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पूजन के माध्यम से परमात्मा को जोडना है वैज्ञानिक पद्धति
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रसूलाबाद (कानपुर देहात)। नग्नता विचारों में आ गई है। कम वस्त्रों पर टीका टिप्पणी करना ठीक नहीं है। इसी प्रकार छुआछूत धर्म में कहीं नहीं है। पूजन के माध्यम से परमात्मा से जोड़ने का कार्य वैज्ञानिक पद्धति है।
गुजरात शारदापीठ द्वारिका के पीठाधीश्वर स्वामी नारायणानंद ब्रह्मचारी ने पत्रकारों से बात करते हुए कही। उन्होंने कहा कि स्वयं की विकृत मानसिकता त्याग देने से समाज का आइना स्पष्ट दिखता है। समाज में अल्प वस्त्र पहन कर अंग प्रदर्शन करने के मामले में उन्होंने कहा कि कम वस्त्र पहनने पर टीका टिप्पणी हो रही है। उस विषय में मत यह है कि नग्नता विचारों में आ गई है। जिन वस्त्रों में हम अपनी बेटियों को नहीं रोकते हैं। उन्हीं वस्त्रों में दूसरे की बेटियों को देखकर टीका टिप्पणी करते हैं। यह मोबाइल व टीवी फैशन ही है। इससे नग्नता को व्यापार का साधन बना कर लोगों के सामने परोस दिया है। इन्हीं स्थितियों के चलते समाज में बुराइयां आ गई है। जिसे रोका जाना चाहिए। अंतरजातीय विवाह पर कहा कि वास्तव में गोत्र डीएनए ही है। इस डीएनए का प्रभाव हमारी संतति पर पड़ता है।
इसीलिए हमारे यहां संगोत्र विवाह मना है। वैज्ञानिक रीति से भी यह वर्जित है। जिसे संकीर्णता कह कर लोग उपहास उड़ाते हैं। यह उनकी अज्ञानता है। संभाव, सुसंस्कृति, सुविचार हमारी परंपरा है। उन्होंने बताया कि वह अपनी कथा में समाज की इन विकृतियों के प्रति ज्यादा व्याख्यान देते हैं। हमारी संस्कृति पर छींटाकशी करने वाले भारतीय संस्कृति के मूल में छिपी वैज्ञानिक अवधारणा को नहीं जानते।
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गुजरात शारदापीठ द्वारिका के पीठाधीश्वर स्वामी नारायणानंद ब्रह्मचारी ने पत्रकारों से बात करते हुए कही। उन्होंने कहा कि स्वयं की विकृत मानसिकता त्याग देने से समाज का आइना स्पष्ट दिखता है। समाज में अल्प वस्त्र पहन कर अंग प्रदर्शन करने के मामले में उन्होंने कहा कि कम वस्त्र पहनने पर टीका टिप्पणी हो रही है। उस विषय में मत यह है कि नग्नता विचारों में आ गई है। जिन वस्त्रों में हम अपनी बेटियों को नहीं रोकते हैं। उन्हीं वस्त्रों में दूसरे की बेटियों को देखकर टीका टिप्पणी करते हैं। यह मोबाइल व टीवी फैशन ही है। इससे नग्नता को व्यापार का साधन बना कर लोगों के सामने परोस दिया है। इन्हीं स्थितियों के चलते समाज में बुराइयां आ गई है। जिसे रोका जाना चाहिए। अंतरजातीय विवाह पर कहा कि वास्तव में गोत्र डीएनए ही है। इस डीएनए का प्रभाव हमारी संतति पर पड़ता है।
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इसीलिए हमारे यहां संगोत्र विवाह मना है। वैज्ञानिक रीति से भी यह वर्जित है। जिसे संकीर्णता कह कर लोग उपहास उड़ाते हैं। यह उनकी अज्ञानता है। संभाव, सुसंस्कृति, सुविचार हमारी परंपरा है। उन्होंने बताया कि वह अपनी कथा में समाज की इन विकृतियों के प्रति ज्यादा व्याख्यान देते हैं। हमारी संस्कृति पर छींटाकशी करने वाले भारतीय संस्कृति के मूल में छिपी वैज्ञानिक अवधारणा को नहीं जानते।
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