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अब ऐसी हो गई 'मैनचेस्टर ऑफ़ द ईस्ट' की हालत

Sun, 19 Nov 2017 04:59 PM IST
सौमित्र कांत दीक्षित, अमर अजाला कानपुर
सौमित्र कांत दीक्षित, अमर अजाला कानपुर Updated Sun, 19 Nov 2017 04:59 PM IST
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know why Kanpur is called "Manchester of East"
कानपुर के उद्योग-धंधों की स्थितियां होती जा रहीं खराब

1803 में 24 मार्च को ईस्ट इंडिया कंपनी ने ऐतिहासिक शहर कानपुर को जिला घोषित किया था। साल 1857 के गदर में कानपुर की धरती खून से लाल हुई थी। समय बीता और कानपुर एक औद्योगिक नगरी के तौर पर विकसित होने लगा। कई मिलें खुलीं इनमें लाल इमली, म्योर मिल, एल्गिन मिल, कानपुर कॉटन मिल और अथर्टन मिल काफ़ी प्रसिद्ध हुईं। इतिहास की किताबों में 'मैनचेस्टर ऑफ़ द ईस्ट' कहे जाने वाले कानपुर को न जाने किसकी नजर लग गई। अब इस शहर का हालत सबके सामने है। उद्योग धंधे चौपट हो चुके हैं।

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28 वर्षीय मोहम्मद शानू भारत के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश के पुराने औद्योगिक शहर कानपुर में रहते हैं। यही कोई 11 साल की उम्र रही होगी जब उन्होंने शहर की एक चमड़ा फैक्ट्री में काम करने के लिए स्कूल छोड़ दिया ताकि माता-पिता और चार भाई-बहनों के परिवार का सहारा बन सकें। उसके बाद आठ साल तक वे महीने में 9,000 रुपए पगार पर हर रोज आठ घंटे फैक्ट्री में काम करते रहे। इस बीच पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए लेकिन तस्वीरें देखकर नई डिजाइन के अच्छी फिटिंग वाले, मजबूत जूते बनाना जरूर सीख गए।
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लेकिन इस हुनर से शादाब की जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आया क्योंकि जहां वे काम करते थे, वहां न कामगारों के लिए कोई चिकित्सा सुविधा थी न ही नौकरी के बाद पेंशन मिलने की संभावना।वेतन बढ़ने की भी उम्मीद नहीं थी क्योंकि उनकी फैक्ट्री ही नहीं, कमोबेश पूरा चमड़ा उद्योग तमाम कारणों से घुटने टेकने की कगार पर है। दुनिया में चमड़े के भारतीय उत्पादों की मांग कम हो रही है। वहीं राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के चाबुक का डर इस उद्योग को हमेशा बना ही रहता है। बाकी कसर ‘गाय पर होने वाली राजनीति’ पूरी कर देती है।
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भरपूर तादाद में रोजगार उपलब्ध नहीं हो पा रहे

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कानपुर के उद्योग-धंधों की स्थितियां होती जा रहीं खराब

तो क्या वजह है कि उत्तर प्रदेश में शानू जैसे युवाओं के लिए भरपूर तादाद में रोजगार उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं? इसका जवाब कानपुर के चमड़ा उद्योग की दशा जान-समझकर सहज ही मिल सकता है. इंडिया स्पेंड के सर्वेक्षण के अनुसार 1990 में कानपुर का चमड़ा उद्योग 10 लाख लोगों को रोजगार दे रहा था. प्रदेश के उद्योग विभाग में एक संयुक्त सचिव के अनुसार 10 साल पहले कानपुर में चमड़ा उत्पादों की करीब 400 इकाइयां थीं. लेकिन इसी एक दशक में इनमें से 176 के बंद होने के साथ अब यह संख्या आधी रह गई है.

इन इकाइयों के बंद होने के पीछे तीन-चार वजहें अहम रहीं. इनमें पहली बड़ी वजह रही, चमड़ा और उसके उत्पादों की वैश्विक मांग में गिरावट. एक जानकारी के मुताबिक, भारत से 2015-16 में चमड़ा उत्पादों के निर्यात में चार फीसदी की गिरावट दर्ज की गई जबकि इसी अवधि में कानपुर से होने वाले इस निर्यात में 11 फीसदी की गिरावट आई. हालांकि घुड़सवारी के लिए जरूरी घोड़े की जीन का खास तौर पर कानपुर से निर्यात किया जाता रहा है. इसकी मांग पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है हालांकि इसका निर्यात भी बढ़ा नहीं है.
 

कच्चे माल की उपलब्धता में कमी

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कानपुर के उद्योग-धंधों की स्थितियां होती जा रहीं खराब
चमड़ा निर्यात परिषद के क्षेत्रीय निदेशक (मध्य क्षेत्र) अली अहमद इस गिरावट की पुष्टि करते हैं। उनके मुताबिक, ‘पिछले कुछ साल से यूरोपीय संघ से चमड़ा और उसके उत्पादों की मांग कम हुई है।’ हालांकि जानकार इस उद्योग पर संकट की दूसरी वजह बताते हैं और वह है कच्चे माल की उपलब्धता में कमी। चमड़ा उद्योग के प्रतिनिधि नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘साल 2014 से पहले कानपुर के सबसे बड़े कसाईखाने में करीब 1,000 मवेशी लाए जाते थे। लेकिन इसके बाद गौ-वध के विरोध में राजनीति गरमाने और फिर नोटबंदी ने यह संख्या 100 तक पहुंचा दी।’

चमड़ा कारखानों पर लागू किए गए सख्त पर्यावरण नियमों ने भी इस उद्योग को नुकसान पहुंचाया है. यह इन औद्योगिक इकाइयों के बंद होने की तीसरी बड़ी वजह है। साल 2010 में एनजीटी की स्थापना और प्रदूषण स्तर पर उसकी कठोर निगरानी ने कानपुर की 128 चमड़ा उद्योग इकाइयों पर तालाबंदी करा दी. इसके अलावा बाकी बची इकाइयों के खिलाफ कम से कम 500 मामले एनजीटी की मुख्य बेंच के सामने विचाराधीन हैं। चमड़ा उद्योग से होने वाले प्रदूषण के सिलसिले में कानपुर आईआईटी की 2007 की एक रिपोर्ट पर भी गौर करना होगा।

अवशोषित नहीं हो पाते रसायन

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रिपोर्ट के मुताबिक, ‘चमड़ा उद्योग उच्च प्रदूषण के लिए जाना जाता है। खास तौर पर चमड़े को तैयार करने की प्रक्रिया के दौरान निकलने वाले कार्बनिक और अकार्बनिक और ठोस अपशिष्ट (वेस्ट मटेरियल) की वजह से। चमड़े को तैयार करने के लिए जिन रसायनों का इस्तेमाल होता है, वे भी पूरी तरह अवशोषित नहीं हो पाते। बल्कि उन्हें वातावरण में यूं ही छोड़ दिया जाता है।’ सो, जाहिर तौर पर इन्हीं कारणों से चमड़ा उद्योग एनजीटी के निशाने पर रहता है।

चमड़ा उद्योग पर पड़ी मार ने छोटे कारोबारियों की कमर भी तोड़ दी है। इनमें ज्यादातर चमड़े के जूते बनाने वाले लोग हैं। कानपुर के पारंपरिक जूता बाजार बेगमगंज में छोटी सी दुकान चलाने वाले मोहम्मद रईस कहते हैं, ‘चमड़ा अब फैशन व्यापार में महंगे कच्चे माल के रूप में जा रहा हैं. जबकि जूते और महिलाओं के पर्स वगैरह एक नई तरह के पॉलिमर से बनाए जा रहे हैं, जो देखने में बढ़िया और सस्ते होते हैं। ये सस्ते पड़ते हैं और लोग इन्हें पसंद भी करते हैं. हमें भी इसी हिसाब से बदलाव करना पड़ रहा है।’

चमनगंज के 1,000 घरों में चमड़े के जूते-पर्स बनाने के छोटे कारखाने

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कानपुर के उद्योग-धंधों की स्थितियां होती जा रहीं खराब
स्थानीय लोगों के अनुसार, कानपुर में बेगमगंज और उससे सटे चमनगंज के इलाके में कम से कम 1,000 घरों में अब भी चमड़े के जूते-पर्स वगैरह बनाने के छोटे कारखाने चलते हैं। लेकिन यहां भी हालात अच्छे नहीं हैं। ऐसे ही एक कारखाने में काम करने वाले 50 साल के गुड्डू मोहम्मद बीते दिनों को याद करते हैं, ‘बचपन में कानपुर में इस तरह के न जाने कितने कारखाने हुआ करते थे। लेकिन बड़े उद्योगों की क्रांति और फिर उसके बाद आए बदलावों ने हमारे जैसे छोटे हुनरमंद कारीगरों को निगल लिया. अब हमारे लिए काम के लाले पड़े हैं।’
 

तो इसीलिए कानपुर से लोग पलायन करने लगे

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कानपुर के उद्योग-धंधों की स्थितियां होती जा रहीं खराब
कानपुर के चमड़ा उद्योग पर संकट का असर यह हुआ है कि इस शहर से बड़ी संख्या में आबादी पलायन करने लगी है। शायद इसीलिए जनसंख्या वृद्धि दर भी गिरी है। आंकड़े बताते हैं कि 2001 से 2011 के बीच उत्तर प्रदेश की जनसंख्या में 20 फीसदी वृद्धि हुई। लखनऊ, आगरा और मेरठ जैसे प्रदेश के अन्य शहरों की जनसंख्या में वृद्धि का प्रतिशत भी करीब-करीब यही रहा। लेकिन कानपुर की आबादी वृद्धि-दर में नौ फीसदी की कमी आई है। दूसरी तरफ नोएडा की आबादी में 40 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई, जो इस बात का संकेत है, लोग अब इस तरफ पलायन कर रहे हैं।

जबकि इससे पहले कानपुर में पिछले सात दशक तक जनसंख्या वृद्धि दर का आंकड़ा 20 फीसदी के आसपास ही दर्ज किया गया था। यानी यह हाल उस शहर का है, जो ब्रिटिश राज के दौरान भारत के प्रमुख शहरों में से एक था। जहां कोलकाता से सात साल पहले 1907 में बंबई के साथ ही पहली इलेक्ट्रिक ट्राम चला दी गई थी। जहां 1857 के विद्रोह के पांच साल बाद पहली कपड़ा कंपनी ‘एल्गिन मिल्स’ शुरू हो गई थी। इस शुरुआत ने 20वीं सदी आने के पहले ही यहां नौ टेक्सटाइल कंपनियों की स्थापना की जमीन तैयार कर दी थी।

हालांकि 1970 की राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया के दौरान भारत के इस सबसे बड़े औद्योगिक शहर में ‘लाल इमली’ जैसी बड़ी कपड़ा मिलों पर संकट शुरू हुआ, लेकिन उसी वक्त चमड़ा उद्योग ने कानपुर के पुनरुद्धार में अहम भूमिका निभाई। आज भी देश में चमड़ा और चमड़े की वस्तुओं, मुख्य रुप से जूते का प्रमुख उत्पादक कानपुर ही है। देश से कुल चमड़ा उत्पाद का 40 प्रतिशत जूते के रूप में निर्यात होता है और यह कानपुर से जाता है। निर्यात होने वाले चमड़ा उत्पादों का एक तिहाई माल भी कानपुर ही तैयार करता है। 
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