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घर वाले नहीं खोना चाहते अपनी रामप्यारी

Sun, 25 Dec 2016 12:14 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला कन्नौज
ब्यूरो, अमर उजाला कन्नौज Updated Sun, 25 Dec 2016 12:14 AM IST
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Your family members do not want Rampyari
विलासा उर्फ रामप्यारी। - फोटो : Amar ujala

40 साल बाद जिंदा निकली विलासा लंबे समय तक थाना क्षेत्र के सरायठेकू गांव में भी रही है। महिला की कहानी सुन इस गांव के लोग आश्चर्य चकित हैं, लेकिन वे यह नहीं चाहते कि महिला कहीं और जाकर रहे। वे चाहते हैं कि अपनी जिंदगी का बाकि हिस्सा भी विलासा सरायठेकू गांव में ही बिताए।

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सरायठेकू गांव के रामस्वरूप को 40 साल पहले जब विलासा इलाहाबाद में मिली तो वह उसे गांव ले आए। याददाश्त गायब होने की वजह से वह अपना नाम भी नहीं बता पाई। ऐसे में रामस्वरूप ने उसे रामप्यारी के नाम से पहचान दिलाई। उनके साथ रहते हुए वह कम बोलती थी, जब भी कोई बात कहती, तो सिर्फ इतना कि हमें घाटमपुर जाना है। इसके अलावा वह कुछ नहीं बोलती। यह लगभग पांच-छह महीनें तक चला। इस दौरान रामस्वरूप स्वयं उसे खाना बनाकर खिलाते थे।
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वर्ष 2002 में रामस्वरूप को ग्राम पंचायत की ओर से इंदिरा आवास आवंटित हुआ। वह उसे लेकर वहां रहने लगे। रामस्वरूप तीन भाई थे, जिनमें सरमन अलग रहता था और वह दूसरे भाई गोपीचंद्र के साथ रहते थे। कोई संतान न होने पर रामस्वरूप ने अपने भतीजे राकेशचंद्र पुत्र गोपी के नाम जमीन लिख दी थी। जो उसे पट्टे पर मिली थी। जब रामप्यारी उर्फ विलासा को उसके पुराने परिजन ग्राम धीरपुर चरइया के लोग अपने साथ लेने आए, तो रामस्वरूप के परिजन पहले तो उसे भेजने को तैयार नहीं हुए। काफी कहने पर उन्होंने अपनी चाची रामप्यारी को उनके साथ भेज दिया। उन लोगों ने उन्हें भरोसा दिलाया कि मंगलवार तक वह उन्हें पुन: लेकर आएंगे।
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या था ले जाने का प्रयास
रामस्वरूप के भतीजे राकेश ने बताया कि करीब डेढ़ वर्ष पहले चाची रामप्यारी के बारे में जानकारी होने पर ग्राम धीरपुर चरइया के लोग लेने आए थे। लेकिन तब उन्हें नहीं भेजा गया था। राकेश और उसकी पत्नी संगीता तथा परिवार के अन्य लोगों ने बताया कि जो लोग उनकी चाची को अपने साथ ले गए हैं। उन लोगों पर उन्हें कोई भरोसा नहीं है। जो भी हो वह अपनी चाची को अपने साथ ही रखना चाहते हैं। राकेश ने बताया कि वह लोग कह रहे हैं कि अब उनकी रिश्तेदारी हो गई है, जो आगे भी चलती रहेगी।

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