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यूपी: GSVM की रिसर्च पहली बार पेटेंट, रेटिना की लाइलाज बीमारियों का इलाज संभव, 5000 मरीजों का हो चुका है इलाज

Thu, 17 Aug 2023 01:42 PM IST
हिमांशु अवस्थी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: हिमांशु अवस्थी Updated Thu, 17 Aug 2023 01:42 PM IST
सार

Kanpur Health Update: दिल्ली रेटिना फोरम के बैनर तले इंडिया हैबिटेट में होने वाली अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के शोध को प्रस्तुत किया जाएगा। यह शोध नेत्र रोग विभाग ने 2000 रतौंधी रोगियों पर किया है। शोध में शामिल रोगियों में 70 फीसदी पुरुष और 30 फीसदी महिलाएं हैं।

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GSVMs research patent for the first time, treatment of incurable diseases of retina is possible, 5000 patients
जीएसवीएम की रिसर्च पहली बार पेटेंट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आंख के पर्दे (रेटिना) की लाइलाज बीमारियों का इलाज संभव करने वाली डिवाइस माइक्रो-नीडल फॉर ऑक्युलर ड्रग डिलीवरी को पेटेंट मिल रया है। यह जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के किसी ईजाद को मिला पहला पेटेंट है। यह नेत्र रोग के क्षेत्र में प्रदेश की पहली रिसर्च, जो यह पेटेंट हुई है।

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यह डिवाइस जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. परवेज खान ने ईजाद की। बुधवार को प्रोफेसर खान और कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला ने इस संबंध में पत्रकारों को जानकारी दी। डॉ. परवेज खान ने बताया कि डिवाइस के पेटेंट के लिए उन्होंने वर्ष 2018 में आवेदन दिया।
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पांच साल बाद सर्टिफिकेट मिला है। उन्होंने बताया कि नेत्र रोग के क्षेत्र में यह प्रदेश की पहली डिवाइस, जिसके जरिये रेटिना की लाइलाज समझी जाने वाली बीमारियों का इलाज किया जा सकता है। कई बीमारियां आंख के पर्दे की सतह पर होती हैं, वहां तक दवा पहुंचाने का कोई तरीका नहीं था।

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डिवाइस से हो चुका है पांच हजार रोगियों का इलाज
इससे बीमारियों का इलाज नहीं हो पाता था। इस डिवाइस के जरिये आंख के पर्दे की सतह पर दवा पहुंचाई जा सकती है। अब तक वह इस डिवाइस से पांच हजार रोगियों का इलाज कर चुके हैं। बीमारियों में रतौंधी, यूवीआईटिस, पीईडी आदि हैं। इनका सुरक्षित तरीके से इलाज किया जा रहा है।

डेढ़ साल लगे डिवाइस बनाने में
डॉ. परवेज खान ने बताया कि यह डिवाइस एक प्रकार के इंजेक्शन की सुई जैसी है। इसकी नोंक इतनी महीन और छोटी होती है कि आंख की पर्त को छेद कर पार नहीं होती। इससे दवा रोगग्रस्त जगह पर ही रहती है और दूसरी जगह नहीं फैलती है। इससे रोग का सटीक इलाज होता है।

दवा फैली नहीं, सही जगह पर ही है
वहीं, दूसरी जगह दवा फैलने पर आंख के लिए खतरा पैदा हो जाता है। डॉ. खान के अनुसार सबसे पहले इस डिवाइस से शव (कैडबर) की आंख में दवा डाली गई। परीक्षण में पाया गया कि दवा फैली नहीं, सही जगह पर ही है। फिर इसका उपयोग रोगियों पर किया गया।

कई देशों की 20 डिवाइस से हुआ था तुलनात्मक परीक्षण
उन्हें भी किसी तरह की दिक्कत नहीं हुई। रतौंधी जैसी लाइलाज बीमारियों में रोगियों को फायदा मिला। इस डिवाइस का इस्तेमाल स्टेम सेल थेरेपी में भी किया गया। यह पेटेंट 20 साल के लिए है। सर्टिफिकेट जारी होने के पहले अमेरिका, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन आदि देशों की 20 डिवाइस से इसका तुलनात्मक परीक्षण किया गया था।

रतौंधी के 2000 रोगियों पर शोध प्रस्तुत करेंगे
दिल्ली रेटिना फोरम के बैनर तले इंडिया हैबिटेट में होने वाली अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के शोध को प्रस्तुत किया जाएगा। यह शोध नेत्र रोग विभाग ने 2000 रतौंधी रोगियों पर किया है। शोध में शामिल रोगियों में 70 फीसदी पुरुष और 30 फीसदी महिलाएं हैं। कुल रोगियों में 12 साल से अधिक आयु के 20 फीसदी बच्चे हैं। यह कॉंफ्रेंस 26 और 27 अगस्त को होगी।

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