मैं गणेश शंकर विद्यार्थी, नवीन, हसरत बटुकेश्वर दत्त हूं...कानपुर वाला
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गैंगस्टर विकास दुबे का तो अंत हो गया लेकिन उसका एक वीडियो बहुत वायरल हो रहा है। जिसमें उज्जैन पुलिस की गिरफ्त में आने के बाद व पुलिस वालों से कह रहा है... मैं विकास दुबे हूं...कानपुर वाला। इस वीडियो के माध्यम से सोशल मीडिया पर कानपुर की नकारात्मक छवि बनाने का भी बहुत लोग प्रयास कर रहे हैं। तो यह बताना जरूरी हो जाता है कि कानपुर की पहचान गुंडों से नहीं क्रांति के अग्रदूत और कलमकारों से रही है। नाना साहब पेशवा, अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी, बालकृष्ण शर्मा, नवीन हसरत मोहानी, बटुकेश्वर दत्त जैसे नायकों की धरती है। खलनायकों और गुंडों की यहां कोई जगह नहीं।
अंग्रेज फौज को ला दिया था घुटनों पर
वर्ष 1857 में क्रांति की चिंगारी भले ही मेरठ से फूटी हो लेकिन शोला वह कानपुर आकर ही बनी। नाना साहब पेशवा की अगुवाई में यहां के लड़ाकों ने अंग्रेज जनरल व्हीलर और उसकी फौज को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था।
एक हिलोर इधर से आए एक हिलोर उधर से जाए
बालकृष्ण शर्मा नवीन की जन्मभूमि तो मध्यप्रदेश थी लेकिन कर्म भूमि कानपुर ही रही। क्राइस्ट चर्च कॉलेज में शिक्षा लेने वाले नवीन का स्वाधीनता आंदोलन में योगदान अविस्मरणीय है। कविताई में निपुणता भी उन्होंने यहां से पाई। उनकी कविता 'कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ जग में उथल-पुथल मच जाए, एक हिलोर इधर से आए एक हिलोर उधर से आए' युवाओं में क्रांति के लिए जोश भर देती थी इस शहर की पहचान नवीन से भी है।
बटुकेश्वर ने छोड़ा था गहरा असर
सेंट्रल असेंबली में भगत सिंह के साथ बम फोड़ने वालों में कानपुर के बटुकेश्वर दत्त भी थे। देश की आजादी के लिए उनके मन में ऐसी दीवानगी थी कि वह अंग्रेजों से ना कभी डरे ना डिगे। भगत सिंह के साथ बटुकेश्वर दत्त ने इस घटना को अंजाम किसी को आहत पहुंचाने के लिए नहीं दिया था बल्कि सोई जनता को जगाना उन लोगों का मकसद था, जिसमें वह कामयाब भी हुए
शहर का झंडा ऊंचा किया
पद्मश्री श्यामलाल गुप्त पार्षद ने विजई विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊंचा रहे हमारा लिखकर शहर को पहचान दी।
भाईचारे की रक्षा में कर दिया बलिदान
गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म तो प्रयागराज के अतरसुइया में हुआ था लेकिन उनके व्यक्तित्व का जन्म यहीं हुआ था। वह खुद को कनपुरिया ही मानते थे। बात चाहे उनके अखबार 'प्रताप' में अंग्रेजो के खिलाफ छुपे अंगार लेखों की हो या क्रांतिकारियों की मदद की गणेश शंकर विद्यार्थी को इस शहर ने ही यह तीसरी सौगात के रूप में दी थी( मार्च 1931 में हुए। हिंदू-मुस्लिम दंगों में दोनों धर्मों के लोगों को समझाने वह अकेले ही निकल पड़े। पैदल घूम कर लोगों को समझाते रहे लेकिन कुछ नासमझ लोगों ने अंग्रेजों की शह पर उन्हें मौत के घाट उतार दिया। 25 मार्च 1931 को उनका शव मिला इस प्रकार उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया इस शहर को हमेशा गणेश शंकर विद्यार्थी के नाम से जाना जाएगा
अटल से लेकर रामनाथ कोविंद तक पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी कानपुर के डीएवी कॉलेज में पड़े यह कहना गलत नहीं होगा कि उनके भीतर के पत्रकार ने ही जन्म लिया इसके बाद वह राजनेता बने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद तो कानपुर में ही जन्मे हैं।
चुपके-चुपके नहीं खुलेआम अंग्रेजों को देते थे चुनौती
उन्नाव के मोहान में जन्मे हसरत मोहानी की शख्सियत को परवाज कानपुर आकर ही मिला। 'चुपके चुपके रात दिन' जैसी बेहतरीन गजलें लिखने वाले मोहानी ने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों से तो खुलेआम मोर्चा लिया, कई बार अपनी पार्टी कांग्रेस की नीतियों से क्षुब्द हो कर उसका विरोध किया और अलग भी हुए। कम्युनिस्ट विचारधारा के मोहनी श्री कृष्ण के भक्त थे। वह हर साल जन्माष्टमी पर मथुरा जाते थे। वह संविधान निर्मात्री समिति के सदस्य रहे। इस शहर की एक पहचान के एक प्रमुख प्रतीक हैं फजल उल हसन मोहनी 'हसरत' उर्फ हसरत मोहानी।