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UP: कानपुर में ही बनती हैं टीन और लकड़ी से बनी नाव, कई राज्यों में होती है सप्लाई...बुलावे पर जाते हैं कारीगर

Tue, 25 Jul 2023 05:00 PM IST
हिमांशु अवस्थी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: हिमांशु अवस्थी Updated Tue, 25 Jul 2023 05:00 PM IST
सार

Kanpur News: नाव बना रहे प्रदीप निषाद कहते हैं कि बताया कि अब धंधे में कुछ नहीं रह गया है। मैं चौथी पीढ़ी में ये काम कर रहा हूं। नहीं चाहता कि, हमारी आगे की पीढ़ी भी यही कार्य करे। इसलिए उसे पढ़ा रहा हूं।

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Boats made of tin and wood are made in Kanpur only, supplies are made in many states, Artisans go on invitatio
नाव बनाते कारीगर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कानपुर शहर की नाव गुजरात, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश सहित देशभर की नदियों में तैर रही हैं। उद्योगों की नगरी में शुमार नाव बनाने में भी हब बना हुआ है। सरसैया घाट पर रहने वाले निषाद परिवारों के गुजर-बसर का यही साधन है। उनके मुताबिक बारिश के सीजन में करीब 70-80 प्रतिशत डिमांड बढ़ जाती है।

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घाट किनारे करीब 60 से 70 परिवार रहते हैं। एक परिवार बारिश के सीजन में 30 से 40 नाव का निर्माण कर बेचता है। टीन और लकड़ी से बनी नाव सिर्फ कानपुर में ही बनती है। इनका आकार 14 से 36 फुट तक होता है। नाव की चादर 24 गेज से 18 गेज तक रखते हैं। नाव की कीमत 15 से लेकर 25 हजार तक होती है।
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परेशान हैं निषाद
ओमकार निषाद ने बताया कि, हमारे पास रहने को घर नहीं है। जो बारिश के सीजन में कमाते हैं। वो बाकी 8 महीनें बैठकर खाना पड़ता है। कर्जा अलग से चढ़ जाता है। नाव बनाने के लिए भी जगह नहीं है। जब भी नाव बनाओ कोई भी आकर कह देता है कि, रास्ता खाली करो। नाव हटाओ।

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नगर निगम करता है चालान
कई बार नगर निगम के कर्मी भी आकर डांटते हैं। चालान करने की बात भी करते हैं। बच्चों को पढ़ाने तक के लिए पैसे नहीं है। ऐसे में हमारी पांचवी पीढ़ी भी इसी काम में लगी है। मेरा बेटा चंद्रमा निषाद नाव बनाने में मेरी मदद करता है। सरकार से भी अगर हमे कुछ मदद मिल जाए तो राहत हो।

बुलावे पर जाते हैं कारीगर
नाव बना रहे प्रदीप निषाद से बातचीत की, तो उन्होंने बताया कि, जिस नाव का निर्माण कर रहे हैं ये बलरामपुर जाएगी। उनकी नावें यहां से देशभर में जाती हैं। वे भी बुलावे पर अहमदाबाद, नैनीताल, ग्वालियर, जबलपुर सहित कई जगह जाते हैं। प्रदीप ने कहा कि, धंधे में कुछ नहीं रह गया है। मैं चौथी पीढ़ी में ये काम कर रहा हूं।

नहीं चाहते..अगली पीढ़ी करे काम
मैं नहीं चाहता कि, हमारी आगे की पीढ़ी भी यही कार्य करे। इसलिए उसे पढ़ा रहा हूं। मेरी बेटी डीसी लॉ कॉलेज से एलएलबी कर रही है। और बेटा नौंवी में पढ़ रहा है। कर्जा लेकर उन्हें पढ़ा रहे हैं। लेकिन अब आगे ये काम और नहीं। उन्होंने बताया कि, हमने सबसे बड़ी नाव कालागढ़ डैम के लिए बनाई।

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