अंडाें पर 'जैनेटिक बदलाव का असर', स्वाद काे भुनाने में जुटा बजार
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सुहाने माैसम में बाजार काे हर स्वाद भुनाना अाता है। इसी वजह से अंडे के दाम में 50 फीसदी तक बढ़ोतरी के बाद महंगाई ने अब मीट कारोबार को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है। सर्दी शुरू होते ही चिकन (मुर्गे का मीट) के रेट में कृत्रिम तेजी लाने के आसार दिखने लगे हैं। मुर्गा बीज (ग्रांड पैरेंट) उत्पादकों ने चूजे के दाम पिछले वर्ष की तुलना में दोगुने कर दिए हैं। इससे पोल्ट्री फार्म संचालकों की लागत बढ़ गई है। सर्दी बढ़ने और क्रिसमस से नए साल के जश्न के चलते मांग के साथ रेट बढ़ाने की तैयारी की जा रही है। मुर्गे का बीज यानी ग्रांड पैरेंट (कारोबार की भाषा में इसे जीपी कहा जाता है) ब्राजील से आयात होता है। देश में गिनी चुनी कंपनियां ही इसका आयात करती हैं। ये कंपनियां विदेश से जीपी मंगाती हैं और हिंदुस्तान के मौसम के अनुकूल जेनेटिक बदलाव करके चूजे पोल्ट्री फार्म संचालकों को बेचती हैं।
तीन तरह की प्रजाति
वजन से तय हाेती है चूजे की कीमत
कानपुर पोल्ट्री फार्मर एसोसिशन के अध्यक्ष अजय तिवारी बताते हैं कि फार्म हाउस तक चूजा पहुंचने पर इसकी कीमत 50 रुपये हो जाती है। चूजा जब आता है तो उसका वजह 10 से 30 ग्राम होता है। 20 से 24 दिन में उसे एक किलो का तैयार कर दिया जाता है। उसे दाना खिलाने, वैक्सीन लगाने आदि में औसत 50-60 रुपये का खर्च आ जाता है। इस तरह एक किलो मुर्गा की लागत 100 से 110 रुपये आ रही है, लेकिन आढ़ती को 80 रुपये किलो देना पड़ रहा है। आढ़ती 90 रुपये में रिटेलर को और रिटेलर 125 रुपये किलो के हिसाब से बेचता है। पोल्ट्री फार्म संचालक को 20 से 30 रुपये का नुकसान हो रहा है।
डर की वजह से कमजाेर हाे जाता है मुर्गा
कानपुर शहर में है हजाराें किलाे की मांग
कानपुर शहर में रोजाना करीब 20 हजार मुर्गों की खपत है। आमतौर पर एक मुर्गा 1800 ग्राम से 2200 ग्राम का होता है। इस लिहाज से रोजाना 35 से 40 हजार किलो चिकन खाया जाता है। जबकि शहर में प्रतिदिन करीब 14-15 हजार मुर्गे का उत्पादन होता है। कुल 25 से 30 हजार किलो मांस तैयार होता है।
चूजे उपलब्ध करवाने वाली कंपनियों ने मोनोपॉली के तहत उत्पादन घटा दिया है और चूजे के दाम बढ़ा दिए हैं। इससे पोल्ट्री फार्मर को मुर्गे की लागत वसूल नहीं हो रही। पोल्ट्री फार्म एसोसिएशन इन कंपनियों पर दबाव बनाकर दाम कम करवाएगी। वरना हमें भी मुर्गे का रेट बढ़ाना पड़ेगा। - यजुर्वेंद्र सिंह, संगठन मंत्री, अपेक्स उत्तर प्रदेश
पोल्ट्री फार्मर हर महीने अपनी आपूर्ति समान नहीं रखते। इस वजह से मांग में अंतर आ जाता है। मांग बढ़ती है तो दाम बढ़ना स्वाभाविक है। पोल्ट्री फार्मर उस समय के लिए मुर्गे तैयार करते हैं जब उन्हें लगता है कि बिक्री ज्यादा होने वाली है। मसलन अभी पोल्ट्री फार्म वाले नए साल के लिए मुर्गा तैयार कर रहे हैं। इस वजह से चूजे के रेट बढे़ हुए हैं। दिवाली से पहले भी यही हालात पैदा हुए थे। मांग समान रहती है तो दाम अनिश्चित नहीं होते।-- ओमकार नाथ वर्मा, डीजीएम, विंकीज इंडिया लिमिटेड (चूजे आपूर्ति करने वाली कंपनी)