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दो छप्परों में रहने को मजबूर है 15 लोगों का परिवार, पति की सांस उखड़ी तो पत्नी बन गई मनरेगा मजदूर
Fri, 05 Jun 2020 07:03 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा
प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Fri, 05 Jun 2020 07:03 PM IST
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लॉकडाउन में घरों को लौटे प्रवासी श्रमिक
- फोटो : amar ujala
कोरोना संकट से उपजी स्थितियों ने बिधनू के मगरासा निवासी रामसजीवन के परिवार के सामने अजीब समस्या खड़ी कर दी है। जिन दिक्कतों केे चलते इनके दो बेटे घर छोड़कर गुजरात गए थे, इस महामारी ने फिर उन्हीं परेशानियों के बीच धकेल दिया है। दरअसल, लॉकडाउन की वजह से जब ये कमाऊ पूत घर लौटे तो इन्हें रहने के लिए कोई कमरा नहीं मिला।
सोने के लिए छत कम पड़ गई। 15 लोगों का यह परिवार अब दो छप्परों के नीचे रहने को मजबूर है। रामसजीवन के परिवार में पत्नी के अलावा छह बेटे, तीन बेटियां, दो बहुएं और दो पोते हैं। घर के नाम पर दो कच्चे कमरे हैं। ये कमरे घर की छह महिलाओं के सिर छिपाने के ही काम आते हैं। घर पर जगह न होने से ही इनके दो बेटे चंद्रराम और शेषनारायण रोजी-रोटी की तलाश में सूरत (गुजरात) चले गए थे।
दोनों बीते चार वर्षों से एक धागा फैक्टरी में काम कर रहे थे। चंद्रराम के दो बड़े भाई कानपुर आकर मजदूरी करते हैं। जबकि दो छोटे भाई पढ़ाई कर रहे हैं। चंद्रराम और शेषनारायण की कमाई से ही घर की जरूरतें पूरी होती थीं। दोनों की कोशिश थी कि कुछ रुपये जुटाकर घर में खाली पड़ी जमीन पर एक-दो कमरे और बन जाएं। जिससे परिवार का ठीक से गुजर बसर हो जाए, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। महामारी में धागा फैक्टरी बंद हुई तो काम छूट गया। मजबूरी में इन्हें गांव लौटना पड़ा।
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सोने के लिए छत कम पड़ गई। 15 लोगों का यह परिवार अब दो छप्परों के नीचे रहने को मजबूर है। रामसजीवन के परिवार में पत्नी के अलावा छह बेटे, तीन बेटियां, दो बहुएं और दो पोते हैं। घर के नाम पर दो कच्चे कमरे हैं। ये कमरे घर की छह महिलाओं के सिर छिपाने के ही काम आते हैं। घर पर जगह न होने से ही इनके दो बेटे चंद्रराम और शेषनारायण रोजी-रोटी की तलाश में सूरत (गुजरात) चले गए थे।
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दोनों बीते चार वर्षों से एक धागा फैक्टरी में काम कर रहे थे। चंद्रराम के दो बड़े भाई कानपुर आकर मजदूरी करते हैं। जबकि दो छोटे भाई पढ़ाई कर रहे हैं। चंद्रराम और शेषनारायण की कमाई से ही घर की जरूरतें पूरी होती थीं। दोनों की कोशिश थी कि कुछ रुपये जुटाकर घर में खाली पड़ी जमीन पर एक-दो कमरे और बन जाएं। जिससे परिवार का ठीक से गुजर बसर हो जाए, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। महामारी में धागा फैक्टरी बंद हुई तो काम छूट गया। मजबूरी में इन्हें गांव लौटना पड़ा।
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घर लौटना भी बना परेशानी का कारण
- फोटो : amar ujala
बरसात में बढ़ेगी परेशानी
घर में रहने की पुरानी समस्या खड़ी हुई तो सामंजस्य इस तरह बना कि महिलाएं कमरों में रहेंगी और पुरुष छप्पर या खुले आसमान के नीचे। लेकिन रामसजीवन को बरसात की चिंता है। वह कहते हैं कि गर्मी तो जैसे-तैसे काट लेंगे। बारिश में बड़ा परिवार लेकर गुजर करना मुश्किल होगा।
15 में तीन लोग कमाने वाले
अभी तक चंद्रराम और शेषनारायण के अलावा रामसजीवन स्वयं और इनके दो बेटे मजदूरी करके परिवार चला रहे थे। लेकिन अब दो बेटे बेरोजगार होकर लौटे हैं। रामसजीवन भी सांस के रोगी हो गए हैं। इनसे अब काम नहीं हो पाता है। शहर में मजदूरी बंद है तो बड़े बेटों के हाथ भी खाली हैं। जब तब मनरेगा में ही काम मिल पाता है। बीते एक महीने से रामसजीवन की जगह उनकी पत्नी काम कर रही हैं।
मजदूरी के अलावा कोई काम नहीं
चंद्रराम व शेषनारायण कहते हैं कि सूरत में वे सिर्फ 10 हजार रुपये ही कमा रहे थे। लेकिन इतनी दूर इसलिए गए क्योंकि कानपुर में इतना भी पैसा मिलना मुश्किल था। उनके जैसे कम पढ़े लिखे लोगों के लिए कानपुर में मजदूरी और मनरेगा के अलावा कोई काम नहीं। जबकि गुजरात में किसी भी फैक्टरी में चले जाइए, खड़े-खड़े आठ से 10 हजार रुपये की नौकरी मिल जाती है।
घर में रहने की पुरानी समस्या खड़ी हुई तो सामंजस्य इस तरह बना कि महिलाएं कमरों में रहेंगी और पुरुष छप्पर या खुले आसमान के नीचे। लेकिन रामसजीवन को बरसात की चिंता है। वह कहते हैं कि गर्मी तो जैसे-तैसे काट लेंगे। बारिश में बड़ा परिवार लेकर गुजर करना मुश्किल होगा।
15 में तीन लोग कमाने वाले
अभी तक चंद्रराम और शेषनारायण के अलावा रामसजीवन स्वयं और इनके दो बेटे मजदूरी करके परिवार चला रहे थे। लेकिन अब दो बेटे बेरोजगार होकर लौटे हैं। रामसजीवन भी सांस के रोगी हो गए हैं। इनसे अब काम नहीं हो पाता है। शहर में मजदूरी बंद है तो बड़े बेटों के हाथ भी खाली हैं। जब तब मनरेगा में ही काम मिल पाता है। बीते एक महीने से रामसजीवन की जगह उनकी पत्नी काम कर रही हैं।
मजदूरी के अलावा कोई काम नहीं
चंद्रराम व शेषनारायण कहते हैं कि सूरत में वे सिर्फ 10 हजार रुपये ही कमा रहे थे। लेकिन इतनी दूर इसलिए गए क्योंकि कानपुर में इतना भी पैसा मिलना मुश्किल था। उनके जैसे कम पढ़े लिखे लोगों के लिए कानपुर में मजदूरी और मनरेगा के अलावा कोई काम नहीं। जबकि गुजरात में किसी भी फैक्टरी में चले जाइए, खड़े-खड़े आठ से 10 हजार रुपये की नौकरी मिल जाती है।