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कोविड अस्पताल बनने से बाकी मरीजों को परेशानी,इलाज न होने से भटक रहे
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सौरिख(कन्नौज)। नगर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को कोविड अस्पताल बना देने से अन्य मरीजों को इलाज के लिए भटकना पड़ रहा है। मरीजों को मजबूरी में प्राइवेट डॉक्टरों से इलाज कराना पड़ता है।
नगर के शंकरपुर रोड पर 30 बेड का पुरुष और 50 बेड का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र है। इलाके के लोगों के इलाज के लिए यही एक अस्पताल था। यहां प्रसव भी कराए जाते थे। इस अस्पताल को 14 मई को कोविड-एल वन अस्पताल में तब्दील कर दिया गया। इससे अन्य मरीजों का इलाज बंद हो गया। इस अस्पताल में नगर के अलावा खड़िनी, सकरावा, दौलताबाद, नादेमऊ इलाके के सैकड़ों लोग इलाज के लिए आते थे। कोविड अस्पताल बन जाने से अब लोगों को दिक्कत हो रही है।
वहीं, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में बड़ी संख्या में महिलाएं प्रसव के लिए भर्ती होती थीं। इससे अब प्रसूताओं को भी निजी अस्पताल का सहारा लेना पड़ रहा है।
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घायलों को समय पर नहीं मिल पा रहा इलाज
नगर से निकले आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर आए दिन सड़क हादसे होते रहते हैं। इससे प्राथमिक उपचार के लिए यूपीडा व अस्पताल की एंबुलेंस यहीं घायलों को भर्ती कराती रही है। कोविड अस्पताल बन जाने से घायलों को समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा। घायलों को तिर्वा मेडिकल कालेज या जिला अस्पताल की लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इससे गंभीर हादसों में लोगों की जान पर बन जाती है।
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नगर के शंकरपुर रोड पर 30 बेड का पुरुष और 50 बेड का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र है। इलाके के लोगों के इलाज के लिए यही एक अस्पताल था। यहां प्रसव भी कराए जाते थे। इस अस्पताल को 14 मई को कोविड-एल वन अस्पताल में तब्दील कर दिया गया। इससे अन्य मरीजों का इलाज बंद हो गया। इस अस्पताल में नगर के अलावा खड़िनी, सकरावा, दौलताबाद, नादेमऊ इलाके के सैकड़ों लोग इलाज के लिए आते थे। कोविड अस्पताल बन जाने से अब लोगों को दिक्कत हो रही है।
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वहीं, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में बड़ी संख्या में महिलाएं प्रसव के लिए भर्ती होती थीं। इससे अब प्रसूताओं को भी निजी अस्पताल का सहारा लेना पड़ रहा है।
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घायलों को समय पर नहीं मिल पा रहा इलाज
नगर से निकले आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर आए दिन सड़क हादसे होते रहते हैं। इससे प्राथमिक उपचार के लिए यूपीडा व अस्पताल की एंबुलेंस यहीं घायलों को भर्ती कराती रही है। कोविड अस्पताल बन जाने से घायलों को समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा। घायलों को तिर्वा मेडिकल कालेज या जिला अस्पताल की लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इससे गंभीर हादसों में लोगों की जान पर बन जाती है।