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सियासी यादेंः 'शेर' ने बनाए रखी बनर्जी की बादशाहत, साल 1967 का वो चुनाव जिसने मचाया तूफान
Mon, 01 Apr 2019 12:33 PM IST
प्रशांत कुमार
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: प्रशांत कुमार
Updated Mon, 01 Apr 2019 12:33 PM IST
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दो प्रत्याशियों को मिला एक ही चुनाव चिह्न
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चुनाव मैदान में एक ही चुनाव चिह्न भले ही प्रत्याशियों के लिए चिंता का विषय बनता हो, लेकिन कानपुर के इतिहास के पन्नों पर एक चुनाव चिह्न का फायदा दो निर्दलीय प्रत्याशियों को मिला। एक प्रत्याशी चुनाव हारते-हारते जीत गया। दूसरे ने दो साल बाद हुए चुनाव में बाजी मार ली। इनमें से एक प्रत्याशी एसएम बनर्जी थे और दूसरे मनोहर लाल।
बनर्जी कानपुर लोकसभा तो मनोहर लाल छावनी विधानसभा का चुनाव लड़ रहे थे। संयोग से दोनों को ही चुनाव चिह्न शेर मिला। जैसे-जैसे चुनाव की सरगर्मी बढ़ी तो लगातार लोकसभा का चुनाव जीत रहे बनर्जी को स्थितियां विपरीत समझ में आने लगीं। राजनीति के माहिर खिलाड़ी बनर्जी ने मनोहर लाल से अंदरखाने गठबंधन कर लिया। दोनों ही प्रत्याशी शेर चुनाव चिह्न के नाम पर वोट मांगने लगे। इसके चलते लगातार दो लोकसभा चुनाव जीत चुके बनर्जी तीसरे बार भी हारते-हारते जीत गए।
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बनर्जी कानपुर लोकसभा तो मनोहर लाल छावनी विधानसभा का चुनाव लड़ रहे थे। संयोग से दोनों को ही चुनाव चिह्न शेर मिला। जैसे-जैसे चुनाव की सरगर्मी बढ़ी तो लगातार लोकसभा का चुनाव जीत रहे बनर्जी को स्थितियां विपरीत समझ में आने लगीं। राजनीति के माहिर खिलाड़ी बनर्जी ने मनोहर लाल से अंदरखाने गठबंधन कर लिया। दोनों ही प्रत्याशी शेर चुनाव चिह्न के नाम पर वोट मांगने लगे। इसके चलते लगातार दो लोकसभा चुनाव जीत चुके बनर्जी तीसरे बार भी हारते-हारते जीत गए।
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शेर निशान पर लड़ रहे मनोहर लाल से समझौता कर लिया
वरिष्ठ पत्रकार मनोज त्रिपाठी ने बताया कि वर्ष 1967 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने श्रमिक नेता गणेश दत्त बाजपेयी को मैदान में उतारा। उनके सामने लगातार तीसरी बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में एसएम बनर्जी मैदान में थे।
छावनी विधानसभा से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के रेवाशंकर त्रिवेदी मैदान में थे। बनर्जी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के बीच गठबंधन था। गणेश दत्त का चुनाव बहुत अच्छा चल रहा था। बनर्जी को लगा कि उनका चुनाव फंस सकता है, इसलिए उन्होंने त्रिवेदी को छोड़कर शेर निशान पर लड़ रहे मनोहर लाल से समझौता कर लिया।
छावनी विधानसभा से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के रेवाशंकर त्रिवेदी मैदान में थे। बनर्जी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के बीच गठबंधन था। गणेश दत्त का चुनाव बहुत अच्छा चल रहा था। बनर्जी को लगा कि उनका चुनाव फंस सकता है, इसलिए उन्होंने त्रिवेदी को छोड़कर शेर निशान पर लड़ रहे मनोहर लाल से समझौता कर लिया।
मनोहर लाल अपने चुनाव चिह्न पर बनर्जी के लिए भी वोट मांगने लगे
मनोहर लाल अपने चुनाव चिह्न पर बनर्जी के लिए भी वोट मांगने लगे। इस चुनाव में बनर्जी को 77, 882 और गणेश दत्त को 71,365 वोट मिले। बनर्जी महज 6,517 वोट से ही जीत हासिल कर पाए। मनोहर लाल लगातार तीसरी बार छावनी विधानसभा का चुनाव हार गए। दो साल बाद 1969 में जब विधानसभा के चुनाव हुए तो मनोहर लाल भारतीय क्रांति दल के प्रत्याशी के रूप में छावनी से लड़े।
बनर्जी ने उनकी मदद की और वह पहली बार विधायक बने। संयोग की बात रही कि बनर्जी का विजय रथ भी मनोहर लाल ने ही रोका। वर्ष 1977 के लोकसभा चुनाव में मनोहर लाल ने भारतीय लोक दल के प्रत्याशी के रूप में लोकसभा का चुनाव लड़ा। मनोहर लाल को 2,69,629 वोट मिले। उन्होंने 1,74,289 वोट से भारी अंतर से कांग्रेस के नरेश चंद्र चतुर्वेदी को हराया। इस चुनाव में बनर्जी 5035 वोट ही पा सके।
प्रस्तुति: आदर्श त्रिपाठी
बनर्जी ने उनकी मदद की और वह पहली बार विधायक बने। संयोग की बात रही कि बनर्जी का विजय रथ भी मनोहर लाल ने ही रोका। वर्ष 1977 के लोकसभा चुनाव में मनोहर लाल ने भारतीय लोक दल के प्रत्याशी के रूप में लोकसभा का चुनाव लड़ा। मनोहर लाल को 2,69,629 वोट मिले। उन्होंने 1,74,289 वोट से भारी अंतर से कांग्रेस के नरेश चंद्र चतुर्वेदी को हराया। इस चुनाव में बनर्जी 5035 वोट ही पा सके।
प्रस्तुति: आदर्श त्रिपाठी