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कैसा वक्त: आंसुओं को अपनों का सहारा भी नहीं, मौत के बाद अपनों के अंतिम दर्शन भी न कर सके
Tue, 11 May 2021 10:38 AM IST
शिखा पांडेय
शैलेश अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
शैलेश अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Tue, 11 May 2021 10:38 AM IST
सार
सबसे ज्यादा संकट में वे हैं, जिनका पूरा परिवार कोरोना की चपेट में था या है। अलग-अलग कमरों में क्वारंटीन रहने के कारण वे प्यार की झप्पी तो दूर, एक-दूसरे को देख भी नहीं पाते।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
कोरोनाकाल ने न जाने कितने परिवारों को बेबसी, निराशा और हताशा में धकेल दिया है। कोई मां अपने बेटे को स्पर्श करना चाहती है, कोई अपने पिता को गले लगाना चाहता है तो कोई गमजदा किसी अपने के कंधे पर सिर रखकर रोना चाहता है। ऐसा न कर पाने पर दुख के सागर में डूब जाता है और उबरने का रास्ता नहीं मिलता तो उसे अवसाद अपनी गिरफ्त में ले लेता है।
सबसे ज्यादा संकट में वे हैं, जिनका पूरा परिवार कोरोना की चपेट में था या है। अलग-अलग कमरों में क्वारंटीन रहने के कारण वे प्यार की झप्पी तो दूर, एक-दूसरे को देख भी नहीं पाते। ऐसे में कई के नाते-रिश्तेदार तक दूरी बना लेते हैं और फिर कोई तीमारदार न होने पर उनका सहारा भगवान ही होता है।
शारदानगर के दीपक का पूरा परिवार संक्त्रस्मित हुआ तो उनके साले ने फोन पर अपने संपर्क के जरिये उन्हें अस्पताल में भर्ती करवा दिया। घर के बाकी लोगों के लिए भोजन वह उनकी देहरी पर रखकर चला आता। उसे इस बात का मलाल है कि जिस बहन-बहनोई के घर उसे सिर-आंखों पर बैठाया जाता है, उसे उनकी चौखट पर खाने का टिफिन रखकर लौटना पड़ रहा है।
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कल्याणपुर के एक अपार्टमेंट में कोरोना से एक महिला की मौत पर बिल्कुल सन्नाटा था। इक्का-दुक्का महिलाओं को छोड़ उनके अंतिम दर्शन को कोई नहीं पहुंचा। उसके सुबकते बच्चों के आंसू पोंछने वाले सिर्फ उनके पिता ही थे। बर्रा के एक परिवार ने तो कोरोना से महिला की मौत पर अंतिम संस्कार से ही मुंह मोड़ लिया, तब यह काम करने के लिए पुलिस को आगे आना पड़ा।
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सबसे ज्यादा संकट में वे हैं, जिनका पूरा परिवार कोरोना की चपेट में था या है। अलग-अलग कमरों में क्वारंटीन रहने के कारण वे प्यार की झप्पी तो दूर, एक-दूसरे को देख भी नहीं पाते। ऐसे में कई के नाते-रिश्तेदार तक दूरी बना लेते हैं और फिर कोई तीमारदार न होने पर उनका सहारा भगवान ही होता है।
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शारदानगर के दीपक का पूरा परिवार संक्त्रस्मित हुआ तो उनके साले ने फोन पर अपने संपर्क के जरिये उन्हें अस्पताल में भर्ती करवा दिया। घर के बाकी लोगों के लिए भोजन वह उनकी देहरी पर रखकर चला आता। उसे इस बात का मलाल है कि जिस बहन-बहनोई के घर उसे सिर-आंखों पर बैठाया जाता है, उसे उनकी चौखट पर खाने का टिफिन रखकर लौटना पड़ रहा है।
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कल्याणपुर के एक अपार्टमेंट में कोरोना से एक महिला की मौत पर बिल्कुल सन्नाटा था। इक्का-दुक्का महिलाओं को छोड़ उनके अंतिम दर्शन को कोई नहीं पहुंचा। उसके सुबकते बच्चों के आंसू पोंछने वाले सिर्फ उनके पिता ही थे। बर्रा के एक परिवार ने तो कोरोना से महिला की मौत पर अंतिम संस्कार से ही मुंह मोड़ लिया, तब यह काम करने के लिए पुलिस को आगे आना पड़ा।
बेबसी-1
दामोदर नगर की सरोज के पति भगवती का कोरोना से निधन हो गया तो अस्पताल में उन्हें दूर से शव दिखाया गया। पथराई आंखों से वह उन्हें ठीक से निहार भी न सकीं। सैकड़ों मील दूर से सेना अधिकारी बेटे घर आए तो क्वारंटीन कर दिया गया। वे अपनी मां से गले मिलकर रो भी न सके।
बेबसी-2
केशवपुरम की गायत्री के भाई विमल तिवारी की लखनऊ में मौत हो गई। शव कानपुर लाया गया तो कोरोना के डर से बच्चों ने उन्हें अंतिम दर्शन के लिए जाने नहीं दिया। अब वह भाई को याद कर रोती हैं कि जिसने संकट की घड़ी में ताउम्र गले लगाया, उनके बेटे को गले लगाकर ढांढस तक नहीं बंधा सकीं।
बेबसी-3
शारदा नगर निवासी दीपक मिश्रा, उनकी पत्नी नीरजा और दो बेटों को एक साथ कोरोना ने जकड़ लिया। सभी को अलग-अलग कमरे में रहना पड़ा। दीपक की हालत बिगड़ी तो उन्हें एंबुलेंस से अस्पताल भेजा गया। अस्पताल जाते वक्त परिजन फफक रहे थे, पर बेबसी ऐसी कि उन्हें छू नहीं सकते थे।
दामोदर नगर की सरोज के पति भगवती का कोरोना से निधन हो गया तो अस्पताल में उन्हें दूर से शव दिखाया गया। पथराई आंखों से वह उन्हें ठीक से निहार भी न सकीं। सैकड़ों मील दूर से सेना अधिकारी बेटे घर आए तो क्वारंटीन कर दिया गया। वे अपनी मां से गले मिलकर रो भी न सके।
बेबसी-2
केशवपुरम की गायत्री के भाई विमल तिवारी की लखनऊ में मौत हो गई। शव कानपुर लाया गया तो कोरोना के डर से बच्चों ने उन्हें अंतिम दर्शन के लिए जाने नहीं दिया। अब वह भाई को याद कर रोती हैं कि जिसने संकट की घड़ी में ताउम्र गले लगाया, उनके बेटे को गले लगाकर ढांढस तक नहीं बंधा सकीं।
बेबसी-3
शारदा नगर निवासी दीपक मिश्रा, उनकी पत्नी नीरजा और दो बेटों को एक साथ कोरोना ने जकड़ लिया। सभी को अलग-अलग कमरे में रहना पड़ा। दीपक की हालत बिगड़ी तो उन्हें एंबुलेंस से अस्पताल भेजा गया। अस्पताल जाते वक्त परिजन फफक रहे थे, पर बेबसी ऐसी कि उन्हें छू नहीं सकते थे।
रोने से हल्का होता है मन
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि स्पर्श किसी हद तक दुख कम कर देता है। गम की घड़ी में किसी के कंधे पर सिर रखकर रोने से मन हल्का होता है। कोरोनाकाल में ऐसे हालात बन गए हैं कोई किसी को स्पर्श करना तो दूर, करीब जाने से भी कतराता है, लेकिन सकारात्मक बने रहना चाहिए। दूर से ही ढांढस और हौसला बढ़ाना चाहिए।
बुरा वक्त गुजर जाएगा, सकारात्मक रहें
यह सही है कि गले लगकर रोने से मन हल्का होता है और यही अपनेपन का एहसास हौसला भी बढ़ाता है। कुछ लोग अवसाद में चले जाते हैं। इस महामारी में सकारात्मक सोच ही जीवंत बनाती है। मृत्यु तो एक दिन आनी ही है। इसका डर बिल्कुल निकाल दें। अच्छा पढ़ें, अच्छा सोचें, सकारात्मक रहें और सकारात्मक लोगों से संपर्क में रहें। वक्त बदलना प्रकृति का नियम है, ये बुरे दिन भी चले जाएंगे। अपनों के जाने का शोक तो होता है पर उनकी स्वर्णिम यादों के सहारे जीयें।- नरेश गंगवार, मनोवैज्ञानिक
महामारी ने समझाई परिवार की अहमियत
महामारी ने संयुक्त परिवार के महत्व को जता दिया है। अपने के साथ ने दुख काफी हद तक कम किया है। एक-दूसरे का काम और तकलीफें बांट लीं। एकाकीपन ने बेबसी बढ़ाई है। प्रेम और हौसलाअफजाई दुख कम करता है और कष्ट के दिन निकल जाते हैं। - मंजू दुबे, समाजशास्त्री
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि स्पर्श किसी हद तक दुख कम कर देता है। गम की घड़ी में किसी के कंधे पर सिर रखकर रोने से मन हल्का होता है। कोरोनाकाल में ऐसे हालात बन गए हैं कोई किसी को स्पर्श करना तो दूर, करीब जाने से भी कतराता है, लेकिन सकारात्मक बने रहना चाहिए। दूर से ही ढांढस और हौसला बढ़ाना चाहिए।
बुरा वक्त गुजर जाएगा, सकारात्मक रहें
यह सही है कि गले लगकर रोने से मन हल्का होता है और यही अपनेपन का एहसास हौसला भी बढ़ाता है। कुछ लोग अवसाद में चले जाते हैं। इस महामारी में सकारात्मक सोच ही जीवंत बनाती है। मृत्यु तो एक दिन आनी ही है। इसका डर बिल्कुल निकाल दें। अच्छा पढ़ें, अच्छा सोचें, सकारात्मक रहें और सकारात्मक लोगों से संपर्क में रहें। वक्त बदलना प्रकृति का नियम है, ये बुरे दिन भी चले जाएंगे। अपनों के जाने का शोक तो होता है पर उनकी स्वर्णिम यादों के सहारे जीयें।- नरेश गंगवार, मनोवैज्ञानिक
महामारी ने समझाई परिवार की अहमियत
महामारी ने संयुक्त परिवार के महत्व को जता दिया है। अपने के साथ ने दुख काफी हद तक कम किया है। एक-दूसरे का काम और तकलीफें बांट लीं। एकाकीपन ने बेबसी बढ़ाई है। प्रेम और हौसलाअफजाई दुख कम करता है और कष्ट के दिन निकल जाते हैं। - मंजू दुबे, समाजशास्त्री