Kanpur Sikh Riots: नरसंहार के सुबूतों पर डाल दिया था पर्दा, एसआईटी ने खोज निकाले साक्ष्य, 96 दंगाई हुए बेनकाब
सिख विरोधी दंगे के कई केसों को सुबूतों और गवाहों की कमी की वजह से बंद कर दिया गया था। एसआईटी ने उन्हीं केसों की विवेचना शुरू की थी और 11 केसों की विवेचना पूरी की। इसमें 96 दंगाई बेनकाब हुए, जिनमें सिर्फ 74 जीवित हैं।
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कानपुर शहर 38 साल पहले जब दंगों की आग में झुलसा था, तब सुबूतों पर पर्दा डाल दिया गया था। गवाहों को दरकिनार कर दिया गया था। इसलिए केसों की फाइल बंद कर दी गई थी और गुनहगार 38 साल से खुलेआम घूमते रहे। एसआईटी ने साढ़े तीन साल के भीतर साक्ष्य जुटाए, वादी और गवाहों के साथ आरोपियों को भी बेनकाब कर दिया।
दंगा होने के बाद पुलिस ने हत्या के केस दर्ज किए थे। 11 केसों में चार्जशीट दाखिल की थी। जिसमें किसी को भी सजा नहीं मिल सकी थी। मुकदमे छूट गए थे। 20 केसों की फाइल बंद कर दी गई थी। दावा किया गया था कि साक्ष्य व गवाह नहीं है। मगर जब 35 साल बाद 2019 में एसआईटी ने केसों की विवेचना शुरू की तो परतें खुलती गईं और साक्ष्य मिलते गए। नतीजतन 11 केसों की विवेचना पूरी की और करीब सौ आरोपियों को खोज निकाला।
साक्ष्य थे, नजरअंदाज किया गया था
जिस तरह एसआईटी ने करीब चार दशक बाद मामले में वादी, गवाह, साक्ष्य और आरोपियों का पता कर लिया। उससे एक बात तो स्पष्ट है कि उस वक्त इन सभी चीजों को नजरअंदाज कर दिया गया था। इससे आरोपियों को लाभ मिल सके। यही हुआ भी और आशंका है कि साजिश के तहत यह सब किया गया। वरना जब तीन दशक बाद सुबूत मिल सकते हैं, तो घटना के बाद सुबूत न मिलना गले नहीं उतर रहा है।
आयोग की रिपोर्ट आई काम
दंगों के बाद जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग ने जांच की थी। एसआईटी ने गृह मंत्रालय की अनुमति लेकर आयोग से कानपुर दंगों संबंधी दस्तावेज जुटाए थे, जिसमें सवा सौ से अधिक शपथ मिले थे। इसमें से एसआईटी को वादी, गवाहों और आरोपियों के नाम व पते मिल गए थे। इस वजह से एसआईटी को विवेचना में काफी आसानी रही।