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‘ लगा, अब गई- तब गई जान’

Tue, 28 Apr 2015 02:30 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला कानपुर
ब्यूरो, अमर उजाला कानपुर Updated Tue, 28 Apr 2015 02:30 AM IST
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Amit returned from Nepal City
भूकंप के समय दोस्त के साथ काठमांडू में फंसे एलपीजी वितरक संघ के महामंत्री अमित पांडेय अभी भी बदहवास हैं। कहते हैं कि काठमांडू में भूकंप के समय लगा कि अब जान गई, तब जान गई। जिंदा अपने शहर नहीं पहुंच पाएंगे। जहां भी नजर जा रही थी लाशें ही लाशें नजर आ रही थीं।
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बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की लाशें देखकर दहशत से दिल फटा जा रहा था। कुछ ही पलों में बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों का नामो-निशान मिट गया था। बाबा पशुपति नाथ का जाप करते हुए दिल से एक ही बात निकल रही थी, बाबा कैसे भी घर तक सुरक्षित पहुंचा दो। आखिर बाबा ने सुन ली।
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एयर फोर्स ने साथी समेत सुरक्षित निकालकर दिल्ली पहुंचा दिया। वहां से ट्रेन से शहर आ गए। अमित पांडेय अपने दोस्त अर्पित वाजपेयी के साथ 19 अप्रैल को पोखरा (नेपाल ) गए थे। 24 अप्रैल को काठमांडू पहुंचे और होटल थामिल में रुके। अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा कि 25 अप्रैल का वो मंजर भूल नहीं रहा है।
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दोस्त के साथ वे दोपहर करीब 12 बजे असन मार्केट शॉपिंग के लिए निकले थे। मार्केट में शॉपिंग चालू ही की थी कि उन्हें लगा कि जमीन लक्ष्मण झूला की तरह हिल रही है। मार्केट में अचानक भगदड़ मच गई। लोग भूकंप आया कहते हुए उधर-उधर भागने लगे। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें।

लोगों के साथ वे लोग भी चौराहे की तरफ भागे और खुले में पहुंच गए। तभी बिल्डिंगें गिरने लगीं। सामने स्कूटर खड़ा कर बतिया रहे लोगों पर मलवा गिरा और वह दब गए। जहां भी नजर जा रही थी बिल्डिंगें गिर रही थीं और लोगों की चीख-पुकार सुनाई दे रही थी।

अन्य लोगों की तरह उन्होंने भी खुली रोड पर भागना शुरू कर दिया और थामिल चौराहे पर आ गए। आसपास देखा तो लाशें ही लाशें दिख रही थीं। सब कुछ बदल चुका था।  शॉपिंग से पहले खड़ी देखी इमारतें जमीदोज हो चुकी थीं। भूकंप के झटकों से लग रहा था कि अब बच नहीं पाएंगे। मोबाइल नेटवर्क भी बंद हो चुका था।

तभी फिर से भूकंप आया तो खुले में ही बैठ गए और आंखें बंद कर लीं। थोड़ी देर बाद लोगों ने कहना शुरू किया बच गए...बच गए...। तब आंखें खोलीं। शाम चार बजे होटल पहुंचे तो देखा कि उसमें भी दरारें पड़ चुकीं थी। हर तरफ अफरा-तफरी मची थी। बाद में होटल से बाहर ही सामान मंगवाया और एयरपोर्ट पहुंच गए।


सभी फ्लाइट कैंसिल हो चुकी थीं। खुले में रात गुजारी। भूख बहुत लगी थी लेकिन खाने को वहां कुछ नहीं था। 26 अप्रैल को चार बजे एयरफोर्स का हरक्यूलस सी 17 पहुंचा। इसके बाद 260 लोगों को लेकर दिल्ली आया। दिल्ली में यूपी भवन पहुंचाया गया। वहां खाना मिला। सोमवार शाम को ट्रेन पकड़ कर शहर आ गए।
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