Kanpur: गर्मी से झुलसी नींद…मन ने महसूस की जलन, सोने के घंटे हुए आधे, लोगों में बढ़ा अवसाद और माइग्रेन
Kanpur News: डॉक्टर्स का कहना है कि नींद न आने पर लोग मोबाइल देखने लगते हैं। इससे और बुरा असर होता है। लगातार यह रूटीन रखने पर निद्रा चक्र टूट जाता है। इसका शरीर के मेटाबोलिज्म पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे तनाव बढ़ जाता है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
कानपुर में उमस भरी गर्मी में लोगों की नींद के घंटे आधे हो गए हैं। नींद न आने पर लोग मोबाइल देखने लगते हैं जिससे पूरी रात बिना सोए गुजर रही है। इससे निद्रा चक्र टूट रहा है। रोगियों का ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, थायरॉयड अनियंत्रित हो रहा है। सिरदर्द, माइग्रेन, आंखों में भारीपन, चक्कर, एंजाइटी और अवसाद भी बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि निद्रा चक्र नियंत्रित करने वाला न्यूरो केमिकल का रिसाव प्रभावित हो गया है।
हैलट के सैंपल सर्वे में 200 रोगियों की हिस्ट्री ली गई। रात में इनकी नींद के घंटे सामान्य सात-आठ घंटे के स्थान पर साढ़े तीन से चार घंटे ही मिले हैं। इसका दुष्प्रभाव इन रोगियों में आ गया। दवा से नियंत्रित चल रहा ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर अनियंत्रित हो गया। रोगियों के लिए अवसाद, एंजाइटी की दवाएं भी बढ़ानी पड़ गईं। रोगियों की शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
केस-1
आजादनगर के रहने वाले विनोद चौधरी (52) को रात में नींद आ रही है। सिर और पेट दर्द रहता है। आंखों से धुंधला दिखता है और भारीपन रहता है। उमस से उलझन रहती है। बीच में आंख लगती है, फिर टूट जाती है। बुधवार को उन्होंने तीन ओपीडी में दिखाया। डॉक्टरों ने दवा के साथ योग करने की भी सलाह दी।
केस-2
पनकी के रामअवतार (45) का मेडिसिन और मनोरोग विभाग में इलाज चल रहा है। वह इरिटेबिल बॉवेल सिंड्रोम के रोगी हैं। दो सप्ताह से उन्हें नींद नहीं आ रही थी। उनके आंतों के संचलन में समस्या हो गई, कब्ज भी रहता है। बुधवार को उन्होंने मेडिसिन और मनोरोग की ओपीडी में दिखाया। उन्हें योग करने, अधिक पानी पीने और सकारात्मक रहने की सलाह दी गई।
शरीर के मेटाबोलिज्म पर प्रतिकूल प्रभाव
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. धनंजय चौधरी ने बताया कि नींद न आने पर लोग मोबाइल देखने लगते हैं। इससे और बुरा असर होता है। लगातार यह रूटीन रखने पर निद्रा चक्र टूट जाता है। इसका शरीर के मेटाबोलिज्म पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे तनाव बढ़ जाता है। मेलाटोनिन न्यूरो ट्रांसमीटर का रिसाव कम हो जाता है।
नींद टूटने पर दोबारा नहीं आती
यह नींद को नियंत्रित करता है। मल्टी सुपर स्पेशियलिटी के इंडोक्रोनोलॉजी क्लीनिक प्रभारी सीनियर फिजीशियन डॉ. विशाल कुमार गुप्ता ने बताया कि रोगी अनियंत्रित बीपी और ब्लड शुगर के साथ आ रहे हैं। उनकी पूरी हिस्ट्री ली जा रही है। लोगों की नींद बाधित होने के मुख्य कारणों में गर्मी के अलावा बिजली संकट भी मिला। नींद टूटने पर दोबारा नहीं आती और लोग मोबाइल देखने लगते हैं।
स्क्रीन लाइट प्रभावित करती मस्तिष्क का ब्लू स्पॉट
मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी मस्तिष्क के ब्लू स्पॉट को प्रभावित करती है। ब्लू स्पॉट मस्तिष्क के लोकस सीरुलियस स्थान पर होता है। साथ ही मेलाटोनिन न्यूरो ट्रांसमीटर का रिसाव कम हो जाता है। न्यूरो टॉक्सिंस बनते हैं जिनसे निद्रा चक्र टूटता है। ब्लू स्पॉट तनाव, चैतन्यता, जागने के लिए जिम्मेदार होता है।