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जिले में 11 सीएचसी व 34 पीएचसी में बाल रोग विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं

Wed, 15 Jan 2020 11:45 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Wed, 15 Jan 2020 11:45 PM IST
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jile mein 11 seeechasee va 34 peeechasee mein baal rog visheshagy chikitsak nahin
राजकीय मेडिकल कालेज में संचालित रेडियंट वार्मर। - फोटो : KANNAUJ
कन्नौज। जिला बने 23 वर्ष का लंबा समय गुजर चुका है, स्वास्थ्य सेवाओं में खास सुधार नहीं हुआ। जिले में संचालित 11 सीएचसी व 34 पीएचसी में बाल रोग विशेषज्ञ की तैनाती नहीं है। प्रसव के बाद नवजात को किसी तरह की दिक्कत होने पर मेडिकल कालेज के लिए रेफर किया जाता है। यहां नवजात की सेहत में सुधार नहीं हुआ तो सैफई व हैलट के लिए रेफर कर दिया जाता। अधिकतर परिजन जिला अस्पताल के एसएनसीयू(सिक एंड न्यू बोर्न केयर यूनिट) में नवजात को उपचार के लिए लेकर पहुंचते हैं।
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जिले के राजकीय मेडिकल कालेज में डॉ.भावना तिवारी, डॉ.कैलाश सोनी व डॉ.नरेंद्र सिंह की बतौर बाल रोग विशेषज्ञ तैनाती है। जिला अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ के पद पर डॉ. सुरेश यादव, डॉ. मोहित शंकर, डॉ.पीएम यादव की तैनाती है। दोनों जगह पर इन चिकित्सकों के किसी कार्य या अवकाश पर चले जाने से मरीजों को दिक्कतें होती हैं। सीएचसी, पीएचसी पर बाल रोग विशेषज्ञ न होने से मेडिकल कालेज, जिला अस्पताल में प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में तीमारदार बच्चों को लेकर पहुंचते हैं। बच्चे का परीक्षण करने के बाद चिकित्सक एनआरसी (पोषण पुनर्वास केंद्र) व एसएनसीयू वार्ड में भर्ती कराने की सलाह देते हैं। सीएचसी व पीएचसी में पर्याप्त संख्या में बेड हैं। स्टाफ की हर जगह कमी है। मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ.कृष्ण स्वरूप का कहना है कि स्टाफ की जिला अस्पताल से लेकर सीएचसी, पीएचसी सभी जगह कमी है। प्रतिमाह शासन को भेजी जाने वाली रिपोर्ट में चिकित्सक सहित अन्य स्टाफ को लेकर डिमांड की जाती है। कोई कार्रवाई नहीं होती है। उन्होंने कहा कि जिले में जीवन रक्षक दवाइयां पर्याप्त मात्रा में हैं। दवाई की किसी तरह की दिक्कत नहीं है।
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महज दो बेड का एनआईसीयू, अधिकतर केस आते कन्नौज
राजकीय मेडिकल कालेज में महज दो बेड का एनआईसीयू (नियोटल इंटेसिव केयर यूनिट) है। यहां रेडियंट वार्मर खराब है। प्रतिमाह सुरक्षा समिति की जिलाधिकारी की अध्यक्षता में होने वाली बैठक में नवजातों के इलाज के लिए बेडों की संख्या बढ़ाने के लिए कहा जाता है। कार्रवाई आगे नहीं बढ़ती है। इसका नतीजा है कि मेडिकल कालेज से रेफर किए गए केस जिला अस्पताल के एसएनसीयू में पहुंचते हैं। इससे यहां दिक्कत हो जाती है। कई बार रेडियंट वार्मर खाली न होने से एक बेड पर दो बच्चों को लिटा कर इलाज किया जाता है।
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