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दम तोड़ रही कन्नौजी भाषा को अपूर्वा दे रहीं संजीवनी

Wed, 13 Oct 2021 11:27 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Wed, 13 Oct 2021 11:27 PM IST
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dam tod rahee kannaujee bhaasha ko apoorva de raheen sanjeevanee
प्रोफेसर अपूर्वा अवस्थी। - फोटो : KANNAUJ
कन्नौज। इत्र और इतिहास की पहचान रखने वाले कन्नौज शहर की प्राचीन सभ्यता कन्नौजी भाषा पर आधारित है। करीब दो दशक पहले बदायूं से बिल्हौर, भिंड, मुरैना और लखीमपुर खीरी कन्नौजी भाषा का गढ़ रहा। आधुनिक दौर में कन्नौजी भाषा का प्रभाव कम हो रहा है। लखनऊ में रहनी वाली जिले की बेटी अपूर्वा अवस्थी चौपाल लगाकर कन्नौजी भाषा को संजीवनी देने का काम कर रही हैं।
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कन्नौज शहर के कुतलुपुर (मकरंदनगर) में जन्मीं अपूर्वा अवस्थी लखनऊ के नवयुग कन्या महाविद्यालय में हिंदी की प्रोफेसर हैं। शहर के विख्यात कवि और साहित्यकार पिता स्व. रमेश तिवारी विराम से उन्हें कन्नौजी भाषा विरासत में मिली। उन्होंने उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में कई बार लोक चौपाल लगाकर कन्नौजी भाषा में चब्बूं, बिल बांदरी, तोतले भाई, सेर कतंती राजा बेन, चिड़िया का न्याय जैसी कहानियों के जरिए कन्नौजी भाषा के प्रसार का काम किया। वह हर शुक्रवार शाम छह बजे फेसबुक पर लाइव आकर कन्नौजी भाषा में कविताएं और कहानियां सुनाती हैं। अपूर्वा अवस्थी ने बताया कि पिता कन्नौजी भाषा के पक्षधर रहे हैं। कहानी और कविताओं को लिखकर प्रसार किया है। पिता से प्रेरित होकर वह भी कन्नौजी भाषा का प्रचार कर रही हैं। उनकी कन्नौजी भाषा में लोककथाओं की किताब जल्द प्रकाशित होने वाली है।
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अब नहीं सुनाई देता रघुनंदन फूले न समाएं
शहर के पीएसएम डिग्री कालेज में सहायक प्रोफेसर कृष्णकांत ने बताया कि गर्भ, जनने, विवाह, मुंडन, लगुन, सावन में कजरी पर कन्नौजी भाषा में कई गीत हैं। शादी में रघुनंदन फूले न समाएं गीत खूब सुनाई देता था। कन्नौजी भाषा को बढ़ाने के लिए शासन से लेकर संस्थाओं को आगे आना चाहिए।
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लेखकों की जरूरत, बच्चों को सिखाएं कन्नौजी
शहर के पठकाना मोहल्ले में रहने वाले लोकभाषा के कवि अतुल पाठक ने बताया कि कन्नौजी भाषा के कम चलन के पीछे लेखकों की कमी है। अच्छे लेखकों को लेख लिखने चाहिए। सार्वजनिक मंचों पर भाषा का प्रयोग किया जाए। इसके अलावा घर में कन्नौजी भाषा में बातचीत करें। इससे भाषा का प्रचार बढ़ेगा।
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