UP: चार दशक से हाथ को नहीं मिला मतदाताओं का साथ, इंदिरा लहर के बाद से डूबता जहाज बनती चली गई थी पार्टी
Banda News: पुराने कांग्रेसी कम होते जा रहे हैं और नए बनने वालों की संख्या है कि बढ़ नहीं रही है। पहली बार वोटर बने कम युवाओं को शायद ही मालूम हो कि इसी बुंदेलखंड की धरती पर आज जिस कांग्रेस के पास नेताओं का अभाव सा है। वहीं से यही कांग्रेस पार्टी दो-चार, 10 नहीं बल्कि 16 चुनाव जीत चुकी है।
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कभी दो बैलों की जोड़ी चुनाव चिह्न के साथ दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने वाली कांग्रेस का बुंदेलखंड में पुरसाहाल नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर में 1984 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को शानदार जीत मिली। इसके बाद से ही कांग्रेस राजनीतिकों के लिए डूबता जहाज बनती चली गई। आज हालात यह है कि बीते चार दशकों से कांग्रेस का सूरज अस्त पड़ा है। कभी जीत की हैट्रिक लगाने वाली पार्टी को 2024 में सपा के साथ गठबंधन तक के लिए मजबूर होना पड़ा है।
पुराने कांग्रेसी कम होते जा रहे हैं और नए बनने वालों की संख्या है कि बढ़ नहीं रही है। पहली बार वोटर बने कम युवाओं को शायद ही मालूम हो कि इसी बुंदेलखंड की धरती पर आज जिस कांग्रेस के पास नेताओं का अभाव सा है, वहीं से यही कांग्रेस पार्टी दो-चार, 10 नहीं बल्कि 16 चुनाव जीत चुकी है। 90 के दशक में क्षेत्रीय दलों सपा और बसपा की इंट्री के बाद तो कांग्रेस का जो पतन शुरू हुआ, वह भाजपा के पैठ जमाने तक सूपड़ा साफ की सीमा तक पहुंच गया। इसके बाद कांग्रेस कभी तीसरे तो कभी चौथे नंबर के लिए संघर्ष करती नजर आई। प्रस्तुत है कांग्रेस के सुनहरे दौर से हाशिए पर आने तक के सफर पर नीरज दीक्षित की रिपोर्ट...
बांदा-चित्रकूट लोकसभा सीट
चार बार जीत का परचम लहरा चुकी है कांग्रेस
दिनेश सिंह, वह नाम है जिन्होंने इस सीट पर 1957 के लोकसभा चुनाव से पार्टी का खाता खोला था। इसके बाद कांग्रेस सबसे पहली महिला प्रत्याशी सावित्री निगम को 1962 के चुनाव में उतारा और सावित्री ने भी सीट जीतकर कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने का काम किया। इसके बाद वह दौर भी आया जब मतदाताओं ने अपना मूड बदला तो कांग्रेस की कुर्सी खिसकते देर न लगी। यही सीट 1967 में कम्युनिस्ट पार्टी के जागेश्वर यादव, 1971 में जनसंघ के रामरतन शर्मा और 1977 में जनता पार्टी के अंबिका प्रसाद ने जीती। लगा कि कांग्रेस समाप्त हो गई, मगर ऐसा नहीं हुआ। 1980 के चुनाव में एक बार कांग्रेस ने कमबैक किया और रामनाथ दुबे चुनाव जीते। इसके बाद 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या के बाद हुए चुनाव में भीष्म देव दुबे ने भारी मतों से जीत हासिल की। तब से लेकर आज तक कांग्रेस एक जीत को तरस रही है। 2019 के चुनाव में बाल कुमार पटेल मैदान में थे और तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा था।
हमीरपुर-तिंदवारी- महोबा सीट
हैट्रिक के साथ लगातार जीते पांच चुनाव
इस लोकसभा जीत पर तो आजादी के बाद से ही कांग्रेस का ऐसा जादुई करिश्मा चला कि शुरुआत ही हैट्रिक से हुई। 1952,1957 और 1962 के लगातार हुए तीनों चुनाव पार्टी के मनुलाल द्विवेदी ने जीते। तीनों ही चुनाव में कांग्रेस की आंधी के सामने किसी भी दल का प्रत्याशी टिक न सका। इतना ही नहीं 1967 के चौथे और 1971 के पांचवें चुनाव में भी कांग्रेस के ही स्वामी ब्रहमानंद ने ही जीत हासिल कर कांग्रेस के किले को अभेद बना दिया था। 1977 के चुनाव में भारतीय लोकदल के तेज प्रताप सिंह ने चुनाव जीतकर कांग्रेस के किले में सेंध तो जरूर लगाई, लेकिन उसे ढहा न सके। लिहाजा इसके अगले ही चुनाव 1980 में कांग्रेस की हवा फिर से चली और सीट पार्टी के प्रत्याशी डूंगर सिंह ने जीत ली। 1984 में तो कांग्रेस की हवा आंधी में तब्दील हो गई और यहां से स्वामी प्रसाद सिंह ने जीत तो हासिल की और वह कांग्रेस के अंतिम विजेता सांसद बने। 2019 के चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी प्रीतम सिंह किसान तीसरे नंबर पर रहे।
जालौन-भोगनीपुर-गरौंठा सीट
चौधरी परिवार के हाथों रहा कांग्रेस का झंडा
इस संसदीय सीट पर लंबे समय तक कांग्रेस से एक ही परिवार चौधरी घराने का कब्जा रहा है। 1952 में चौधरी लोटनराम ने जीत दर्ज की। इसके बाद 1957 में चौधरी लच्छीराम और फिर उन्हीं के परिवार के रामसेवक चौधरी ने 1962 में यहां से जीत का जो सिलसिला शुरू किया, वह उनकी हैट्रिक पर जाकर खत्म हुआ। रामसेवक ने 62 के बाद लगातार 1967 व 1971 के चुनाव में जीत हासिल कर कांग्रेस के ग्राफ को ऊंचाईयों तक पहुंचाने का काम किया। 1977 के चुनाव में जब पूरे सूबे में बदलाव की बयार चली तो इस सीट पर भी जनता पार्टी के रामचरन दोहरे ने चुनाव में जीत हासिल कर कांग्रेस का तिलस्म तोड़ा। मगर जनता पार्टी को सिमटते देर न लगी और ठीक बाद में हुए 1980 के चुनाव में नाथूराम शाक्यवार और 1984 में चौधरी परिवार के लच्छीराम ने ही कांग्रेस का प्रत्याशी बनकर पार्टी के लिए आखिरी जीत हासिल की। फिर कभी बसपा तो सपा और आखिरी में भाजपा के कारण कांग्रेस के लिए जीत एक सपना बनकर ही रह गई। पिछले चुनाव 2019 में यहां से बृजलाल खाबरी कांग्रेस के प्रत्याशी रहे और तीसरे स्थान पर रहे।