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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Kanpur News ›   Forgery going on for years in the appointments of education department, Barra police kept pressing the matter

अमर उजाला पड़ताल: शिक्षा विभाग में बड़ा खेल! नियुक्तियों में चलता रहा फर्जीवाड़ा, बर्रा पुलिस दबाती रही मामला

Sun, 20 Aug 2023 12:30 PM IST
हिमांशु अवस्थी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: हिमांशु अवस्थी Updated Sun, 20 Aug 2023 12:30 PM IST
सार

Kanpur News:  एसीपी नौबस्ता ने बताया कि गंभीर प्रकरण में पूर्व विवेचकों की ओर से इतनी लापरवाही क्यों हुई है, इसकी जांच की जाएगी। प्रकरण में शेष आरोपियों की जल्द गिरफ्तारी के प्रयास किए जा रहे हैं। फरार आरोपियों के खिलाफ कोर्ट से एनबीडब्ल्यू भी जारी कराया जाएगा। 

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Forgery going on for years in the appointments of education department, Barra police kept pressing the matter
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कानपुर शिक्षा विभाग में सालों से फर्जी दस्तावेजों से नौकरी दिलाने वाले मास्टरमाइंड राजीव सिंह के साथ बर्रा पुलिस की मिलीभगत के भी संकेत मिल रहे हैं। मामले में 19 अगस्त 2022 को केस दर्ज होने के एक साल बाद पुलिस ने दो फर्जी शिक्षकों की गिरफ्तारी की, जबकि रिपोर्ट में ऐसे चार शिक्षकों के नाम थे।

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ये नाम 34 लाख की ठगी शिकार हुए संदीप राठौर ने एफआईआर में दर्ज कराए थे। जांच में लगे इतने लंबे समय ने खुद पुलिस को कटघरे में खड़ा कर दिया है। दोनों गिरफ्तार फर्जी शिक्षक 14 साल से नौकरी कर रहे थे। जाहिर है कि नियुक्तियों में यह फर्जीवाड़ा लंबे समय से चल रहा था।
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लेकिन शिकायत के बावजूद बर्रा पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने में रुचि दिखाई और न जांच में। तत्कालीन बर्रा थाना प्रभारी दीनानाथ मिश्रा ने तत्कालीन पुलिस कमिश्नर विजय सिंह मीणा के आदेश के बावजूद आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया। पीड़ित संदीप राठौर और आरोपी पक्ष को थाने में बैठाकर समझौता जरूर करवा दिया।

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तत्कालीन प्रभारी ने दबाव बनाकर समझौता करवाया था
समझौता ये करवाया कि आरोपी पक्ष आधी रकम वापस करेगा। संदीप को 17 लाख रुपये की चेक तो दी गई, लेकिन स्टॉप पेमेंट करवा दिया गया। आरोप है कि तत्कालीन प्रभारी दीनानाथ मिश्रा दबाव बनाकर ये समझौता करवाया था। सीपी बीपी जोगदंड के कार्यभार संभालने के बाद उनके आदेश पर पुलिस को एफआईआर दर्ज करनी पड़ी।

जांच में शिक्षकों के दस्तावेज निकले फर्जी
इसके बाद जांच तत्कालीन अतिरिक्त इंस्पेक्टर रजनीश यादव के पास पहुंची। उन्होंने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर शिक्षा विभाग में नौकरी करने वाले शिक्षकों में सुनील कुमार, अनिल कुमार, सुशील उर्फ अजय प्रताप सिंह, बृजेंद्र उर्फ दीपू को शैक्षिक प्रमाणपत्रों को जांच में सही बताया था। वहीं मौजूदा एसआई राजेश कुमार ने उसी केस डायरी में इन्हीं शिक्षकों के दस्तावेजों की जांच की तो उन्हें फर्जी पाया।

दो को गिरफ्तार कर भेजा था जेल
इसके बाद शुक्रवार को पुलिस ने अनिल कुमार और बृजेंद्र उर्फ दीपू को गिरफ्तार करके जेल भी भेज दिया। वहीं, शेष दोनों शिक्षक फरार हो गए। लेकिन अभी भी फर्जी दस्तावेजों पर शिक्षा विभाग में नौकरी दिलाने वाले राजीव सिंह को पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकी है, जबकि कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल हो चुका है।

ये है मामला
बर्रा संघर्षनगर निवासी संदीप राठौर ने 19 अगस्त 2022 में एमपी, ग्वालियर के चंद्रनगर निवासी ममेरे बहनोई रेलवेकर्मी राजीव सिंह राठौर, उनकी पत्नी बबिता, राजीव के कल्याणपुर निवासी साथी रामशरण कश्यप व उनके नौकर धर्मेंद्र के खिलाफ फर्जी दस्तावेज तैयार कर नौकरी लगवाने, धमकाने समेत अन्य धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई थी। आरोप था कि राजीव ने शिक्षा विभाग में नौकरी लगवाने के नाम पर उनसे 34 लाख रुपये ठगे थे और फर्जी नियुक्ति पत्र थमा दिया था। इनमें पुलिस सिर्फ राम शरण कश्यप को गिरफ्तार कर सकी है।

गंभीर प्रकरण में पूर्व विवेचकों की ओर से इतनी लापरवाही क्यों हुई है, इसकी जांच की जाएगी। प्रकरण में शेष आरोपियों की जल्द गिरफ्तारी के प्रयास किए जा रहे हैं। फरार आरोपियों के खिलाफ कोर्ट से एनबीडब्ल्यू भी जारी कराया जाएगा।  -अभिषेक पांडेय, एसीपी नौबस्ता

माफिया खुद को बताता रेलवे में बाबू, कैसे बना 10 करोड़ की बेनामी संपत्ति का मालिक?
ठगी का शिकार हुए संदीप के अनुसार ममेरे बहनोई माफिया राजीव सिंह राठौर खुद को ग्वालियर में रेलवे में आरएमएस में बाबू बताता है। इसके बाद भी उसने लोगों को ठगी का शिकार बनाकर काली कमाई से 10 करोड़ से अधिक की संपत्ति बना ली। संदीप राठौर ने पुलिस को बताया कि गिरोह के सरगना राजीव सिंह ने ग्वालियर के चंद्रनगर में चार करोड़, भर्थना में 1.5 करोड़, अयोध्या राम मंदिर के पास चार पार्टनरों के साथ मिलकर करीब 2.5 करोड़, कन्नौज तिरवा के कपूरापुर में 55 लाख की बेनामी संपत्ति बना रखी है। सवाल इस बात का भी उठता है कि रेलवे का बाबू इतनी बड़ी संपत्ति कैसे अर्जित कर सकता है?

लिस्ट में 26 और थे शामिल, जिन्हें दिया था झांसा
संदीप के हाथ माफिया राजीव राठौर और उसके साथी राम शरण कश्यप की हैंडराइटिंग में 26 नामों की लिस्ट लगी थी। पुलिस ने इस लिस्ट को कोर्ट में दाखिल की गई चार्जशीट में शामिल किया है। आरोप है कि लिस्ट में शामिल कानपुर, कानपुर देहात, प्रयागराज, कन्नौज आदि जगहों के रहने वाले लोगों से भी नौकरी लगवाने के नाम पर लाखों रुपये की ठगी की गई है।

रामसरन के खातें में मिले थे नौ लाख, पुलिस ने फ्रीज करवाए
पुलिस ने जब जांच शुरू की तो सरगना के साथी रामशरण के पनकी में स्थित एसबीआई शाखा में खुले खाते में नौ लाख रुपये मिले। पुलिस ने इन रुपयों को फ्रीज करवा दिया था। रामशरण को इसी साल 29 मई को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था।

फर्जीवाड़े के सूत्रधार......
सरगना : राजीव सिंह राठौर

वर्ष 2001 से वर्ष 2009 के बीच माफिया ने शिक्षा विभाग में सेटिंग बैठाकर कानपुर देहात, इटावा, कन्नौज, औरैया आदि जिलों में अपने रिश्तेदारों और परिचितों से मोटी रकम वसूलकर नौकरियां लगवाईं। इसके बाद से वह लोगों से नौकरी के नाम पर मोटी रकम वसूलने के लिए इन्हीं लोगों के उदाहरण पेश करता था। विभाग में नौकरी करता देख लोग उसके झांसे में भी आ जाते थे। राजीव मध्य प्रदेश के ग्वालियर का रहने वाला है। अभी फरार है।

दोस्त: राम शरण कश्यप
माफिया राजीव सिंह मूलरूप से कानपुर देहात के रसूलाबाद का रहने वाला है। वहीं, कल्याणपुर निवासी उसका साथी राम शरण कश्यप का ननिहाल है। राजीव सिंह और राम शरण बचपन से दोस्त भी हैं। राजीव सिंह ने इसी दोस्ती को निभाते हुए राम शरण को अपने फर्जीवाड़े में पार्टनर बना लिया। राम शरण का काम भी लोगों को फंसाना था, जिसके लिए उसे हिस्सा मिलता था। अभी जेल में बंद है।

पत्नी: बबिता
राजीव सिंह की पत्नी का भी इस फर्जीवाड़े में बड़ा हाथ है। पुलिस सूत्रों के अनुसार राजीव जब लोगों को नौकरी लगवाने का झांसा देता था तो बबिता उन्हें अपने रिश्तेदारों को भी पति की बदौलत सरकारी नौकरी मिलने का प्रलोभन देकर उनके रकम निकलवाती थी। बबिता मध्य प्रदेश के ग्वालियर का रहने वाली है। अभी फरार है।

नौकर धर्मेंद्र को मिली क्लीन चिट
संदीप ने राम शरण के नौकर बर्रा निवासी धर्मेंद्र को भी मुकदमे में आरोपी बनाया था, लेकिन पुलिस को उसकी भूमिका नहीं मिली थी। इसके बाद उसका नाम मुकदमे से हटा दिया गया था। दो अन्य अज्ञात की पुलिस अब तक पहचान नहीं कर सकी। इस तरह से कुल छह अभियुक्तों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।

ये सवाल करते पुलिस की मिलीभगत की तरफ इशारा

  • पीड़ित ने पुलिस को दी शिकायत में दर्जनों लोगों के ठगे जाने की बात कही थी। शिक्षा विभाग में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी करने वालों के नाम पुलिस को सौंपे। इसके बाद उनके खिलाफ कार्रवाई करने में पुलिस को एक साल का समय क्यों लग गया?
  • तत्कालीन सीपी विजय सिंह मीणा ने तत्कालीन थाना प्रभारी दीनानाथ मिश्रा को एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए। इसके बाद भी थाना प्रभारी को 52 दिन का समय सिर्फ जांच करने और आरोपियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने में क्यों लगा?
  • आरोपियों ने बड़े पैमाने पर लोगों से ठगी की। शिक्षा विभाग में बड़े पैमाने पर लोगों की फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरियां लगवाईं। फिर तत्कालीन थाना प्रभारी ने उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने के बजाय थाने में बैठाकर दोनों पक्षों में समझौता क्यों कराया?
  • यदि वर्तमान विवेचक राजेश कुमार सिंह के द्वारा केस डायरी के काटे गए पर्चों में नौकरी करने वाले शिक्षकों के दस्तावेज फर्जी थे तो पूर्व विवेचक इंस्पेक्टर रजनीश यादव ने बिना किसी जांच के अपने कार्ट गए पर्चों में शिक्षकों के दस्तावेजों को सही कैसे ठहरा दिया था?
  • बड़े स्तर की धोखाधड़ी और शिक्षा विभाग में नौकरी लगवाने वाले गिरोह के सक्रिय होने के दर्ज मामले में पुलिस के आलाधिकारियों ने भी अपने मातहतों से प्रकरण का कभी कोई फॉलोअप क्यों नहीं किया?
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