह खुलासा हुआ है। विभाग की ओर से तैयार की गई रिपोर्ट में प्रदेश के विभिन्न जिलों के स्थानीय प्रशासन, पुलिस की एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट, शिक्षा विभाग, जीआरपी की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए गए हैं।
विज्ञापन

 बाल श्रम समन्वयक (श्रमायुक्त मुख्यालय)रिजवान अली ने बताया कि हाल ही में महाराष्ट्र और जयपुर से सैकड़ों बाल श्रमिक मुक्त कराए गए। दोनों राज्यों के स्थानीय प्रशासन की ओर से जानकारी दी गई कि यह सभी बच्चे प्रदेश के बहराइच और श्रावस्ती व आसपास जिले में रहने वाले हैं। इसके बाद श्रमायुक्त शालिनी प्रसाद के निर्देश पर 18-21 मई तक 20 सदस्यीय चार टीमों ने यहां रहकर करीब 50 से अधिक गांवों में जाकर मामले की पड़ताल की। महाराष्ट्र, जयपुर से मुक्त कराए गए बाल श्रमिकों, उनके माता-पिता और स्थानीय लोगों से बातचीत की गई। जिसमें पता चला कि बिचौलिये कैसे बच्चों के माता-पिता को बड़े शहर में बच्चों को काम दिलाने और इसके एवज में एक हजार रुपये मासिक देने का लालच देकर वहां ले जाते हैं। बताया कि यूपी के बच्चों को मुंबई, महाराष्ट्र, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा के बड़े-बड़े होटल से लेकर ढाबों तक में भेजा जाता था और 15-16 घंटे तक काम कराया जाता था। यह भी पता चला है कि इन गांवों से प्रतिवर्ष 500-1000 बच्चे इन बड़े शहरों में भेजे जाते हैं । इतने बड़े पैमाने पर बच्चों को इन राज्यों में भेजने में किसी बड़े रैकेट के काम करने की संभावना से इंकार नही किया गया है।
विज्ञापन


रिपोर्ट में यह निकले निष्कर्ष
-बिचौलिए बच्चों के माता-पिता को पैसे का लालच देकर बाहर ले जाते हैं
- इन बच्चों के मां-बाप को एक हजार रुपये महीने पहुंचाए जाते हैं
- पैसे आने से मां-बाप बच्चों को बाहर भेज देते हैं
- गांवों में वयस्कों की संख्या अधिक और 5-14 साल के बच्चों की संख्या कम थी   
- इन गांवों में शिक्षा का स्तर बेहद खराब मिला। स्कूलों में शिक्षक तो 5-5 थे। लेकिन बच्चे महज 5-10 थे।
- शिक्षक-शिक्षिकाएं शिक्षा अभियान के प्रति गंभीर नही दिखे
- वयस्क भी अनपढ़ मिले
- गांववालों की आय का मुख्य स्रोत खेती बाड़ी है
- पक्की सड़कें नही हैं, बिजली भी नहीं पहुंची है तमाम गांवों में
- गांवों में आधारभूत सुधार, सामाजिक सुरक्षा संबंधी तमाम योजनाएं चलाई जा रही हैं। लेकिन गांव वालों को इसकी जानकारी तक नही है। जो जिला प्रशासन के कार्य प्रणाली पर सवाल उठाते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

 --------------------------
पुलिस की एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट, जीआरपी पर उठे सवाल
सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक श्रावास्ती, बहराइच और आस-पास के जिलों के गांवों से इतनी संख्या में बच्चे बाहर भेजे जा रहे हैं, लेकिन पुलिस की एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट को इसकी जानकारी नही है। बच्चे ट्रेन के माध्यम से ही बड़े शहरों को भेजे जाते थे। रेलवे स्टेशन पर एक साथ इतने बच्चे (जिनकी संख्या 10-15 होती थी और इनकी उम्र भी औसतन 14 साल से कम होती थी ) जाते थे, बावजूद इसके जीआरपी ने कभी भी इन्हें ले जाने वाले व्यक्ति या इन बच्चों से सवाल-जवाब क्यों नहीं किया ?

---------------------
महाराष्ट्र, राजस्थान  जैसे प्रदेशों में यूपी से बच्चे भेजे जाने संबंधी रिपोर्ट तैयार की गई है। जल्द ही पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी। रिपोर्ट उप्र शासन के अलावा स्थानीय जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन, शिक्षा विभाग को भी भेजी जाएगी। इन पर कार्रवाई करने के लिए भी कहा जाएगा।  
 शालिनी प्रसाद, श्रमायुक्त
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed