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स्वांग व बुंदेली लोक नाटय कला को सहेज रहे हैं युवा कलाकार
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स्वांग व बुंदेली लोक नाट्य कला को सहेज रहे युवा कलाकार
झांसी। बुंदेलखंड में बुंदेली नाट्य एवं स्वांग की समृद्ध परंपरा रही है लेकिन प्रचार प्रसार के अभाव में यह लुप्त होने की कगार पर पहुंच रही है। अब महानगर के युवा कलाकारों ने इसे जीवंत करने की ठानी है। वह बुंदेली नाट्य एवं स्वांग को सहेज रहे हैं। देश के कई शहरों में यह बुंदेली भाषा के नाट्य प्रस्तुत कर चुके हैं। साथ ही, कई बडे़ साहित्यकारों के नाटकों को बुंदेली भाषा में अनुवाद भी कर चुके हैं।
बेटी बचाओ - बेटी पढ़ाओ से जुड़ा सामाजिक आंदोलन हो अथवा गुरु - शिष्य के संबंध को लेकर संस्कृत के प्राचीन महाकवि बोधायन द्वारा रचित नाटक भगवत अज्जू कीयम हों। लगभग सभी विषयों पर स्थानीय युवा कलाकार बुंदेली छाप लगाने में जुटे हैं। राजा मान सिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय के नाट्य एवं रंगमंच संकाय के विभागाध्यक्ष एवं बुंदेलखंड नाट्य कला केंद्र के संरक्षक डॉ. हिमांशु दुबे के अनुसार बुंदेली नाट्य एवं स्वांग के जरिए हम लोग अपनी बुंदेली कला संस्कृति को अनोखे अंदाज में पेश कर रहे हैं। देश में उज्जैन, गोरखपुर, रायगढ़, चंडीगढ़, ग्वालियर, भोपाल, दिल्ली सहित कई प्रमुख शहरों में युवा कलाकार बुंदेलखंड में प्रचलित पंडा का स्वांग, बाबा का स्वांग, बच्चों का स्वांग, साहूकार का स्वांग, शेख चिल्ली का स्वांग का प्रदर्शन कर चुके है। इसके साथ ही गिरीश कर्नाड सहित कई प्रमुख साहित्यकारों के नाटकों को बुंदेली भाषा में अनुवाद कर उन पर नाटक का मंचन कर चुके हैं। जल्द ही चिल्ड्रन थियेटर के माध्यम से बच्चों को भी इस कला में प्रशिक्षित करने की योजना है।
ऐसे दिया जाता है कलाकारों को प्रशिक्षण
बुंदेलखंड की नाट्य कला एवं स्वांग में कलाकार बुंदेलखंड नाट्य कला केंद्र में कई चरणों में प्रशिक्षित होते हैं। डॉ. हिमांशु दुबे के अनुसार सबसे पहले नए कलाकार को बुंदेली भाषा बोलना सिखाया जाता है। इसके बाद उन्हें बुंदेली गीत, संगीत, वाद्य यंत्रों व इतिहास की जानकारी दी जाती है। बुंदेली कवि ईसुरी, हरदौल, आल्हा, जगनिक के बारे में बताया जाता है। मंचन में आधुनिक नाट्य तकनीक का भी समावेश किया जाता है। इसके बाद नाट्य मंचन प्रस्तुत होता है। एक मंचन की तैयारी में लगभग 2 माह लग जाते हैं।
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बुंदेली भाषा में रचित मौलिक नाटक ईसुरी, छत्रसाल आदि पर मंचन किया जा चुका है। यह मंचन बिना किसी आर्थिक सहयोग के सभी युवा कलाकार करते हैं।
डॉ. हिमांशु दुबे, संरक्षक बुंदेलखंड नाट्य कला केंद्र झांसी
बुंदेली नाटक एवं स्वांग शैली हमारी क्षेत्र की विशेष पहचान है। अभी हाल ही में साधू व सुंदरी नाटक के मंचन में इसे प्रस्तुत किया, जिसे लोगों ने काफी सराहा था।
सौरभ आजाद, कलाकार निवासी खाती बाबा
बुंदेली लोक कला के माध्यम से हम युवा कलाकार को भविष्य में कई सुनहरे अवसर प्राप्त होंगे। इसके साथ ही हमें अपनी संस्कृति के संरक्षण का भी अवसर मिल रहा है।
आकाश रायकवार, कलाकार निवासी सिद्धेश्वर नगर आईटीआई
बुंदेली भाषा के गीतों को स्वांग एवं नाटकों में ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है। इससे ग्रामीण रहन सहन एवं खान पान की झलक प्रस्तुत होती है।
शिवांगी शर्मा, कलाकार निवासी शिवपुरी रोड
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झांसी। बुंदेलखंड में बुंदेली नाट्य एवं स्वांग की समृद्ध परंपरा रही है लेकिन प्रचार प्रसार के अभाव में यह लुप्त होने की कगार पर पहुंच रही है। अब महानगर के युवा कलाकारों ने इसे जीवंत करने की ठानी है। वह बुंदेली नाट्य एवं स्वांग को सहेज रहे हैं। देश के कई शहरों में यह बुंदेली भाषा के नाट्य प्रस्तुत कर चुके हैं। साथ ही, कई बडे़ साहित्यकारों के नाटकों को बुंदेली भाषा में अनुवाद भी कर चुके हैं।
बेटी बचाओ - बेटी पढ़ाओ से जुड़ा सामाजिक आंदोलन हो अथवा गुरु - शिष्य के संबंध को लेकर संस्कृत के प्राचीन महाकवि बोधायन द्वारा रचित नाटक भगवत अज्जू कीयम हों। लगभग सभी विषयों पर स्थानीय युवा कलाकार बुंदेली छाप लगाने में जुटे हैं। राजा मान सिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय के नाट्य एवं रंगमंच संकाय के विभागाध्यक्ष एवं बुंदेलखंड नाट्य कला केंद्र के संरक्षक डॉ. हिमांशु दुबे के अनुसार बुंदेली नाट्य एवं स्वांग के जरिए हम लोग अपनी बुंदेली कला संस्कृति को अनोखे अंदाज में पेश कर रहे हैं। देश में उज्जैन, गोरखपुर, रायगढ़, चंडीगढ़, ग्वालियर, भोपाल, दिल्ली सहित कई प्रमुख शहरों में युवा कलाकार बुंदेलखंड में प्रचलित पंडा का स्वांग, बाबा का स्वांग, बच्चों का स्वांग, साहूकार का स्वांग, शेख चिल्ली का स्वांग का प्रदर्शन कर चुके है। इसके साथ ही गिरीश कर्नाड सहित कई प्रमुख साहित्यकारों के नाटकों को बुंदेली भाषा में अनुवाद कर उन पर नाटक का मंचन कर चुके हैं। जल्द ही चिल्ड्रन थियेटर के माध्यम से बच्चों को भी इस कला में प्रशिक्षित करने की योजना है।
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ऐसे दिया जाता है कलाकारों को प्रशिक्षण
बुंदेलखंड की नाट्य कला एवं स्वांग में कलाकार बुंदेलखंड नाट्य कला केंद्र में कई चरणों में प्रशिक्षित होते हैं। डॉ. हिमांशु दुबे के अनुसार सबसे पहले नए कलाकार को बुंदेली भाषा बोलना सिखाया जाता है। इसके बाद उन्हें बुंदेली गीत, संगीत, वाद्य यंत्रों व इतिहास की जानकारी दी जाती है। बुंदेली कवि ईसुरी, हरदौल, आल्हा, जगनिक के बारे में बताया जाता है। मंचन में आधुनिक नाट्य तकनीक का भी समावेश किया जाता है। इसके बाद नाट्य मंचन प्रस्तुत होता है। एक मंचन की तैयारी में लगभग 2 माह लग जाते हैं।
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बुंदेली भाषा में रचित मौलिक नाटक ईसुरी, छत्रसाल आदि पर मंचन किया जा चुका है। यह मंचन बिना किसी आर्थिक सहयोग के सभी युवा कलाकार करते हैं।
डॉ. हिमांशु दुबे, संरक्षक बुंदेलखंड नाट्य कला केंद्र झांसी
बुंदेली नाटक एवं स्वांग शैली हमारी क्षेत्र की विशेष पहचान है। अभी हाल ही में साधू व सुंदरी नाटक के मंचन में इसे प्रस्तुत किया, जिसे लोगों ने काफी सराहा था।
सौरभ आजाद, कलाकार निवासी खाती बाबा
बुंदेली लोक कला के माध्यम से हम युवा कलाकार को भविष्य में कई सुनहरे अवसर प्राप्त होंगे। इसके साथ ही हमें अपनी संस्कृति के संरक्षण का भी अवसर मिल रहा है।
आकाश रायकवार, कलाकार निवासी सिद्धेश्वर नगर आईटीआई
बुंदेली भाषा के गीतों को स्वांग एवं नाटकों में ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है। इससे ग्रामीण रहन सहन एवं खान पान की झलक प्रस्तुत होती है।
शिवांगी शर्मा, कलाकार निवासी शिवपुरी रोड