फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Kanpur News ›   genetic transform is change the taste of egg

अंडाें पर 'जैनेटिक बदलाव का असर', स्वाद काे भुनाने में जुटा बजार

Wed, 29 Nov 2017 01:57 PM IST
प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर Updated Wed, 29 Nov 2017 01:57 PM IST
विज्ञापन
genetic transform is change the taste of egg
डेमो पिक
अंडाें में जैनेट‌िक बदलाव का असर अब लाेगाें की जुबान पर भी द‌‌िखने लगा है। बदलाव के चलते अंडाें का स्वाद बेहतर हुअा है। इसके चलते अंडे अाैर चूजें के दाम में बढ़ाेत्तरी हुई है। उत्पादकों ने चूजे के दाम पिछले वर्ष की तुलना में दोगुने कर दिए हैं। इससे पोल्ट्री फार्म संचालकों की लागत बढ़ गई है। सर्दी बढ़ने और क्रिसमस से नए साल के जश्न के चलते मांग के साथ रेट बढ़ाने की तैयारी की जा रही है।
विज्ञापन


सुहाने माैसम में बाजार काे हर स्वाद भुनाना अाता है। इसी वजह से अंडे के दाम में 50 फीसदी तक बढ़ोतरी के बाद महंगाई ने अब मीट कारोबार को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है। सर्दी शुरू होते ही चिकन (मुर्गे का मीट) के रेट में कृत्रिम तेजी लाने के आसार दिखने लगे हैं। मुर्गा बीज (ग्रांड पैरेंट) उत्पादकों ने चूजे के दाम पिछले वर्ष की तुलना में दोगुने कर दिए हैं। इससे पोल्ट्री फार्म संचालकों की लागत बढ़ गई है। सर्दी बढ़ने और क्रिसमस से नए साल के जश्न के चलते मांग के साथ रेट बढ़ाने की तैयारी की जा रही है। मुर्गे का बीज यानी ग्रांड पैरेंट (कारोबार की भाषा में इसे जीपी कहा जाता है) ब्राजील से आयात होता है। देश में गिनी चुनी कंपनियां ही इसका आयात करती हैं। ये कंपनियां विदेश से जीपी मंगाती हैं और हिंदुस्तान के मौसम के अनुकूल जेनेटिक बदलाव करके चूजे पोल्ट्री फार्म संचालकों को बेचती हैं।

विज्ञापन

तीन तरह की प्रजाति

genetic transform is change the taste of egg
डेमो पिक
मुर्गे में तीन तरह की प्रजाति कॉब, हब्बर्ड और रॉस होती हैं। कॉब प्रजाति सबसे अच्छी मानी जाती है। अन्य तरह की ब्रीड के जीवित रहने का औसत बहुत कम है। इस वजह से पोल्ट्री फार्म संचालक कॉब ब्रीड अधिक पसंद करते हैं। वर्ष 2015 में औसत कीमत 19 रुपये थी। वर्ष 2016 में औसत कीमत बढ़कर 23 रुपये हाे गई। वर्ष 2017 में औसत कीमत 48 रुपये है। चूजे उपलब्ध करवाने वाली कंपनियों ने वर्ष 2017 में एक कॉब ब्रीड की कीमत 48 रुपये रखी है। वर्ष 2016 में यह मात्र 23 रुपये में ही था। बताते हैं कि कंपनी ने उत्पादन कम करके कीमत बढ़ा दी है। एक चूजे की कीमत में दोगुने से अधिक की महंगाई से पोल्ट्री फार्म संचालकों का दम फूल गया है। 

वजन से तय हाेती है चूजे की कीमत
कानपुर पोल्ट्री फार्मर एसोसिशन के अध्यक्ष अजय तिवारी बताते हैं कि फार्म हाउस तक चूजा पहुंचने पर इसकी कीमत 50 रुपये हो जाती है। चूजा जब आता है तो उसका वजह 10 से 30 ग्राम होता है। 20 से 24 दिन में उसे एक किलो का तैयार कर दिया जाता है। उसे दाना खिलाने, वैक्सीन लगाने आदि में औसत 50-60 रुपये का खर्च आ जाता है। इस तरह एक किलो मुर्गा की लागत 100 से 110 रुपये आ रही है, लेकिन आढ़ती को 80 रुपये किलो देना पड़ रहा है। आढ़ती 90 रुपये में रिटेलर को और रिटेलर 125 रुपये किलो के हिसाब से बेचता है। पोल्ट्री फार्म संचालक को 20 से 30 रुपये का नुकसान हो रहा है। 
 

डर की वजह से कमजाेर हाे जाता है मुर्गा 

genetic transform is change the taste of egg
डेमो पिक
पोल्ट्री फार्मर आढ़ती को जब एक किलो वजन का मुर्गा देता है वह उसके ठिकाने तक पहुंचकर 900 या 950 ग्राम का ही बचता है। दरअसल रास्ते में उठापटक के दौरान मुर्गा डर की वजह से सूख जाता है। खाना, पानी छोड़ देता है। इस कारण उसका वजन गिर जाता है। इसी वजह से आढ़ती को आढ़त भाव से आठ से 10 रुपये कम में दिया जाता है। इसके बाद जब आढ़ती रिटेलर को देता है तो एक किलो वजन वाले मुर्गे में 800 ग्राम चिकन निकलता है। चिकन तैयार करते समय मुर्गे के पंख, पंजे, कलेजी, गर्दन, चोच आदि निकाल दी जाती है। वजन कम हो जाने की वजह से रिटेलर कीमत बढ़ा देते हैं।  

कानपुर शहर में है हजाराें ‌‌क‌िलाे की मांग
कानपुर शहर में रोजाना करीब 20 हजार मुर्गों की खपत है। आमतौर पर एक मुर्गा 1800 ग्राम से 2200 ग्राम का होता है। इस लिहाज से रोजाना 35 से 40 हजार किलो चिकन खाया जाता है। जबकि शहर में प्रतिदिन करीब 14-15 हजार मुर्गे का उत्पादन होता है। कुल 25 से 30 हजार किलो मांस तैयार होता है। 
 

चूजे उपलब्ध करवाने वाली कंपनियों ने मोनोपॉली के तहत उत्पादन घटा दिया है और चूजे के दाम बढ़ा दिए हैं। इससे पोल्ट्री फार्मर को मुर्गे की लागत वसूल नहीं हो रही। पोल्ट्री फार्म एसोसिएशन इन कंपनियों पर दबाव बनाकर दाम कम करवाएगी। वरना हमें भी मुर्गे का रेट बढ़ाना पड़ेगा। - यजुर्वेंद्र सिंह, संगठन मंत्री, अपेक्स उत्तर प्रदेश 


पोल्ट्री फार्मर हर महीने अपनी आपूर्ति समान नहीं रखते। इस वजह से मांग में अंतर आ जाता है। मांग बढ़ती है तो दाम बढ़ना स्वाभाविक है। पोल्ट्री फार्मर उस समय के लिए मुर्गे तैयार करते हैं जब उन्हें लगता है कि बिक्री ज्यादा होने वाली है। मसलन अभी पोल्ट्री फार्म वाले नए साल के लिए मुर्गा तैयार कर रहे हैं। इस वजह से चूजे के रेट बढे़ हुए हैं। दिवाली से पहले भी यही हालात पैदा हुए थे। मांग समान रहती है तो दाम अनिश्चित नहीं होते।-- ओमकार नाथ वर्मा, डीजीएम, विंकीज इंडिया लिमिटेड (चूजे आपूर्ति करने वाली कंपनी)

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed