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Independence Day 2023: अहमक फफूंदवी ने क्रांतिकारी बन चलाया था आंदोलन, स्मारक नहीं बनने का परिजनों को है मलाल

Tue, 15 Aug 2023 08:40 AM IST
हिमांशु अवस्थी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, औरैया
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, औरैया Published by: हिमांशु अवस्थी Updated Tue, 15 Aug 2023 08:40 AM IST
सार

Auraiya News: वर्तमान में अहमक फफूंदवी के साहित्य की देखरेख फफूंद के मोहल्ला महाजनान में रह रहे उनके पौत्र खान मोहम्मद व आरिफ खान कर रहे हैं। क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी अहमक फफूंदवी के पौत्र और पौत्रियों को दो पीढ़ी गुजरने के बाद भी स्वतंत्रता सेनानी परिवार का दर्जा हासिल नहीं हुआ।

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Independence Day 2023, ahamak Fafundvi had started the movement as a revolutionary, Memorial not yet built
अहमक फफूंदवी की फाइल फोटो और उनकी लिखी किताब दिखाते बड़े पौत्र खान मोहम्मद - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आजादी के लिए चलाए गए आंदोलन में अंग्रेजों की चूलें हिला देने वाले आजादी के नायक अहमद मुस्तफा खान उर्फ अहमक फफूंदवी को आजादी के जश्न पर लोग याद करना नहीं भूलते। उन्होंने पढ़ाई के दौरान ही गांधी जी द्वारा चलाए गए आंदोलन में हिस्सा लिया और महान क्रांतिकारी कहलाए।

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आजादी के 76 वर्ष बीतने के बाद भी उनके नाम पर एक स्मारक भी नहीं बन सका। जिसका उनके परिवार को आज भी मलाल है। फर्रुखाबाद के शमसाबाद में रहने वाले उनके दादा इमाम खान क्रांतिकारी थे और 1857 की क्रांति में भाग लेने के कारण अंग्रेजों ने उन्हें फांसी पर लटका दिया था।
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इसके बाद उनके पुत्र अब्दुल्ला खान फफूंद के मोहल्ला महाजनांन में आकर बस गए। 26 अप्रैल 1895 में उनके पुत्र मुस्तफा खान मददाह का जन्म हुआ। बड़े होने पर पिता ने यूनानी चिकित्सा हासिल करने के लिए दिल्ली भेज दिया। वहां आजादी के आंदोलन को देखा, तो यहीं से वह क्रांतिकारी बन गए।

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कई बार आगरा, लखनऊ और इटावा की जेल में भेजा
वर्ष 1921 में महात्मा गांधी व कांग्रेस द्वारा चलाए जा रहे आंदोलनों में शामिल होने लगे और अहमक फफूंदवी के नाम से प्रसिद्ध हुए। उनको कई बार आगरा, लखनऊ और इटावा की जेल में डाला गया। उन्होंने अपनी शायरी लिखकर अंग्रेज जेलर की नाक में दम कर दिया था।

ये शेर हुआ था काफी मशहूर
उन्होंने एक शेर लिखा-तौक गर्दन में गुलामी का न होना चाहिए। जेल प्रवास के दौरान उन्होंने जिंदाने-हिमाकत, संगो खिश्त, नक्शो हिकमत व जोशो अमल नामक कविताओं का संग्रह लिखा। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भी उन्हें कई प्रशस्ति पत्रों और तमगों और ताम्रपत्रों से नवाजा था। जो आज उनके परिवार से गुम हो चुके हैं।

तकिए वाली मस्जिद के कब्रिस्तान में हुए सुपुर्दे खाक
अपने आखिरी वक्त में उन्होंने हिंदी उर्दू शब्दकोश लिखकर समाज को बड़ी उपलब्धि प्रदान की थी। जिसे उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रकाशित किया गया था। आठ अगस्त 1957 को क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी अहमक फफूंदवी का निधन हो गया। तिराहा चमनगंज के तकिए वाली मस्जिद के कब्रिस्तान में उनको सुपुर्दे खाक किया गया।

स्मारक नहीं बनने का परिजनों को मलाल
क्रांतिकारी शायर अहमक फफूंदवी के चार बेटे व एक बेटी थी। सबसे बड़े बेटे मुक्तदा खां जेलर, दूसरे नंबर के बेटे होम्योपैथी के डॉक्टर मुब्तदा खां, तीसरे नंबर के पुत्र मोहतदा खां प्रोफेसर थे और छोटे बेटे इस्तिफा खां पावर कारपोरेशन में इंजीनियर थे। सबसे छोटी बेटी माजिदा खातून थीं। सभी का निधन हो चुका है।

पौत्र खान मोहम्मद व आरिफ खान कर रहे हैं देखरेख
वर्तमान में अहमक फफूंदवी के साहित्य की देखरेख फफूंद के मोहल्ला महाजनान में रह रहे उनके पौत्र खान मोहम्मद व आरिफ खान कर रहे हैं। क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी अहमक फफूंदवी के पौत्र और पौत्रियों को दो पीढ़ी गुजरने के बाद भी स्वतंत्रता सेनानी परिवार का दर्जा हासिल नहीं हुआ।

बीस साल में मांग भी नहीं हो पाई है पूरी
बड़े पौत्र खान मोहम्मद ने सरकार और प्रशासन से स्वतंत्रता सेनानी दादा अहमक फफूंदवी के नाम से कस्बे में एक स्मारक बनवाए जाने की मांग की थी, लेकिन बीस साल में उनकी यह मांग भी पूरी नहीं हो पाई है। इससे परिजन व्यथित हैं और कहते हैं उम्मीद है कि कभी ये हकीकत जरूर होगा।

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