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हमीरपुर ग्राउंड रिपोर्ट: कोरोना ने बंद कराया काम धंधा...लाडलों की सेहत डगमगाई
Tue, 19 Jan 2021 07:26 PM IST
शिखा पांडेय
प्रशांत शर्मा, अमर उजाला, हमीरपुर
प्रशांत शर्मा, अमर उजाला, हमीरपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Tue, 19 Jan 2021 07:26 PM IST
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हमीरपुर में आर्थिक स्थिति बिगड़ने से खानपान पर पड़ा असर
- फोटो : अमर उजाला
कोरोना काल में कुपोषण के खिलाफ जंग काफी सुस्त पड़ गई। काम धंधा बंद होने के कारण हमीरपुर के कई श्रमिक गांव लौटकर आए तो उनके सामने खाने-पीने का संकट खड़ा हो गया। प्रशासन की तरफ से तात्कालिक राहत तो पहुंचाई गई लेकिन यह नाकाफी साबित हुई।
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कोरोना काल में कुपोषण के खिलाफ जंग काफी सुस्त पड़ गई। काम धंधा बंद होने के कारण हमीरपुर के कई श्रमिक गांव लौटकर आए तो उनके सामने खाने-पीने का संकट खड़ा हो गया। प्रशासन की तरफ से तात्कालिक राहत तो पहुंचाई गई लेकिन यह नाकाफी साबित हुई।
गांव में ही रोजगार की तलाश की तो आमदनी काफी कम हुई। इससे बच्चों का लालन-पोषण और इलाज प्रभावित हुआ, जिसने कुपोषण की जड़ें और मजबूत कर दीं। इसके अलावा घर-घर सर्वे का अभियान भी बेपटरी हो गया।
हमीरपुर पहुंची अमर उजाला की टीम को पहाड़ी गढ़ी गांव के गोरेलाल ने बताया कि जब से कोरोना काल शुरू हुआ है उनकी पोते का पिछले छह महीने से कोई वजन लेने नहीं आया। 15 महीने पहले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र राठ में बहू की डिलीवरी हुई थी, तब से अब तक जननी सुरक्षा योजना का पैसा तक नहीं आया। जबकि, पैसा मिलता तो जच्चा-बच्चा के खानपान में मदद मिलती।
समान उम्र के भाई-बहन में बहुत अंतर, एक सुस्त-दूसरा दुरुस्त
राठ के पहाड़ी गढ़ी गांव में रहते हैं कमलापत। उनका बेटा अजय और बेटी अंशिका जुड़वा होने के बावजूद शारीरिक रूप से काफी अलग हैं। डेढ़ साल की अंशिका अभी भी चल-फिर नहीं पाती है। देखने में बेहद दुबली है। उसकी मां राजकुमारी ने बताया कि बच्ची गुमसुम बैठी रहती है। किसी भी चीज में उसका मन नहीं लगता है। उसके बेटे की भी यही स्थिति थी लेकिन जेठ अपने साथ ले गए। वहां बेटे को पोषण सही मिला और अब उसकी सेहत सुधर गई है। वह अपने पैरों पर खड़ा होकर चलता-फिरता है।
गांव में ही रोजगार की तलाश की तो आमदनी काफी कम हुई। इससे बच्चों का लालन-पोषण और इलाज प्रभावित हुआ, जिसने कुपोषण की जड़ें और मजबूत कर दीं। इसके अलावा घर-घर सर्वे का अभियान भी बेपटरी हो गया।
हमीरपुर पहुंची अमर उजाला की टीम को पहाड़ी गढ़ी गांव के गोरेलाल ने बताया कि जब से कोरोना काल शुरू हुआ है उनकी पोते का पिछले छह महीने से कोई वजन लेने नहीं आया। 15 महीने पहले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र राठ में बहू की डिलीवरी हुई थी, तब से अब तक जननी सुरक्षा योजना का पैसा तक नहीं आया। जबकि, पैसा मिलता तो जच्चा-बच्चा के खानपान में मदद मिलती।
समान उम्र के भाई-बहन में बहुत अंतर, एक सुस्त-दूसरा दुरुस्त
राठ के पहाड़ी गढ़ी गांव में रहते हैं कमलापत। उनका बेटा अजय और बेटी अंशिका जुड़वा होने के बावजूद शारीरिक रूप से काफी अलग हैं। डेढ़ साल की अंशिका अभी भी चल-फिर नहीं पाती है। देखने में बेहद दुबली है। उसकी मां राजकुमारी ने बताया कि बच्ची गुमसुम बैठी रहती है। किसी भी चीज में उसका मन नहीं लगता है। उसके बेटे की भी यही स्थिति थी लेकिन जेठ अपने साथ ले गए। वहां बेटे को पोषण सही मिला और अब उसकी सेहत सुधर गई है। वह अपने पैरों पर खड़ा होकर चलता-फिरता है।
अच्छा खाने के लिए पैसे नहीं
सैदरपुर गांव की प्रेमवती ने बताया कि कुपोषण के कारण चार साल का भतीजा अंशू चलने-फिरने से लाचार है। हाथ-पैरों में जान नहीं है और कुछ मुड़े हुए हैं। कुपोषण निदान केंद्र में उसे भर्ती किया तो स्थिति कुछ सुधरी। अब इलाज और सही से खानपान कराने के लिए पैसे नहीं हैं।
उनका बेटा संदीप कुमार दिल्ली में काम करता था। कोरोना की वजह से हुए लॉकडाउन के बाद वह गांव आ गया। संदीप के मुताबिक अब गांव में ज्यादा काम नहीं मिल पाता। जो मिलता भी है, उससे पहले जैसी आमदनी नहीं हो पाती। इससे अंशू को सही पोषण नहीं उपलब्ध करा पा रहे।
लंबाई में 10 साल के मनीष के बराबर पहुंचा आधी उम्र का प्रभास
हमीरपुर के कई गांवों में कुपोषण के शिकार बच्चों की लंबाई नहीं बढ़ पा रही है। ऐसा ही एक मामला कुलौंदा गांव का सामने आया। गांव की गोमती ने बताया कि बेटे मनीष दस साल का होने के बावजूद कद में बहुत छोटा रह गया है। पास ही खड़े छह साल के प्रभास को अपने बच्चे के बगल में खड़ा करके दिखाया तो उम्र में लगभग आधा अंतर होने के बावजूद लंबाई एक जैसी थी।
पंजीरी चारे में खिला देते थे, अब घर रसद पहुंचने से राहत
सैदपुर गांव के लोगों ने बताया कि आंगनबाड़ी केंद्र में पहले पंजीरी, बिस्कुट आदि मिलता था। इसे लोग ठीक नहीं समझते थे और पंजीरी को जानवरों के चारे में मिला देते थे। बिस्कुट की गुणवत्ता भी ठीक नहीं थी। मगर अब सरकार की तरफ से घर पर रसद पहुंचाई जा रही है। इसमें प्रति बच्चा एक माह के लिए एक किलो चावल, डेढ़ किलो गेहूं और 750 ग्राम दाल दी जाती है। इससे काफी राहत है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आगे आने वाले समय में कुपोषण की तस्वीर जरूर बदलेगी और हालात सुधरेंगे।
सैदरपुर गांव की प्रेमवती ने बताया कि कुपोषण के कारण चार साल का भतीजा अंशू चलने-फिरने से लाचार है। हाथ-पैरों में जान नहीं है और कुछ मुड़े हुए हैं। कुपोषण निदान केंद्र में उसे भर्ती किया तो स्थिति कुछ सुधरी। अब इलाज और सही से खानपान कराने के लिए पैसे नहीं हैं।
उनका बेटा संदीप कुमार दिल्ली में काम करता था। कोरोना की वजह से हुए लॉकडाउन के बाद वह गांव आ गया। संदीप के मुताबिक अब गांव में ज्यादा काम नहीं मिल पाता। जो मिलता भी है, उससे पहले जैसी आमदनी नहीं हो पाती। इससे अंशू को सही पोषण नहीं उपलब्ध करा पा रहे।
लंबाई में 10 साल के मनीष के बराबर पहुंचा आधी उम्र का प्रभास
हमीरपुर के कई गांवों में कुपोषण के शिकार बच्चों की लंबाई नहीं बढ़ पा रही है। ऐसा ही एक मामला कुलौंदा गांव का सामने आया। गांव की गोमती ने बताया कि बेटे मनीष दस साल का होने के बावजूद कद में बहुत छोटा रह गया है। पास ही खड़े छह साल के प्रभास को अपने बच्चे के बगल में खड़ा करके दिखाया तो उम्र में लगभग आधा अंतर होने के बावजूद लंबाई एक जैसी थी।
पंजीरी चारे में खिला देते थे, अब घर रसद पहुंचने से राहत
सैदपुर गांव के लोगों ने बताया कि आंगनबाड़ी केंद्र में पहले पंजीरी, बिस्कुट आदि मिलता था। इसे लोग ठीक नहीं समझते थे और पंजीरी को जानवरों के चारे में मिला देते थे। बिस्कुट की गुणवत्ता भी ठीक नहीं थी। मगर अब सरकार की तरफ से घर पर रसद पहुंचाई जा रही है। इसमें प्रति बच्चा एक माह के लिए एक किलो चावल, डेढ़ किलो गेहूं और 750 ग्राम दाल दी जाती है। इससे काफी राहत है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आगे आने वाले समय में कुपोषण की तस्वीर जरूर बदलेगी और हालात सुधरेंगे।
खुद के बच्चे को खिलाई सरकारी पंजीरी, तब बढ़ा भरोसा
कैंथा गांव में पांच आंगनबाड़ी केंद्र हैं। इसमें कैंथा आंगनबाड़ी में दो केंद्र संचालित हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ममता देवी ने बताया कि वर्ष 2014 में एक केंद्र में 14 और दूसरे में नौ अति कुपोषित बच्चे थे। इन 23 अति कुपोषित बच्चों को कुपोषण से छुटकारा दिलाने के लिए लंबी जंग लड़ी।
उन्होंने बताया कि पहले लोग केंद्र में मिलने वाली पंजीरी को अपने बच्चों को नहीं खिलाते थे। 2002 में बच्चे को जन्म देने के बाद उन्होंने आंगनबाड़ी केंद्र लाना शुरू किया। निर्धारित समय बाद जब उन्होंने अपने बच्चे को आंगनबाड़ी केंद्र की पंजीरी खिलानी शुरू की तो धीरे-धीरे लोग जागरूक होना शुरू हो गए।
लोगों ने भी अपने बच्चों को पंजीरी खिलानी शुरू कर दी। बताया कि पोषण वाटिका को लेकर भी लोगों को जागरूक किया। अब केंद्र के अधीन आने वाले 40 फीसदी घरों में पोषण वाटिका बन गई है। मीठी नीम में आयरन और सहजन पत्ती में प्रोटीन होता है। कई सब्ज्यिों के फायदे भी बताए।
इसी का परिणाम है कि केंद्र में अब एक भी लाल श्रेणी में बच्चा नहीं है। दूसरे केंद्र की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पुष्पा देवी ने बताया कि ग्रह भ्रमण कर बच्चों को पोषित करने को लेकर परिजनों को जागरूक किया। इस वजह से पिछले पांच सालों में 50 फीसदी की जगह अब 80 प्रतिशत माताएं बच्चों को छह माह बाद ऊपरी आहार देने लगी हैं। वहीं, बच्चों को मां का दूध पिलाने का ग्राफ भी 50 फीसदी बढ़कर 80 प्रतिशत हो गया है।
कैंथा गांव में पांच आंगनबाड़ी केंद्र हैं। इसमें कैंथा आंगनबाड़ी में दो केंद्र संचालित हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ममता देवी ने बताया कि वर्ष 2014 में एक केंद्र में 14 और दूसरे में नौ अति कुपोषित बच्चे थे। इन 23 अति कुपोषित बच्चों को कुपोषण से छुटकारा दिलाने के लिए लंबी जंग लड़ी।
उन्होंने बताया कि पहले लोग केंद्र में मिलने वाली पंजीरी को अपने बच्चों को नहीं खिलाते थे। 2002 में बच्चे को जन्म देने के बाद उन्होंने आंगनबाड़ी केंद्र लाना शुरू किया। निर्धारित समय बाद जब उन्होंने अपने बच्चे को आंगनबाड़ी केंद्र की पंजीरी खिलानी शुरू की तो धीरे-धीरे लोग जागरूक होना शुरू हो गए।
लोगों ने भी अपने बच्चों को पंजीरी खिलानी शुरू कर दी। बताया कि पोषण वाटिका को लेकर भी लोगों को जागरूक किया। अब केंद्र के अधीन आने वाले 40 फीसदी घरों में पोषण वाटिका बन गई है। मीठी नीम में आयरन और सहजन पत्ती में प्रोटीन होता है। कई सब्ज्यिों के फायदे भी बताए।
इसी का परिणाम है कि केंद्र में अब एक भी लाल श्रेणी में बच्चा नहीं है। दूसरे केंद्र की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पुष्पा देवी ने बताया कि ग्रह भ्रमण कर बच्चों को पोषित करने को लेकर परिजनों को जागरूक किया। इस वजह से पिछले पांच सालों में 50 फीसदी की जगह अब 80 प्रतिशत माताएं बच्चों को छह माह बाद ऊपरी आहार देने लगी हैं। वहीं, बच्चों को मां का दूध पिलाने का ग्राफ भी 50 फीसदी बढ़कर 80 प्रतिशत हो गया है।
जिला अस्पताल के कुपोषण केंद्र में 500 से अधिक बच्चे स्वस्थ होकर डिस्चार्ज किए जा चुके हैं। यदि पांच साल से कम उम्र के बच्चों का वजन और ऊंचाई मानक के अनुसार नहीं बढ़ रही हो तो परिजन उसे केंद्र में लेकर आएं। यहां पर निश्चित ही बच्चे की सेहत में सुधार होगा। - डॉ. आरके सचान, सीएमओ, हमीरपुर