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कानपुर देश का सबसे गंदा और असुरक्षित शहर
Kanpur
Updated Sun, 07 Apr 2013 05:30 AM IST
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कानपुर। मेनचेस्टर आफ ईस्ट का तमगा पाने वाला कानपुर गाहे-ब-गाहे होने वाले सर्वेक्षणों में देश के सबसे गंदे शहरों में शुमार तो होता ही रहा है, अब यह देश का सबसे गंदा शहर होने के साथ सबसे अधिक असुरक्षित भी हो गया है। यह तथ्य भारत के कुछ शहरों पर किए गए ‘जन आग्रह’ संस्था के सर्वेक्षण में उजागर हुआ है। इस संस्था ने विभिन्न शहरों में गंदगी और असुरक्षा का स्तर तय करने के लिए जो 21 इंडीकेटर रखे थे, उसमें कानपुर की रैकिंग सबसे नीचे हुई है। जनआग्रह का सर्वेक्षण शहरियों के लिए जितना मायूस करने वाला है उससे ज्यादा चौंकाने वाला।
ऐसा नहीं है कि शहर में ऊर्जा खत्म हो गई है। कानपुर मृतप्राय नहीं अब भी जिंदा शहर है। आईआईटी, एचबीटीआई, चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय और जीएसवीएम मेडिकल कालेज से निकली मेधा की विदेशों में धूम है। बेशकीमती जेहन के शहर के विज्ञानियों ने सिलिकॉन वैली और मेडिकल के क्षेत्र झंडे बुलंद किए हैं, फिर भी इस मेधा को पोसने वाले शहर की यह ताजा तस्वीर इशारा करती है कि वे भी शहर के लिए कुछ करें।
सबसे गंदा शहर होने की तस्दीक यहां प्रदूषण से जुड़े आंकड़े भी करते हैं। आईआईटी और डॉ. मुरारीलाल चेस्ट हॉस्पिटल के सर्वे पर नजर डालेंगे तो पाएंगे कि शहरियों के फेफड़ों की क्षमता 11 फीसदी कम हो गई है। फैक्टरियों और टेनरियों के कचरे ने पौराणिक स्थल बिठूर क्षेत्र की धरती पर गंगाजल ऐसा कर दिया कि मुंह में न रखा जाए। औद्योगिक प्रदूषण ने हवाओं में जहरीले तत्व घोल दिए हैं। शहर में दाखिल होते ही बजबजाते कचरे से निकला बदबू का भभका मुंह से टकराता है।
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ये तो थी गंदगी की बात। अब जरा आपराधिक घटनाओं पर नजर डालें। दिव्या कांड, अलशिफा कांड जैसी रोंगटे खड़ी कर देने वाली घटनाओं ने खौफ पैदा कर दिया कि बच्चियां भी वहशी दरिंदों से सुरक्षित नहीं। हत्या, बलात्कार, छिनैती की घटनाएं तो बेशुमार हैं। ऐसा नहीं कि इस स्थिति के लिए कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैं। कचरा तो हमारे ही घरों से निकलता है। आईआईटी के वैज्ञानिक और पर्यावरणविद प्रोफेसर विनोद तारे का कहना है कि पांडु नदी अब गंगा के लिए खतरा बन चुकी है। इसके जरिए पनकी क्षेत्र की राख, केमिकल युक्त कचरा गंगा में आ रहा है। यह नदी उन्नाव और फतेहपुर जिले के बीच में स्थित बक्सर के पास गंगा में मिलती है, जहां गंगा सबसे गंदी है। नालों से रोजाना 50 करोड़ 40 लाख लीटर (544 एमएलडी) कचरा गंगा में गिर रहा है। पर्यावरण की समस्या को कम करने के लिए जिले में 20 लाख वृक्ष और लगाने की जरूरत है। यह आकलन वन अनुसंधान संस्थान का है।
इसी तरह शहर में बढ़ी हत्या, लूट और चोरी की घटनाओं से लोग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। अपराधों पर अंकुश लगाने में पुलिस पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। यह आंकड़ा और बढ़ता जा रहा है। हालात यह है कि चाहे बुजुर्ग हो अथवा महिलाएं या व्यापारी, कोई कहीं भी खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा है। पुलिस है कि छानबीन की बात कहकर हर मामले को ठंडे बस्ते में डालती जा रही है।
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ऐसा नहीं है कि शहर में ऊर्जा खत्म हो गई है। कानपुर मृतप्राय नहीं अब भी जिंदा शहर है। आईआईटी, एचबीटीआई, चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय और जीएसवीएम मेडिकल कालेज से निकली मेधा की विदेशों में धूम है। बेशकीमती जेहन के शहर के विज्ञानियों ने सिलिकॉन वैली और मेडिकल के क्षेत्र झंडे बुलंद किए हैं, फिर भी इस मेधा को पोसने वाले शहर की यह ताजा तस्वीर इशारा करती है कि वे भी शहर के लिए कुछ करें।
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सबसे गंदा शहर होने की तस्दीक यहां प्रदूषण से जुड़े आंकड़े भी करते हैं। आईआईटी और डॉ. मुरारीलाल चेस्ट हॉस्पिटल के सर्वे पर नजर डालेंगे तो पाएंगे कि शहरियों के फेफड़ों की क्षमता 11 फीसदी कम हो गई है। फैक्टरियों और टेनरियों के कचरे ने पौराणिक स्थल बिठूर क्षेत्र की धरती पर गंगाजल ऐसा कर दिया कि मुंह में न रखा जाए। औद्योगिक प्रदूषण ने हवाओं में जहरीले तत्व घोल दिए हैं। शहर में दाखिल होते ही बजबजाते कचरे से निकला बदबू का भभका मुंह से टकराता है।
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ये तो थी गंदगी की बात। अब जरा आपराधिक घटनाओं पर नजर डालें। दिव्या कांड, अलशिफा कांड जैसी रोंगटे खड़ी कर देने वाली घटनाओं ने खौफ पैदा कर दिया कि बच्चियां भी वहशी दरिंदों से सुरक्षित नहीं। हत्या, बलात्कार, छिनैती की घटनाएं तो बेशुमार हैं। ऐसा नहीं कि इस स्थिति के लिए कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैं। कचरा तो हमारे ही घरों से निकलता है। आईआईटी के वैज्ञानिक और पर्यावरणविद प्रोफेसर विनोद तारे का कहना है कि पांडु नदी अब गंगा के लिए खतरा बन चुकी है। इसके जरिए पनकी क्षेत्र की राख, केमिकल युक्त कचरा गंगा में आ रहा है। यह नदी उन्नाव और फतेहपुर जिले के बीच में स्थित बक्सर के पास गंगा में मिलती है, जहां गंगा सबसे गंदी है। नालों से रोजाना 50 करोड़ 40 लाख लीटर (544 एमएलडी) कचरा गंगा में गिर रहा है। पर्यावरण की समस्या को कम करने के लिए जिले में 20 लाख वृक्ष और लगाने की जरूरत है। यह आकलन वन अनुसंधान संस्थान का है।
इसी तरह शहर में बढ़ी हत्या, लूट और चोरी की घटनाओं से लोग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। अपराधों पर अंकुश लगाने में पुलिस पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। यह आंकड़ा और बढ़ता जा रहा है। हालात यह है कि चाहे बुजुर्ग हो अथवा महिलाएं या व्यापारी, कोई कहीं भी खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा है। पुलिस है कि छानबीन की बात कहकर हर मामले को ठंडे बस्ते में डालती जा रही है।