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आशा रखती रोजा शबाना कराती भंडारा

Sun, 12 Jun 2016 01:40 AM IST
सुहेल, अमर उजाला
सुहेल, अमर उजाला Updated Sun, 12 Jun 2016 01:40 AM IST
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Aasha put roja and shabana make bhandara
अमन की दुआ करतीं शबाना-आशा (बाएं से)। - फोटो : amar ujala
 आजाद नगर में रहने वाली आशा और जाजमऊ की शबाना की दोस्ती गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल है। आशा पिछले दस सालों से रोजा रखती आ रही हैं तो शबाना इतने ही समय से कंपनी बाग चौराहे पर स्थित साईं मंदिर में भंडारा कराकर भूखे लोगों का पेट भर रही हैं।
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दोनों का मकसद है, आपसी भाईचारे का संदेश देना, गरीब लोगों की मदद करना। इतना ही नहीं दोनों ही सहेलियां एक दूसरे के त्योहार में शरीक होती हैं। परिवार के लोग भी एक-दूसरे के यहां आते जाते हैं। 
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आशा और शबाना पेशे से वकील हैं। दोनों की मुलाकात 2006 में कचहरी में हुई थी। धीरे-धीरे दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई और दोनों एक दूसरे के त्योहार में शरीक होने लगीं। दीपावली में शबाना अपने घर में दीप जलाती हैं और आशा के साथ होली भी खेलती हैं।
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वहीं आशा भी ईद पर अपने घर में सिवइयां बनाकर लोगों खिलाती हैं और समाज में सौहार्द की मिठास घोलने का काम करती हैं। देवा शरीफ जाकर हरजत वारिस पाक की खानकाह पर हाजिरी लगाना और दोनों के संयुक्त चैंबर में मंदिर और दीवारों पर लिखी कुरान की आयतें हिंदू-मुस्लिम एकता की प्रगाढ़ता को दर्शाती हैं। 
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