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पीपल के 150 पेड़ से हनुमान मंदिर की पहचान
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शिवली। प्रकृति का संरक्षण करने में क्षेत्र के कई मंदिर अपनी भूमिका निभा रहे हैं। कड़री हनुमान मंदिर में लगे पीपल के डेढ़ सौ वृक्ष वातावरण को निर्मल बना रहे हैं। एक साथ एक ही स्थान पर इतने पीपल के पौधे लगे होने से यह मंदिर की पहचान भी बन गए है। दूर दूर से यहां आने वाले भक्त मनौती मांगकर परिसर में अपने साथ लाए पीपल के पौधे रोपते हैं। वहीं विख्यात शोभन मंदिर के चार किलो मीटर दायरे में फैली झील भूजल स्तर बढ़ा रही है।
कड़री हनुमान मंदिर परिसर में वर्तमान में डेढ़ सौ पीपल के पेड़ वातावरण को शुद्ध बना रहे हैं। आठ वर्ष पूर्व मंदिर के संत ने परिसर में पीपल के सौ पौधे एक साथ रोपे थे। वहीं बाद में परिसर में अपने आप उगे पचास पौधों का भी संरक्षण किया गया।
इससे यहां पीपल के 150 पौधे अब वृक्ष बन रहे हैं। भक्त कड़री मंदिर को पीपल वाला मंदिर भी कहते हैं। मंदिर के पुजारी रमेश स्वरूप ब्रह्मचारी ने बताया कि पीपल वृक्षों के चलते मंदिर की खास है। यहां पीपल के इतने पौधे एक साथ लगे होने से एक सुखद अनुभूति होती है।
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वहीं शोभन हनुमान मंदिर में डेढ़ दशक पूर्व लिफ्ट कैनाल से संचालित नहर तैयार की गई। इससे दस गांवों के किसानों की फसलों की मुफ्त सिंचाई होती है। मंदिर के आसपास चार किलोमीटर दायरे में बनी झील मंदिर का आकर्षक बढ़ा रही है। झील से भूजल स्तर सुधार भी हो रहा है। शोभन मंदिर के महंत हरिशरण पांडेय ने बताया कि लिफ्ट कैनाल से ही झील को भरा जाता है। झील के पानी से मंदिर परिसर के पेड़ों को हरा भरा रखने में मदद मिलती है।
प्रेरणा लेकर भक्तों ने लगाए पीपल
शिवली। कड़री संत के लगाए पीपल के पेड़ों से यहां आने वाले कई भक्त बेहद प्रभावित हुई। पांच भक्तों ने करीब 29 पीपल के पेड़ तैयार किए हैं। पीपल पौधों की खासियत है कि यह 24 घंटे ऑक्सीजन देता है। मंदिर में पीपल के पौधों की भव्यता देख भक्त पौधे लगाने को प्रेरित हो रहे हैं। सूतनपुरवा गांव के अन्नू बाजपेई कहते हैं कि आश्रम के संत के लगाए पीपल के पेड़ों से प्रेरित होकर उन्होंने तीन वर्ष पूर्व पीपल के पांच पौधे लगाए थे।
अब पौधे काफी बड़े हो गए हैं। इसी गांव के ओमप्रकाश ने भी दो वर्ष पूर्व गांव की खाली जमीन पर व कड़री आश्रम में दस पौधे लगाए। वह नियमित पौधों की देखरेख करते हैं। शिवली के विजय कुमार मौजी ने आश्रम में पीपल के चार पेड़ लगाए हैं। रूरा के रामबाबू शास्त्री व दुर्गा शंकर मिश्रा भी तीन वर्ष पूर्व पांच-पांच पौधे लगाकर सुरक्षा का संकल्प निभा रहे हैं।
मनौती मांगकर पीपल के पौधे लगा रहे भक्त
शिवली। कड़री आश्रम की क्षेत्र में काफी मान्यता है। दूर दूर से भी भक्त यहां आते हैं। पीपल वाला मंदिर के नाम से भी भक्त इसे पुकारते हैं। वहीं भक्त मनौती मांगकर परिसर में अपने साथ लाए पीपल के पौधे रोपते हैं। हालांकि ये पौधे अभी छोटे हैं। इनकी देख देख मंदिर के पुजारी व समर्पित भक्त करते हैं।
टिकरी की शिखा मनाती पौधों का जन्मदिन
शिवली। मैथा ब्लॉक के टिकरी गांव की अंतरराष्ट्रीय गांधी पर्यावरण पुरस्कार विजेता आकांक्षा सिंह उर्फ शिखा भी हरियाली बढ़ाने की मुहिम से जुड़ी हैं। वर्ष 2016 में उन्होंने गांव में अमलताश, बेल, नीम, पीपल और आंवला आदि के सौ पौधे लगाए थे। अब ये पौधे पेड़ बन गए है। पिछले 26 मई को पेड़ों का पांचवां जन्मदिन मनाया गया। शिखा से प्रेरित होकर गांव के युवा भी पौधरोपण कर लगाए पौधों की सुरक्षा करने लगे हैं।
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कड़री हनुमान मंदिर परिसर में वर्तमान में डेढ़ सौ पीपल के पेड़ वातावरण को शुद्ध बना रहे हैं। आठ वर्ष पूर्व मंदिर के संत ने परिसर में पीपल के सौ पौधे एक साथ रोपे थे। वहीं बाद में परिसर में अपने आप उगे पचास पौधों का भी संरक्षण किया गया।
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इससे यहां पीपल के 150 पौधे अब वृक्ष बन रहे हैं। भक्त कड़री मंदिर को पीपल वाला मंदिर भी कहते हैं। मंदिर के पुजारी रमेश स्वरूप ब्रह्मचारी ने बताया कि पीपल वृक्षों के चलते मंदिर की खास है। यहां पीपल के इतने पौधे एक साथ लगे होने से एक सुखद अनुभूति होती है।
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वहीं शोभन हनुमान मंदिर में डेढ़ दशक पूर्व लिफ्ट कैनाल से संचालित नहर तैयार की गई। इससे दस गांवों के किसानों की फसलों की मुफ्त सिंचाई होती है। मंदिर के आसपास चार किलोमीटर दायरे में बनी झील मंदिर का आकर्षक बढ़ा रही है। झील से भूजल स्तर सुधार भी हो रहा है। शोभन मंदिर के महंत हरिशरण पांडेय ने बताया कि लिफ्ट कैनाल से ही झील को भरा जाता है। झील के पानी से मंदिर परिसर के पेड़ों को हरा भरा रखने में मदद मिलती है।
प्रेरणा लेकर भक्तों ने लगाए पीपल
शिवली। कड़री संत के लगाए पीपल के पेड़ों से यहां आने वाले कई भक्त बेहद प्रभावित हुई। पांच भक्तों ने करीब 29 पीपल के पेड़ तैयार किए हैं। पीपल पौधों की खासियत है कि यह 24 घंटे ऑक्सीजन देता है। मंदिर में पीपल के पौधों की भव्यता देख भक्त पौधे लगाने को प्रेरित हो रहे हैं। सूतनपुरवा गांव के अन्नू बाजपेई कहते हैं कि आश्रम के संत के लगाए पीपल के पेड़ों से प्रेरित होकर उन्होंने तीन वर्ष पूर्व पीपल के पांच पौधे लगाए थे।
अब पौधे काफी बड़े हो गए हैं। इसी गांव के ओमप्रकाश ने भी दो वर्ष पूर्व गांव की खाली जमीन पर व कड़री आश्रम में दस पौधे लगाए। वह नियमित पौधों की देखरेख करते हैं। शिवली के विजय कुमार मौजी ने आश्रम में पीपल के चार पेड़ लगाए हैं। रूरा के रामबाबू शास्त्री व दुर्गा शंकर मिश्रा भी तीन वर्ष पूर्व पांच-पांच पौधे लगाकर सुरक्षा का संकल्प निभा रहे हैं।
मनौती मांगकर पीपल के पौधे लगा रहे भक्त
शिवली। कड़री आश्रम की क्षेत्र में काफी मान्यता है। दूर दूर से भी भक्त यहां आते हैं। पीपल वाला मंदिर के नाम से भी भक्त इसे पुकारते हैं। वहीं भक्त मनौती मांगकर परिसर में अपने साथ लाए पीपल के पौधे रोपते हैं। हालांकि ये पौधे अभी छोटे हैं। इनकी देख देख मंदिर के पुजारी व समर्पित भक्त करते हैं।
टिकरी की शिखा मनाती पौधों का जन्मदिन
शिवली। मैथा ब्लॉक के टिकरी गांव की अंतरराष्ट्रीय गांधी पर्यावरण पुरस्कार विजेता आकांक्षा सिंह उर्फ शिखा भी हरियाली बढ़ाने की मुहिम से जुड़ी हैं। वर्ष 2016 में उन्होंने गांव में अमलताश, बेल, नीम, पीपल और आंवला आदि के सौ पौधे लगाए थे। अब ये पौधे पेड़ बन गए है। पिछले 26 मई को पेड़ों का पांचवां जन्मदिन मनाया गया। शिखा से प्रेरित होकर गांव के युवा भी पौधरोपण कर लगाए पौधों की सुरक्षा करने लगे हैं।