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गांवों में बिजली संकट से बिलबिलाए लोग
ब्यूरो/अमर उजाला, कानपुर देहात
Updated Sun, 03 May 2015 12:09 AM IST
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मौसम की मिजाज ज्यों-ज्यों गरमा रहा है, बिजली आपूर्ति की व्यवस्था चरमरा
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रही हैं। ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को कहना है 24 घंटे में बमुश्किल रात
में ही पांच घंटे बिजली मिल पा रही है। बिजली की समस्या से लोगों की नींद
पूरी नहीं हो पा रही है। वहीं पूरी क्षमता से नलकूप न चलने पर जायद की
फसलें भी मुरझा रही हैं।
हारामऊ निवासी उपेंद्र मिश्र ने बताया कि उनके गांव को पुखरायां बिजलीघर से जोड़ा गया है। गांव में बिजली कब आएगी, इसका कोई भरोसा नहीं है। कभी दोपहर में आई तो शाम को चली जाती है। कभी रात 12 बजे और कभी भोर पहर आती है तो दिन में गुल रहती है। विद्युत आपूर्ति की अनिश्चितता से जहां ग्रामीणों की दिनचर्या अस्तव्यस्त है वहीं कृषि कार्य भी समय पर नहीं हो पा रहे हैं।
डुड़ियामऊ के संजय सिंह किसान ने बताया कि उनके गांव को बरौर विद्युत उपकेंद्र के देबीपुर फीडर से सप्लाई दी जाती हैं। जो रात 1 बजे या 3 बजे से सवेरे 7 बजे तक ही मिलती है। नलकूप पूरी क्षमता से नहीं चल पा रहे हैं और जायद की फसलें मुरझा रही हैं।
मलासा के रामबाबू सिंह बताते हैं कि आजादी के बाद क्षेत्र में सबसे पहले उनके गांव का विद्युतीकरण कराया गया था। अब कभी तार टूटने और कभी ट्रांसफार्मर जलने से महीनों बिजली गुल रहती है। खासकर जब से इस गांव को मुतहरापुर विद्युत उपकेंद्र से जोड़ा गया है, तब से हालात बदतर हो गए हैं। पहले यह गांव पुखरायां के बिजलीघर से जुड़ा था।
विदखुरी की पूर्व क्षेत्रपंचायत सदस्य रमा सचान का कहना है कि बिजली न आने पर रात में मच्छर नींद हराम करते हैं। खाना-पीना और घरेलू काम भी प्रभावित होते हैं। वहीं दिन में बिजली संकट से उमस बेचैन करती है। कूलर, पंखे, फ्रिज किसी काम के नहीं रह गए है।
हारामऊ निवासी उपेंद्र मिश्र ने बताया कि उनके गांव को पुखरायां बिजलीघर से जोड़ा गया है। गांव में बिजली कब आएगी, इसका कोई भरोसा नहीं है। कभी दोपहर में आई तो शाम को चली जाती है। कभी रात 12 बजे और कभी भोर पहर आती है तो दिन में गुल रहती है। विद्युत आपूर्ति की अनिश्चितता से जहां ग्रामीणों की दिनचर्या अस्तव्यस्त है वहीं कृषि कार्य भी समय पर नहीं हो पा रहे हैं।
डुड़ियामऊ के संजय सिंह किसान ने बताया कि उनके गांव को बरौर विद्युत उपकेंद्र के देबीपुर फीडर से सप्लाई दी जाती हैं। जो रात 1 बजे या 3 बजे से सवेरे 7 बजे तक ही मिलती है। नलकूप पूरी क्षमता से नहीं चल पा रहे हैं और जायद की फसलें मुरझा रही हैं।
मलासा के रामबाबू सिंह बताते हैं कि आजादी के बाद क्षेत्र में सबसे पहले उनके गांव का विद्युतीकरण कराया गया था। अब कभी तार टूटने और कभी ट्रांसफार्मर जलने से महीनों बिजली गुल रहती है। खासकर जब से इस गांव को मुतहरापुर विद्युत उपकेंद्र से जोड़ा गया है, तब से हालात बदतर हो गए हैं। पहले यह गांव पुखरायां के बिजलीघर से जुड़ा था।
विदखुरी की पूर्व क्षेत्रपंचायत सदस्य रमा सचान का कहना है कि बिजली न आने पर रात में मच्छर नींद हराम करते हैं। खाना-पीना और घरेलू काम भी प्रभावित होते हैं। वहीं दिन में बिजली संकट से उमस बेचैन करती है। कूलर, पंखे, फ्रिज किसी काम के नहीं रह गए है।