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तीसरी लहर तैयारी बेअसर: करोड़ों के पीएचसी... बिना चिकित्सक ‘मिट्टी’, भगवान भरोसे है व्यवस्था
Tue, 01 Jun 2021 02:11 PM IST
शिखा पांडेय
राहुल त्रिपाठी, अमर उजाला, कानपुर
राहुल त्रिपाठी, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Tue, 01 Jun 2021 02:11 PM IST
सार
कोरोना की तीसरी लहर की चुनौतियों के बीच बिल्हौर क्षेत्र के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की व्यवस्था ही भगवान भरोसे है। शिवराजपुर क्षेत्र के चार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रभारी चिकित्सक ही नहीं आते हैं।
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मुश्ता पीएचसी परिसर में बंधे पालतू पशु
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
बिल्हौर में ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) डॉक्टर और स्टाफ की कमी से जूझ रहे हैं। करोड़ों की लागत से बने भवन खंडहर हो रहे हैं। कहीं इलाज की व्यवस्था फार्मासिस्ट के भरोसे है तो कोई पीएचसी महज टीकाकरण केंद्र बनकर रह गया है।
शिवराजपुर ब्लॉक के गौरन निवादा, बीरामऊ, डोडवा जमौली और मुश्ता में पीएचसी का कुछ ऐसा ही हाल है। बीरामऊ पीएचसी की डॉक्टर मैटरनिटी लीव पर हैं तो उनकी जगह फार्मासिस्ट मरीजों का इलाज कर रही है। डुडवा जमौली के डॉक्टर कई माह से आए ही नहीं तो मुश्ता के प्रभारी ने कोरोना कर्फ्यू मना लिया है।
यही हाल आंटी पीएचसी का भी है। पड़ताल में सामने यह आया है कि संसाधनों के अभाव में कोई चिकित्सक इन केंद्रों पर आना ही नहीं चाहता। वीरान पड़े कुछ पीएचसी में कंटीली झाड़ियां उग आई हैं तो कहीं ग्रामीणों ने भूसा और गेहूं भर रखा है।
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इससे साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि कोरोना की तीसरी लहर में भी ये पीएचसी किसी के काम आने से रहे। हालांकि, सीएचसी प्रभारी यह दावा करते हैं कि पीएचसी के डॉक्टरों की ड्यूटी कोविड कंट्रोल रूम में लगने की वजह से यह स्थिति उत्पन्न हुई है।
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शिवराजपुर ब्लॉक के गौरन निवादा, बीरामऊ, डोडवा जमौली और मुश्ता में पीएचसी का कुछ ऐसा ही हाल है। बीरामऊ पीएचसी की डॉक्टर मैटरनिटी लीव पर हैं तो उनकी जगह फार्मासिस्ट मरीजों का इलाज कर रही है। डुडवा जमौली के डॉक्टर कई माह से आए ही नहीं तो मुश्ता के प्रभारी ने कोरोना कर्फ्यू मना लिया है।
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यही हाल आंटी पीएचसी का भी है। पड़ताल में सामने यह आया है कि संसाधनों के अभाव में कोई चिकित्सक इन केंद्रों पर आना ही नहीं चाहता। वीरान पड़े कुछ पीएचसी में कंटीली झाड़ियां उग आई हैं तो कहीं ग्रामीणों ने भूसा और गेहूं भर रखा है।
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इससे साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि कोरोना की तीसरी लहर में भी ये पीएचसी किसी के काम आने से रहे। हालांकि, सीएचसी प्रभारी यह दावा करते हैं कि पीएचसी के डॉक्टरों की ड्यूटी कोविड कंट्रोल रूम में लगने की वजह से यह स्थिति उत्पन्न हुई है।
बीरामऊ में बिजली न पानी, स्वीपर भी नहीं
बीरामऊ र्पीएचसी का हाल यह है कि पूरे परिसर में जगह-जगह बबूल और कंटीली झाड़ियां उग आई हैं। यहां तैनात फार्मासिस्ट अर्चना त्रिवेदी ने बताया कि डॉ. मधू चौधरी मैटरनिटी लीव पर हैं, जबकि डॉ. चातेंद्र पिछले कई माह से कोविड कंट्रोल रूम में तैनात हैं।
वार्ड ब्वॉय है नहीं। ऐसे में वही मरीजों का इलाज कर रही हैं। सफाईकर्मी न होने से खुद और ग्रामीणों की मदद लेकर सफाई करानी पड़ रही है। बिजली न होने से गर्मी में बैठना मुश्किल होता है। फर्नीचर और बेड जर्जर हालत में हैं। मरीजों की जांच के लिए उपकरण तक नहीं है, सिर्फ सामान्य दवाएं ही डॉक्टरों से पूछकर देती हैं। आवासीय परिसर जर्जर होने से यहां आज तक कोई डॉक्टर या कर्मचारी नहीं रुका। बीरामऊ ग्राम प्रधान सुमन और उनके पति विनोद ने बताया कि कोई डॉक्टर-कर्मी अस्पताल आता ही नहीं। यहां सब भगवान भरोसे है।
डुड़वा जमौली में महीनों से नहीं आए डॉक्टर
डुड़वा जमौली के पास प्रदेश का सबसे बड़ा एनटीपीसी सोलर पॉवर प्लांट लग रहा है। यहां हजारों की संख्या में गैर प्रांतों के श्रमिक काम करते हैं। इलाज की जरूरत पड़ने पर यहां के कर्मचारी और आसपास के गांवों के मरीज डुड़वा जमौली पीएचसी न जाकर उत्तरीपुरा या फिर सीएचसी बिल्हौर और शिवराजपुर का रुख करते हैं। इस पीएचसी में महीनों से डॉक्टर के दर्शन तक नहीं हुए हैं। गिनती के नर्सिंग स्टाफ के भरोसे दवाएं देने और टीकाकरण का काम चल रहा है। ग्रामीणों ने बताया कि शाम ढलते ही कुछ लोग पीएचसी परिसर में अपने पालतू पशु बांध देते है। साथ ही चारा, ईंधन और अनाज भी परिसर में ही रख रहे हैं।
बीरामऊ र्पीएचसी का हाल यह है कि पूरे परिसर में जगह-जगह बबूल और कंटीली झाड़ियां उग आई हैं। यहां तैनात फार्मासिस्ट अर्चना त्रिवेदी ने बताया कि डॉ. मधू चौधरी मैटरनिटी लीव पर हैं, जबकि डॉ. चातेंद्र पिछले कई माह से कोविड कंट्रोल रूम में तैनात हैं।
वार्ड ब्वॉय है नहीं। ऐसे में वही मरीजों का इलाज कर रही हैं। सफाईकर्मी न होने से खुद और ग्रामीणों की मदद लेकर सफाई करानी पड़ रही है। बिजली न होने से गर्मी में बैठना मुश्किल होता है। फर्नीचर और बेड जर्जर हालत में हैं। मरीजों की जांच के लिए उपकरण तक नहीं है, सिर्फ सामान्य दवाएं ही डॉक्टरों से पूछकर देती हैं। आवासीय परिसर जर्जर होने से यहां आज तक कोई डॉक्टर या कर्मचारी नहीं रुका। बीरामऊ ग्राम प्रधान सुमन और उनके पति विनोद ने बताया कि कोई डॉक्टर-कर्मी अस्पताल आता ही नहीं। यहां सब भगवान भरोसे है।
डुड़वा जमौली में महीनों से नहीं आए डॉक्टर
डुड़वा जमौली के पास प्रदेश का सबसे बड़ा एनटीपीसी सोलर पॉवर प्लांट लग रहा है। यहां हजारों की संख्या में गैर प्रांतों के श्रमिक काम करते हैं। इलाज की जरूरत पड़ने पर यहां के कर्मचारी और आसपास के गांवों के मरीज डुड़वा जमौली पीएचसी न जाकर उत्तरीपुरा या फिर सीएचसी बिल्हौर और शिवराजपुर का रुख करते हैं। इस पीएचसी में महीनों से डॉक्टर के दर्शन तक नहीं हुए हैं। गिनती के नर्सिंग स्टाफ के भरोसे दवाएं देने और टीकाकरण का काम चल रहा है। ग्रामीणों ने बताया कि शाम ढलते ही कुछ लोग पीएचसी परिसर में अपने पालतू पशु बांध देते है। साथ ही चारा, ईंधन और अनाज भी परिसर में ही रख रहे हैं।
आंटी पीएचसी खुलता ही नहीं, कमरों में भरा भूसा-गेहूं
कीरतपुर ग्राम पंचायत के ग्राम प्रधान मुकेश कुमार ने बताया कि आंटी पीएचसी कभी खुलता ही नहीं। यहां डॉक्टर, फार्मासिस्ट भी नहीं आते। कुछ दिन पहले विशेष अभियान के तहत कोरोना टीकाकरण हुआ था, तभी यह अस्पताल खुला था। इससे यहां अराजक तत्वों का जमावड़ा भी लगता है।
बताया गया कि कुछ ग्रामीण अस्पताल में भूसा और गेहूं भी रखते हैं। इस पीएचसी से आंटी, सखरेज, अग्निहोत्री निवादा, कमलापुर, सकरवां, जिंदपुर, दलीप नगर सहित कई गांव जुड़े हैं, पर किसी को कोई लाभ नहीं। ग्रामीण रणजीत सिंह ने बताया कि अस्पताल न खुलने से वह मां का इलाज कराने शिवली जाते हैं। इस तरह यह अस्पताल महज कागजों पर जिंदा है।
मुश्ता में डाक्टर आते नहीं, सिर्फ लगता टीका
मुश्ता की ग्राम प्रधान रामबेटी के पति मुन्नालाल ने बताया कि पीएचसी में सर्दी, जुकाम-बुखार की दवा पहले तो मिल जाती थी, पर जब से कोरोना लगा, तब से न तो डॉक्टर आते हैं और न ही कर्मचारी। इस कारण गांव के लोग या तो झोलाछाप क्लीनिकों से दवा लेते हैं या फिर शिवराजपुर सीएचसी जाते हैं। पीएचसी की चहारदीवारी टूटी होने से छुट्टा पशु और पालतू पशु यहां की सबसे बड़ी समस्या हैं। यही नहीं, परिसर में बनी पानी की टंकी को भरने के लिए सबमर्सिबल लगा है, लेकिन यहां के कर्मचारी इसे चलाते ही नहीं। इससे भूलेभटके कुछ मरीज आते भी हैं तो उन्हें पीने के पानी के लिए हैंडपंप तलाशना पड़ता है।
कीरतपुर ग्राम पंचायत के ग्राम प्रधान मुकेश कुमार ने बताया कि आंटी पीएचसी कभी खुलता ही नहीं। यहां डॉक्टर, फार्मासिस्ट भी नहीं आते। कुछ दिन पहले विशेष अभियान के तहत कोरोना टीकाकरण हुआ था, तभी यह अस्पताल खुला था। इससे यहां अराजक तत्वों का जमावड़ा भी लगता है।
बताया गया कि कुछ ग्रामीण अस्पताल में भूसा और गेहूं भी रखते हैं। इस पीएचसी से आंटी, सखरेज, अग्निहोत्री निवादा, कमलापुर, सकरवां, जिंदपुर, दलीप नगर सहित कई गांव जुड़े हैं, पर किसी को कोई लाभ नहीं। ग्रामीण रणजीत सिंह ने बताया कि अस्पताल न खुलने से वह मां का इलाज कराने शिवली जाते हैं। इस तरह यह अस्पताल महज कागजों पर जिंदा है।
मुश्ता में डाक्टर आते नहीं, सिर्फ लगता टीका
मुश्ता की ग्राम प्रधान रामबेटी के पति मुन्नालाल ने बताया कि पीएचसी में सर्दी, जुकाम-बुखार की दवा पहले तो मिल जाती थी, पर जब से कोरोना लगा, तब से न तो डॉक्टर आते हैं और न ही कर्मचारी। इस कारण गांव के लोग या तो झोलाछाप क्लीनिकों से दवा लेते हैं या फिर शिवराजपुर सीएचसी जाते हैं। पीएचसी की चहारदीवारी टूटी होने से छुट्टा पशु और पालतू पशु यहां की सबसे बड़ी समस्या हैं। यही नहीं, परिसर में बनी पानी की टंकी को भरने के लिए सबमर्सिबल लगा है, लेकिन यहां के कर्मचारी इसे चलाते ही नहीं। इससे भूलेभटके कुछ मरीज आते भी हैं तो उन्हें पीने के पानी के लिए हैंडपंप तलाशना पड़ता है।
सीएचसी शिवराजपुर से आंटी, बीरामऊ, डुड़वा जमौली और मुश्ता पीएचसी अटैच हैं। कई पीएचसी में आयुष चिकित्सक तो कई जगह डॉक्टरों की तैनाती है, लेकिन कोविड-19 के कारण लगभग सभी डॉक्टरों की ड्यूटी कोविड कंट्रोल रूम में लगी है। ऐसे में पीएचसी या तो बंद हैं या फिर विशेष दिनों में टीकाकरण के लिए खोले जाते हैं। बजट के अभाव में कई बार चाहकर भी पीएचसी की स्थिति ठीक नहीं करा पाता हूं।- डॉ. अनुज दीक्षित, सीएचसी प्रभारी, शिवराजपुर