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यातायात पुलिस वालों को सुनाई देने लगा कम
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वाहनों के हॉर्न से परेशान इलाइट चौराहा पर तैनात ट्राफिक के सिपाही। अमर उजाला
फोटो
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किस्त नंबर : 3
यातायात पुलिस कर्मियों का फूल रहा दम, सुनाई देने लगा कम
- वाहनों के तेज हॉर्न की आवाज और धुएं से होने लगीं कई बीमारियां, एलर्जी व सांस की बीमारियों से जूझ रहे
- जिला अस्पताल से लेकर मेडिकल कॉलेज में चल रहा उपचार
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। जिले में यातायात पुलिस कर्मी भी कई बीमारियों से घिर रहे हैं। वायु व ध्वनि प्रदूषण यातायात पुलिस कर्मियों पर खासा असर डाल रहा है। इसके चलते अधिकांश को कम सुनने, एलर्जी व सांस की समस्या पैदा हो रही है। यह आंकडे़ पिछले साल यातायात थाना परिसर में लगे स्वास्थ्य शिविर में सामने आए हैं। इन सभी का जिला अस्पताल से लेकर मेडिकल कॉलेज में उपचार चल रहा है।
गर्मी, सर्दी चाहे हो बरसात हर मौसम में यातायात पुलिसकर्मी चौराहों पर आठ से दस घंटे ड्यूटी करते हैं। ड्यूटी के दौरान चौराहों से गुजरने वाले वाहनों के हॉर्न की तेज आवाज के बीच उन्हें खड़ा रहना पड़ता है। पिछले साल स्वास्थ्य परीक्षण में सामने आया कि किसी को कम सुनाई देने लगा है तो कोई एलर्जी व सांस की तकलीफ से ग्रस्त हो रहे हैं। जिले में यातायात विभाग में 23 कर्मी तैनात हैं। साथ ही पीआरडी के 100 व होमगार्ड के 25 जवान भी ड्यूटी करते हैं।
पिछले साल यातायात थाना परिसर में लगे स्वास्थ्य जांच शिविर में चौंकाने वाले परिणाम सामने आए थे। जांच के दौरान तेज-हॉर्न व वाहनों के शोरगुल के चलते कई जवानों की कम सुनने की समस्या सामने आई थी। वहीं , कई सांस की तकलीफ से पीड़ित पाए गए थे। एक यातायात पुलिसकर्मी ने बताया कि यातायात पुलिस में कार्यरत 35 प्रतिशत कर्मचारी वाहनों के धुएं व शोरगुल के कारण किसी न किसी बीमारी से पीड़ित हो रहे हैं। किसी को सुनने में परेशानी तो किसी को एलर्जी की समस्या पैदा हो रही है। ऐसे पुलिसकर्मी जिला अस्पताल से लेकर मेडिकल कॉलेज में उपचार करा रहे हैं।
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धुआं भी बनता हानिकारक
चौराहों से हर दिन हजारों वाहन गुजरते हैं। भीड़भाड़ वाले ऐसे इलाकों में वाहनों के धुएं से निकलने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड व बैनेजन गैस पर वातावरण में जहर घोलने का काम करती है। गैस व प्रदूषण के दस माइक्रोन से कम के कण मानव के नाक, आंख व फेफड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं। इनकी चपेट में आने से दमा, सिरदर्द, जुकाम, खांसी, अनिंद्रा, उच्च रक्तचाप, आंखों मेें जलन, स्किन एलर्जी व फेफड़े का कैंसर होने का खतरा रहता है।
90 डेसिमल से ज्यादा आवाज बनती घातक
बताया गया है कि 90 डेसिमल से ज्यादा की आवाज ध्वनि प्रदूषण के तहत आती है। जो कानों को नुकसान पहुंचाती है। ऐसे करीब 40 पुलिसकर्मियों का उपचार उनके पास चल रहा है। ऐसे पुलिसकर्मियों को सावधानियां बरतने की जरूरत है। डॉ. जेपी पुरोहित, वरिष्ठ ईएनटी विशेषज्ञ।
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किस्त नंबर : 3
यातायात पुलिस कर्मियों का फूल रहा दम, सुनाई देने लगा कम
- वाहनों के तेज हॉर्न की आवाज और धुएं से होने लगीं कई बीमारियां, एलर्जी व सांस की बीमारियों से जूझ रहे
- जिला अस्पताल से लेकर मेडिकल कॉलेज में चल रहा उपचार
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। जिले में यातायात पुलिस कर्मी भी कई बीमारियों से घिर रहे हैं। वायु व ध्वनि प्रदूषण यातायात पुलिस कर्मियों पर खासा असर डाल रहा है। इसके चलते अधिकांश को कम सुनने, एलर्जी व सांस की समस्या पैदा हो रही है। यह आंकडे़ पिछले साल यातायात थाना परिसर में लगे स्वास्थ्य शिविर में सामने आए हैं। इन सभी का जिला अस्पताल से लेकर मेडिकल कॉलेज में उपचार चल रहा है।
गर्मी, सर्दी चाहे हो बरसात हर मौसम में यातायात पुलिसकर्मी चौराहों पर आठ से दस घंटे ड्यूटी करते हैं। ड्यूटी के दौरान चौराहों से गुजरने वाले वाहनों के हॉर्न की तेज आवाज के बीच उन्हें खड़ा रहना पड़ता है। पिछले साल स्वास्थ्य परीक्षण में सामने आया कि किसी को कम सुनाई देने लगा है तो कोई एलर्जी व सांस की तकलीफ से ग्रस्त हो रहे हैं। जिले में यातायात विभाग में 23 कर्मी तैनात हैं। साथ ही पीआरडी के 100 व होमगार्ड के 25 जवान भी ड्यूटी करते हैं।
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पिछले साल यातायात थाना परिसर में लगे स्वास्थ्य जांच शिविर में चौंकाने वाले परिणाम सामने आए थे। जांच के दौरान तेज-हॉर्न व वाहनों के शोरगुल के चलते कई जवानों की कम सुनने की समस्या सामने आई थी। वहीं , कई सांस की तकलीफ से पीड़ित पाए गए थे। एक यातायात पुलिसकर्मी ने बताया कि यातायात पुलिस में कार्यरत 35 प्रतिशत कर्मचारी वाहनों के धुएं व शोरगुल के कारण किसी न किसी बीमारी से पीड़ित हो रहे हैं। किसी को सुनने में परेशानी तो किसी को एलर्जी की समस्या पैदा हो रही है। ऐसे पुलिसकर्मी जिला अस्पताल से लेकर मेडिकल कॉलेज में उपचार करा रहे हैं।
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धुआं भी बनता हानिकारक
चौराहों से हर दिन हजारों वाहन गुजरते हैं। भीड़भाड़ वाले ऐसे इलाकों में वाहनों के धुएं से निकलने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड व बैनेजन गैस पर वातावरण में जहर घोलने का काम करती है। गैस व प्रदूषण के दस माइक्रोन से कम के कण मानव के नाक, आंख व फेफड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं। इनकी चपेट में आने से दमा, सिरदर्द, जुकाम, खांसी, अनिंद्रा, उच्च रक्तचाप, आंखों मेें जलन, स्किन एलर्जी व फेफड़े का कैंसर होने का खतरा रहता है।
90 डेसिमल से ज्यादा आवाज बनती घातक
बताया गया है कि 90 डेसिमल से ज्यादा की आवाज ध्वनि प्रदूषण के तहत आती है। जो कानों को नुकसान पहुंचाती है। ऐसे करीब 40 पुलिसकर्मियों का उपचार उनके पास चल रहा है। ऐसे पुलिसकर्मियों को सावधानियां बरतने की जरूरत है। डॉ. जेपी पुरोहित, वरिष्ठ ईएनटी विशेषज्ञ।