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वूमेंस डे स्पेशल: इनके जज्बे को सलाम, मारा पुरुषों का मैदान
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Wed, 08 Mar 2017 01:10 AM IST
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लीक छोड़ तीनै चलैं शायर, सिंह, सपूत। जमाने पुरानी यह कहावत अपने शहर की कुछ महिलाएं झुठला रही हैं। इन सुपुत्रियों ने पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्रों में अपने पैर जमाकर जमाने को दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर कर दिया है। बंधी-बधाई लीक छोड़कर चलने वाली इन महिलाओं में ई-रिक्शा चालक है तो ठेकेदार और हॉकर यानी अखबार वितरक भी। आज स्त्रीशक्ति के अहसास का दिन है। आइए आप भी इन शक्तिपुंज महिलाओं के संघर्षों-अनुभवों को जानें-समझें।
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बेटियों के भविष्य के लिए थामा ई-रिक्शा
डेमो पिक ई-रिक्शा चालक शीलू कश्यप
- फोटो : ओपी वाधवानी, अमर उजाला, कानपुर
‘मैंने अपनी बेटियों के भविष्य के लिए ई-रिक्शा थाम लिया। यात्रियों के रूप में मुझे बहुत सारे माता-पिता की सहायता करने का मौका मिलता है।’ नौबस्ता गल्ला मंडी की ई-रिक्शा चालक शीलू कश्यप के ये वाक्य उसके हौसले बयान करने के लिए काफी हैं। शीलू एक झोपड़े में दो बेटियों के साथ रहती हैं और ढाई साल से किराये का ई-रिक्शा चला रही हैं। शीलू के लिए यह मजबूरी नहीं, सम्मान से जीने का माध्यम है। वह बताती हैं कि बचपन से लेकर शादी और उसके बाद भी जीवन में संघर्ष कम नहीं हुए। पति से अलग होने के बाद दो बेटियों को बेहतर जिंदगी देने के लिए ई-रिक्शा चलाना शुरू किया। एक महिला को रिक्शा चलाते देखकर सभ्य लोग तारीफ करते हैं तो कुछ तरह-तरह के कमेंट।
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गृहिणी से बन गईं सोलर दीदी
सोलर दीदी के नाम से मशहूर है पुष्पलता राठौर
- फोटो : ओपी वाधवानी, अमर उजाला, कानपुर
2011 में पति विनय सिंह राठौर के असमय निधन ने बिधनू निवासी पुष्पलता राठौर के सामने चुनौतियों का बड़ा पहाड़ खड़ा कर दिया। एक बेटी और पति के निधन के बाद बेटे की परवरिश की चिंता थी। चुनौतियों से घबराने की बजाय उन्होंने संघर्ष किया और देखते ही देखते दो साल में साधारण गृहिणी से कुशल सोलर पैनल इलेक्ट्रीशियन बन गईं। वह 2013 से सोलर पैनल फिटिंग और वायरिंग का काम कर रहीं हैं। बिधनू, बिंदकी आदि ब्लॉकों में वह सोलर दीदी उर्फ गुड़िया के नाम से मशहूर हैं। पुष्पलता ने बताया कि मुझे श्रमिक भारती एनजीओ ने ट्रेनिंग दी। एक महिला को सीढ़ी लगाकर, दीवार पर लटककर सोलर पैनल लगाने, वायरिंग-कनेक्शन करते देख लोग सराहना करते हैं।
पति के निधन के बाद संभाला काम
सुमन ने पति रमेश के निधन के बाद संभाला पति का काम
- फोटो : ओपी वाधवानी, अमर उजाला, कानपुर
‘कोई महिला मजबूरी में ही घर की दहलीज लांघती है। महिलाओं के लिए घर के बाहर हर कदम पर संघर्ष है, लेकिन इनसे जूझना-लड़ना ही जिंदगी है।’ गृहिणी से पत्थर घिसाई कारीगर बनीं यादव नगर रामादेवी की सुमन ने पति रमेश के निधन के बाद परिवार चलाने के लिए ये काम संभाल लिया। दो श्रमिक सहयोगियों के साथ वह इस काम को कर रही हैं। सुमन ने बताया कि अनुभव न होने के कारण शुरुआत में नुकसान उठाना पड़ा। इस काम में अधिकतर पुरुष हैं। महिला होने के नाते दिक्कत होती है। अच्छे लोगों का सहयोग मिलता है तो कई बार ऐसे लोग मिलते हैं कि पैसा छोड़ना पड़ जाता है।
हॉकर बनकर रोशनी बिखेर रही
बर्रा में रहने वालीं बीएससी फाइनल ईयर की छात्रा रोशनी सुबह बाटती है अखबार
- फोटो : ओपी वाधवानी, अमर उजाला, कानपुर
जस नाम-तस काम यह मुहावरा बर्रा में रहने वालीं बीएससी फाइनल ईयर की छात्रा रोशनी पर सटीक बैठता है। रोशनी रोजाना सुबह चार बजे से बर्रा क्षेत्र के 170 से अधिक घरों पर अखबार पहुंचाकर ज्ञान की रोशनी बांटती हैं। बर्रा आठ चौराहे पर उनका बुक स्टाल हैं। पढ़ाई और घर के काम निपटाने के बाद रोशनी दुकान में समय देती हैं। रोशनी बताती हैं कि कक्षा-6 में आने के बाद उन्होंने अखबार बांटना शुरू कर दिया था। बीते 10 वर्षों से वह साइकिल से अखबार बांट रही हैं। सर्दी हो या बरसात, साल के 365 दिन उनका काम जारी रहता है। कई लोगों को एक लड़की का अखबार बांटना अजीब लगता है, लेकिन इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।