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कानपुर में HBTU का शोध: घरों की जूठन और सीवेज स्लज से बनेगी गैस, कचरे से रोशन होंगे शहर व गांव, पढ़ें डिटेल

Sun, 04 Oct 2026 11:33 AM IST
Himanshu Awasthi रजा शास्त्री, अमर उजाला, कानपुर
रजा शास्त्री, अमर उजाला, कानपुर Published by: Himanshu Awasthi Updated Sun, 04 Oct 2026 11:33 AM IST
सार

Kanpur News: एचबीटीयू के के बायोकेमिकल इंजीनियरिंग विभाग ने कचरे से स्वच्छ ऊर्जा बनाने की तकनीक विकसित की है। विभागाध्यक्ष डॉ. ललित कुमार सिंह के शोध के अनुसार, 80% खाद्य अपशिष्ट (जूठन) और 20% सीवेज स्लज के मिश्रण से मीथेन उत्पादन में 240% की भारी वृद्धि दर्ज की गई है।

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Kanpur HBTU Research Gas to be produced from household food waste and sewage sludge
एचबीटीयू - फोटो : amar ujala

विस्तार

घरों की जूठन और रोज निकलने वाला जैविक कचरा अब बोझ नहीं ऊर्जा का स्रोत बन सकता है। बढ़ते ऊर्जा संकट और जैविक कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन की चुनौती के बीच हरकोर्ट बटलर टेक्निकल यूनिवर्सिटी (एचबीटीयू) के बायोकेमिकल इंजीनियरिंग विभाग ने अपशिष्ट से बायोगैस और मीथेन उत्पादन की विधि विकसित की है। इसे बड़े अपार्टमेंट, मोहल्लों, गांवों, होटल, हॉस्टल, कैंटीन और आवासीय सोसायटियों में स्थानीय स्तर पर अपनाया जा सकता है।

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इससे एक ओर कचरे के निस्तारण की समस्या कम होगी, वहीं दूसरी ओर इसी कचरे से खाना पकाने के लिए गैस और बड़े संयंत्र में बिजली भी बनाई जा सकेगी। विभागाध्यक्ष डॉ. ललित कुमार सिंह की देखरेख में किए गए अध्ययन में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से निकलने वाले सीवेज स्लज और घरों व हॉस्टल मेस से निकलने वाले बचे पके भोजन को मिलाकर बायोमीथेन उत्पादन का परीक्षण किया गया।

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करीब 169 एमएल/जी वीएस मीथेन उत्पादन मिला
शोध में 20 फीसदी सीवेज स्लज और 80 फीसदी जूठन का मिश्रण तैयार किया गया। अकेले सीवेज स्लज की तुलना में इस मिश्रण से मीथेन उत्पादन में लगभग 240 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और करीब 169 एमएल/जी वीएस मीथेन उत्पादन प्राप्त हुआ। बायोचार आधारित एडिटिव के प्रयोग से यह उत्पादन बढ़कर लगभग 294 एमएल/जी वीएस तक पहुंच गया।

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समुद्री शैवाल के कचरे और पराली से भी ऊर्जा बनाने का प्रयोग
सीवेज स्लज में जैव-विघटनशीलता अपेक्षाकृत कम होने के कारण उससे अकेले प्रभावी मात्रा में बायोगैस बनाना चुनौतीपूर्ण होता है। खाद्य अपशिष्ट के मिश्रण से इस कमी को दूर करने की दिशा में बेहतर परिणाम मिले। चावल, सब्जी, ब्रेड समेत विभिन्न पके खाद्य अपशिष्टों को स्लज के साथ अलग-अलग अनुपात में मिलाकर प्रयोग किए गए।

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अवायवीय पाचन के जरिये गैस उत्पादन का परीक्षण किया
शोध के दूसरे चरण में समुद्री शैवाल के प्रसंस्करण से निकलने वाले अपशिष्ट के साथ गेहूं के भूसे और पराली को बायोगैस उत्पादन के लिए फीडस्टॉक के रूप में इस्तेमाल किया गया। दोनों पदार्थों को अलग-अलग और विभिन्न अनुपातों में मिलाकर अवायवीय पाचन के जरिये गैस उत्पादन का परीक्षण किया गया। प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए 100 डिग्री सेल्सियस पर तापीय पूर्व-उपचार भी किया गया।

ऐसे करते हैं काम
डॉ. ललित कुमार सिंह के अनुसार ड्रमनुमा डाइजेस्टर में 80 फीसदी जूठन या खाद्य अपशिष्ट और 20 फीसदी सीवेज स्लज डाला जाता है। स्लज में मौजूद सूक्ष्मजीव जैविक पदार्थों को तोड़कर मीथेन बनाते हैं। इस तरह घर की जूठन से निकलने वाली ऊर्जा दोबारा घरों तक पहुंच सकती है। बड़े संयंत्रों में इसी मीथेन से बिजली उत्पादन भी संभव है। यह तकनीक कचरे को समस्या से संसाधन में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

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