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मुसीबत: तीसरी लहर आई तो कुपोषित बच्चों की जान पर बन आएगी, कम होती है ऐसे मासूमों की रोग प्रतिरोधक क्षमता
Tue, 08 Jun 2021 09:19 AM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Tue, 08 Jun 2021 09:19 AM IST
सार
कोरोना काल में कुपोषित बच्चों की और अधिक उपेक्षा हुई है, जिससे कुपोषण और बढ़ गया है। घरों में जाकर इन बच्चों का किसी विभागीय कर्मचारी ने ध्यान नहीं दिया।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
कोरोना की तीसरी लहर में बच्चों को संक्रमण का अधिक खतरा बताया जा रहा है, लेकिन कुपोषित बच्चों के लिए यह और भी खतरनाक है। क्योंकि कुपोषित बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम होती है। ये मौसमी बीमारियों की गिरफ्त में बने रहते हैं।
दरअसल, कोरोना काल में कुपोषित बच्चों की और अधिक उपेक्षा हुई है, जिससे कुपोषण और बढ़ गया है। घरों में जाकर इन बच्चों का किसी विभागीय कर्मचारी ने ध्यान नहीं दिया। इस दौरान अस्पतालों के न्यूट्रीशनल रिहैबिलिटेशन सेंटरों (एनआरसी) में भी बच्चे दूर-दराज के इलाकों से रेफर होकर नहीं आ पाए हैं।
कुपोषित बच्चों के आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सीएचसी, पीएचसी पर ले जाती रही हैं। अधिक कुपोषित बच्चों को जीएसवीएम मेडिकल कालेज के बालरोग अस्पताल में चल रहे एनआरसी भेजा जाता रहा। कोरोना काल में यहां बच्चों की संख्या बहुत कम रही है।
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एनआरसी में 10 बेड हैं लेकिन ये कभी भरे नहीं। यहां औसत चार बच्चों का ही रहा है, जबकि शहर के सरहदी क्षेत्रों में कुपोषित बच्चों की संख्या अधिक है। बालरोग विशेषज्ञों का कहना है कि बहुत से बच्चे जिनका कुपोषण दूर हो गया था, लापरवाही बरते जाने पर वे फिर कुपोषित की श्रेणी में आ जाते हैं। हैलट की एनआरसी प्रभारी डॉ. रूपा डालमिया सिंह का कहना है कि काम तो चल ही रहा है लेकिन कोरोना काल में बच्चे कम आए हैं।
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दरअसल, कोरोना काल में कुपोषित बच्चों की और अधिक उपेक्षा हुई है, जिससे कुपोषण और बढ़ गया है। घरों में जाकर इन बच्चों का किसी विभागीय कर्मचारी ने ध्यान नहीं दिया। इस दौरान अस्पतालों के न्यूट्रीशनल रिहैबिलिटेशन सेंटरों (एनआरसी) में भी बच्चे दूर-दराज के इलाकों से रेफर होकर नहीं आ पाए हैं।
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कुपोषित बच्चों के आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सीएचसी, पीएचसी पर ले जाती रही हैं। अधिक कुपोषित बच्चों को जीएसवीएम मेडिकल कालेज के बालरोग अस्पताल में चल रहे एनआरसी भेजा जाता रहा। कोरोना काल में यहां बच्चों की संख्या बहुत कम रही है।
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एनआरसी में 10 बेड हैं लेकिन ये कभी भरे नहीं। यहां औसत चार बच्चों का ही रहा है, जबकि शहर के सरहदी क्षेत्रों में कुपोषित बच्चों की संख्या अधिक है। बालरोग विशेषज्ञों का कहना है कि बहुत से बच्चे जिनका कुपोषण दूर हो गया था, लापरवाही बरते जाने पर वे फिर कुपोषित की श्रेणी में आ जाते हैं। हैलट की एनआरसी प्रभारी डॉ. रूपा डालमिया सिंह का कहना है कि काम तो चल ही रहा है लेकिन कोरोना काल में बच्चे कम आए हैं।
अति कुपोषित
पांच साल से कम : 10 फीसदी
पांच से 10 साल : 07 फीसदी
11 से 15 साल : 5 फीसदी
उम्र के हिसाब से बच्चों के वजन के अलग-अलग मानक तय हैं। इस मानक के हिसाब से अगर बच्चे का वजन 60 प्रतिशत से कम हो तो वह अतिकुपोषित श्रेणी में आएगा।
पांच साल से कम : 10 फीसदी
पांच से 10 साल : 07 फीसदी
11 से 15 साल : 5 फीसदी
उम्र के हिसाब से बच्चों के वजन के अलग-अलग मानक तय हैं। इस मानक के हिसाब से अगर बच्चे का वजन 60 प्रतिशत से कम हो तो वह अतिकुपोषित श्रेणी में आएगा।
सबसे ज्यादा खतरा अतिकुपोषित बच्चों को रहता है। ये निमोनिया की चपेट में जल्दी आ सकते हैं। इसके साथ ही इन्हें वेंटिलेटर की जरूरत पड़ सकती है। पांच से 12 साल के बीच का आयु वर्ग अधिक संवेदनशील होता है। कोरोना की तीसरी लहर को देखते हुए अलर्ट रहने की जरूरत है। अतिकुपोषित बच्चों के मां-बाप खासतौर पर सतर्क रहें।- डॉ. वीएन त्रिपाठी, वरिष्ठ बालरोग विशेषज्ञ और पूर्व महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा