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गेंदा फूल की खेती में आ रही मुनाफे की ‘खुशबू’
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नैपालपुर में गेंदा के फूल तोड़ते किसान।
- फोटो : KANNAUJ
तालग्राम(कन्नौज)। इलाके के किसानों का रुझान परंपरागत फसलों की बजाय फूलों की खेती कीतरफ बढ़ रहा है। इन दिनों गेंदा फूल की खेती से ज्यादा मुनाफे की ‘खुशबू’ आ रही है। एक बीघा में 25 से 30 हजार का मुनाफा हो रहा है। शादी विवाह, स्वागत समारोह, धार्मिक समेत अन्य कार्यक्रमों में गेंदा के फूलों की सबसे ज्यादा मांग रहती है। इसी से नैपालपुर, टिकुरियन, बरगांवा में लगातार रकबा बढ़ रहा है। किसान फूलाें को कन्नौज, तिर्वा, गुुरसहायगंज, छिबरामऊ में बेच रहे हैं।
नैैैपालपुर के किसान अशोक कुमार, बिरियाहार के शिवनाथ नेे बताया कि पिछले दो साल से गेंदा के फूलों की खेती कर रहे हैं। एक बीघा में 15 हजार रुपये की लागत आती है। 10 क्विंटल उत्पादन मिल जाता है। 40 से 100 रुपये किलो तक फूल बिक जातेे हैं। इस खेती से 25 से 30 हजार रुपये प्रति बीघा मुनाफा हो जाता है।
वहीं जिला उद्यान अधिकारी मनोज कुमार चतुर्वेदी का कहना है कि विभाग से गेंदा की खेती को प्रोत्साहन दिया जाता है। फूलों की खेती फायदे का सौदा है। इसमें लागत कम और मुनाफा ज्यादा होता है। कन्नौज व आसपास के जिलों में फूलों की खेती पहले से हो रही है। तालग्राम में भी कुछ जगह फूलों की खेती की ओर लोगों का रुझान बढ़ रहा है।
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फ्रेंच प्रजातियों से कम, अफ्रीकन से ज्यादा उत्पादन
कृषि प्राविधिक सहायक विनय कुमार ने बताया कि गेंदा की फ्रेंच प्रजातियां कम उत्पादन देती हैं। इसके अंतर्गत गोल्डमजैम, बटर, बोलेरो, डस्टीलाल, रेडहेड फ्लेमिंगफायर, फ्लेम, आरेंजफ्लेम प्रमुख हैं। अधिक पैदावार देने वाली अफ्रीकन प्रजातियां है। ये हैप्पीनेस, गोल्डन एज, पूसा नारंगी गेंदा, पूसा बसंती गेंदा, गोल्डन कायन, स्टार गोल्ड, डयूस स्पन गोल्ड प्रमुख हैं।
कीट नियंत्रण के लिए करें जैविक कीटनाशक का छिड़काव
कृषि तकनीकी सहायक प्रबंधक शिवपाल सिंह ने बताया कि गेंदा में मुरझा (म्लानि) व तना सड़न रोगों का प्रकोप ज्यादा होता है। यह मृदा जनित रोग हैं। झुलसा रोग का फूलों पर व्यापक प्रभाव होता है। गेंदा में चूर्णिल फफूंद रोग का भी प्रकोप होता है। तना छेदक, चेपुआ, लाल मकड़ी भी लगती हैं। कीट नियंत्रण के लिए जैविक कीटनाशक का छिड़काव करें। मुरझा तना सड़न रोगों की रोकथाम के लिए रोपाई से पहले फोरट सल्फेट, ट्रायकोडर्मा को मिट्टी में मिलाने से लाभ मिलता है।
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नैैैपालपुर के किसान अशोक कुमार, बिरियाहार के शिवनाथ नेे बताया कि पिछले दो साल से गेंदा के फूलों की खेती कर रहे हैं। एक बीघा में 15 हजार रुपये की लागत आती है। 10 क्विंटल उत्पादन मिल जाता है। 40 से 100 रुपये किलो तक फूल बिक जातेे हैं। इस खेती से 25 से 30 हजार रुपये प्रति बीघा मुनाफा हो जाता है।
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वहीं जिला उद्यान अधिकारी मनोज कुमार चतुर्वेदी का कहना है कि विभाग से गेंदा की खेती को प्रोत्साहन दिया जाता है। फूलों की खेती फायदे का सौदा है। इसमें लागत कम और मुनाफा ज्यादा होता है। कन्नौज व आसपास के जिलों में फूलों की खेती पहले से हो रही है। तालग्राम में भी कुछ जगह फूलों की खेती की ओर लोगों का रुझान बढ़ रहा है।
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फ्रेंच प्रजातियों से कम, अफ्रीकन से ज्यादा उत्पादन
कृषि प्राविधिक सहायक विनय कुमार ने बताया कि गेंदा की फ्रेंच प्रजातियां कम उत्पादन देती हैं। इसके अंतर्गत गोल्डमजैम, बटर, बोलेरो, डस्टीलाल, रेडहेड फ्लेमिंगफायर, फ्लेम, आरेंजफ्लेम प्रमुख हैं। अधिक पैदावार देने वाली अफ्रीकन प्रजातियां है। ये हैप्पीनेस, गोल्डन एज, पूसा नारंगी गेंदा, पूसा बसंती गेंदा, गोल्डन कायन, स्टार गोल्ड, डयूस स्पन गोल्ड प्रमुख हैं।
कीट नियंत्रण के लिए करें जैविक कीटनाशक का छिड़काव
कृषि तकनीकी सहायक प्रबंधक शिवपाल सिंह ने बताया कि गेंदा में मुरझा (म्लानि) व तना सड़न रोगों का प्रकोप ज्यादा होता है। यह मृदा जनित रोग हैं। झुलसा रोग का फूलों पर व्यापक प्रभाव होता है। गेंदा में चूर्णिल फफूंद रोग का भी प्रकोप होता है। तना छेदक, चेपुआ, लाल मकड़ी भी लगती हैं। कीट नियंत्रण के लिए जैविक कीटनाशक का छिड़काव करें। मुरझा तना सड़न रोगों की रोकथाम के लिए रोपाई से पहले फोरट सल्फेट, ट्रायकोडर्मा को मिट्टी में मिलाने से लाभ मिलता है।