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चीन का बहिष्कार, स्वदेशी सींक से महकेगा अगरबत्ती कारोबार
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फैक्टरी में मशीन से अगरबत्ती तैयार करते कर्मचारी।
- फोटो : KANNAUJ
अमित कुशवाहा (संवाद)
कन्नौज। इत्र नगरी के अगरबत्ती उद्यमियों ने चीन की सींक के बहिष्कार का मन बना लिया है। अगरबत्ती उद्यमी अब चीन के बजाए असम और त्रिपुरा में बनी स्वदेशी सींक से अगरबत्ती बनाएंगे, हालांकि इससे उनकी कमाई पर कुछ असर पड़ेगा लेकिन चीन को आर्थिक सबक सिखाने के लिए उन्हें घाटा भी मंजूर है।
शहर में करीब 600 छोटे-बड़े अगरबत्ती बनाने के कारखाने हैं। इन कारखानों की अगरबत्ती घर-घर मशीनें लगाकर बनाई जाती हैं। लॉकडाउन से पहले रोजाना 30 लाख से अधिक की अगरबत्ती देश भर में जाती थी। लॉकडाउन में मंदिर बंद होने से कारोबार पर असर पड़ा है, अब प्रतिदिन 20 लाख की अगरबत्ती जा रही है। अगरबत्ती बनाने में चीन चीन से आयातित बांस की सींक (बंबू स्टिक) और जिकेट पाउडर का प्रयोग होता है। फरवरी 2020 के आंकड़ों के अनुसार चीन से देश में प्रति माह 35 हजार टन बांस की सींक की खपत होती थी। देश के त्रिपुरा, असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय की सींक की सींक की केवल तीन हजार टन ही खपत थी।
अगरबत्ती कारोबारी अशोक राठौर ने बताया कि चीन की बंबू स्टिक हल्की और पतली होती है। इससे मशीन से अगरबत्ती बेहतर बनती है, अब त्रिपुरा की स्टिक भी बेहतर आने लगी है। अब त्रिपुरा, असम व अन्य प्रदेशों में बनीं सींक से ही अगरबत्ती बनाएंगे। कारोबारी शाकिर अली ने बताया कि चीन की सींक से स्वदेशी सींक की अपेक्षा आसानी से और कम समय में ज्यादा अगरबत्ती तैयार हो जाती है। स्वदेशी सींग खराब भी ज्यादा निकलती है। लेकिन चीन को सबक सिखाने के लिए हमें कम मुनाफा भी मंजूर है। अगरबत्ती में कच्चा माल भी स्वदेशी ही लगाएंगे।
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हाथों की रगड़ से फिर से घर-घर बनेगी अगरबत्ती
एक दशक पूर्व घरों में महिलाएं से हाथों से रगड़ कर अगरबत्ती बनाती थी। 2010 में चीन की आटोमेटिक मशीनों से अगरबत्ती बनाई जानी लगी। इससे हाथों से अगरबत्ती बनाने का काम छिन गया। एफएफडीसी के प्रधान निदेशक शक्ति विनय शुक्ला ने बताया कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अगरबत्ती बनाने का प्रशिक्षण दिया जाएगा। एफएफडीसी उन्हें असम के बांस की सींक, कच्चा माल देकर अगरबत्ती बनाने के लिए प्रोत्साहित भी करेगा।
अतर एवं इत्र एसोसिएशन के सचिव पवन त्रिवेदी ने सांसद सुब्रत पाठक से शहर में बंबू स्टिक कारखाना लगाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि अगर शहर में बांस की सींक बनाने का कारखाना लग जाए तो सस्ता और आसानी से माल मिलने लगेगा। कारखाने को झांसी के अलावा मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात से बांस भी मिल जाएगा। अगरबत्ती के साथ कुल्फी, बर्फ, खिलौने के लिए भी सींक बनाई जा सकेेगी।
स्वदेशी सींक सस्ती लेकिन बनाने में समय लगता है
चीन की सींक 120 रुपये प्रतिकिलो और असम, त्रिपुरा आदि की 70 से 80 रुपये किलो में पड़ती है। किंतु मशीन से अगरबत्ती बनाते समय स्वदेश सींक काफी खराब हो जाती है, इससे मशीन से अगरबत्ती धीमे गति से भी बनती है। साथ ही मशीन जल्दी खराब भी होती है। दोनों तरह की सींग के उपयोग में वही मशीन काम करती है।
बेहतर होती है चीन की सींक
अगरबत्ती कारोबारी राजू गुप्ता ने बताया कि चीन की सींक हल्की, बारीक और चमकदार होती है। विशेष पॉलिस होने से इसमें रेशे नहीं होते हैं। साइज भी एक होती है। मशीन से अगरबत्ती बनाने में चीन की सींक एक क्विंटल में सिर्फ एक किलो खराब होती है। स्वदेशी सींक करीब पांच से आठ किलो खराब हो जाती है। स्वदेशी सींक का साइज भी अलग-अलग होता है। सींक होटी होने के कारण मशीन में फंस जाती है। इससे मशीन अक्सर बंद हो जाती है।
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कन्नौज। इत्र नगरी के अगरबत्ती उद्यमियों ने चीन की सींक के बहिष्कार का मन बना लिया है। अगरबत्ती उद्यमी अब चीन के बजाए असम और त्रिपुरा में बनी स्वदेशी सींक से अगरबत्ती बनाएंगे, हालांकि इससे उनकी कमाई पर कुछ असर पड़ेगा लेकिन चीन को आर्थिक सबक सिखाने के लिए उन्हें घाटा भी मंजूर है।
शहर में करीब 600 छोटे-बड़े अगरबत्ती बनाने के कारखाने हैं। इन कारखानों की अगरबत्ती घर-घर मशीनें लगाकर बनाई जाती हैं। लॉकडाउन से पहले रोजाना 30 लाख से अधिक की अगरबत्ती देश भर में जाती थी। लॉकडाउन में मंदिर बंद होने से कारोबार पर असर पड़ा है, अब प्रतिदिन 20 लाख की अगरबत्ती जा रही है। अगरबत्ती बनाने में चीन चीन से आयातित बांस की सींक (बंबू स्टिक) और जिकेट पाउडर का प्रयोग होता है। फरवरी 2020 के आंकड़ों के अनुसार चीन से देश में प्रति माह 35 हजार टन बांस की सींक की खपत होती थी। देश के त्रिपुरा, असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय की सींक की सींक की केवल तीन हजार टन ही खपत थी।
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अगरबत्ती कारोबारी अशोक राठौर ने बताया कि चीन की बंबू स्टिक हल्की और पतली होती है। इससे मशीन से अगरबत्ती बेहतर बनती है, अब त्रिपुरा की स्टिक भी बेहतर आने लगी है। अब त्रिपुरा, असम व अन्य प्रदेशों में बनीं सींक से ही अगरबत्ती बनाएंगे। कारोबारी शाकिर अली ने बताया कि चीन की सींक से स्वदेशी सींक की अपेक्षा आसानी से और कम समय में ज्यादा अगरबत्ती तैयार हो जाती है। स्वदेशी सींग खराब भी ज्यादा निकलती है। लेकिन चीन को सबक सिखाने के लिए हमें कम मुनाफा भी मंजूर है। अगरबत्ती में कच्चा माल भी स्वदेशी ही लगाएंगे।
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हाथों की रगड़ से फिर से घर-घर बनेगी अगरबत्ती
एक दशक पूर्व घरों में महिलाएं से हाथों से रगड़ कर अगरबत्ती बनाती थी। 2010 में चीन की आटोमेटिक मशीनों से अगरबत्ती बनाई जानी लगी। इससे हाथों से अगरबत्ती बनाने का काम छिन गया। एफएफडीसी के प्रधान निदेशक शक्ति विनय शुक्ला ने बताया कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अगरबत्ती बनाने का प्रशिक्षण दिया जाएगा। एफएफडीसी उन्हें असम के बांस की सींक, कच्चा माल देकर अगरबत्ती बनाने के लिए प्रोत्साहित भी करेगा।
अतर एवं इत्र एसोसिएशन के सचिव पवन त्रिवेदी ने सांसद सुब्रत पाठक से शहर में बंबू स्टिक कारखाना लगाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि अगर शहर में बांस की सींक बनाने का कारखाना लग जाए तो सस्ता और आसानी से माल मिलने लगेगा। कारखाने को झांसी के अलावा मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात से बांस भी मिल जाएगा। अगरबत्ती के साथ कुल्फी, बर्फ, खिलौने के लिए भी सींक बनाई जा सकेेगी।
स्वदेशी सींक सस्ती लेकिन बनाने में समय लगता है
चीन की सींक 120 रुपये प्रतिकिलो और असम, त्रिपुरा आदि की 70 से 80 रुपये किलो में पड़ती है। किंतु मशीन से अगरबत्ती बनाते समय स्वदेश सींक काफी खराब हो जाती है, इससे मशीन से अगरबत्ती धीमे गति से भी बनती है। साथ ही मशीन जल्दी खराब भी होती है। दोनों तरह की सींग के उपयोग में वही मशीन काम करती है।
बेहतर होती है चीन की सींक
अगरबत्ती कारोबारी राजू गुप्ता ने बताया कि चीन की सींक हल्की, बारीक और चमकदार होती है। विशेष पॉलिस होने से इसमें रेशे नहीं होते हैं। साइज भी एक होती है। मशीन से अगरबत्ती बनाने में चीन की सींक एक क्विंटल में सिर्फ एक किलो खराब होती है। स्वदेशी सींक करीब पांच से आठ किलो खराब हो जाती है। स्वदेशी सींक का साइज भी अलग-अलग होता है। सींक होटी होने के कारण मशीन में फंस जाती है। इससे मशीन अक्सर बंद हो जाती है।