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अभागे फूल, मुरझाने लगा तू, सताया काल से जाने लगा तू....
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झांसी। अभागे फूल, मुरझाने लगा तू, सताया काल से जाने लगा तू और अरे पलायित भाव रूठकर कहां गया तू, ले आया था आज कौन उपहार नया तू। यह दोनों मर्मस्पर्शी कविताएं बुंदेलखंड में बापू कहे जाने वाले तथा देश में सियाशरण गुप्त के रूप में पहचाने रखने वाले साहित्यकार के कविता संग्रह अनुरूपा की हैं । इसमें उन्होंने बाल पात्रों की तुलना पुष्प से की है। सियाशरण गु्प्त के कविता संग्रह भले ही उतनी ख्याति न पा सकें हों, पर उनकी कहानियों और उपन्यासों ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी। झांसी से तीस किलोमीटर दूर चिरगांव कसबे में चार सितंबर 1895 को रामचरण गुप्त के यहां जन्मे सियाराम शरण गुप्त को साहित्य में रुचि रखने वाले पिता और कवि हृदय बड़े भाई मैथिली शरण का सानिध्य मिला तो वे भी साहित्य साधना में रम गए। उन्हें कई राष्ट्रीय स्तर के सम्मानों से भी नवाजा गया। काशी नागरी प्रचारिणी समिति ने उन्हें सुधाकर पदक से सम्मानित किया।
बालमन की जिज्ञासा और संवेदना का प्रतिबिंब है काकी
कहानीकार सियाराम शरण गुप्त के के प्रपौत्र (बेटी के बेटे) प्रमोद कुमार गुप्त बताते हैं कि उनके नाना को घर में ही साहित्यिक माहौल मिला। चिरगांव की बड़ी बखरी में देश के बड़े कवि और साहित्यकारों का आना जाना था, जिससे सियाराम शरण को साहित्य के क्षेत्र में अपना मुकाम तय करने में ज्यादा कठिनाई नहीं आई।ं उनके मानुषी कथा संग्रह की कहानी काकी और उपन्यास नारी इतना लोकप्रिय हुआ कि उसे देश की कई भाषाओं में प्रकाशित किया गया। काकी एक ऐसे बालक की कहानी है, जिसकी मां जिसे वह काकी कहता था, छोटी सी उम्र ही उसे छोड़कर इस दुनिया से चली जाती है। भोलेभाले श्यामू को लोग बताते हैं कि उसकी मां भगवान के पास आसमान में चली गई है। कहानी संवेदना और करुणा के चरमोत्कर्ष पर तब पहुंचती हैं जब बालमन का भोलाभाला श्यामू अपनी मां को वापस बुलाने के लिए पतंग के जरिए मां को चिट्ठी भेजने का प्रयास करता है। उसके बालमन में यह बात रम जाती है कि इसी पतंग की डोर को पकड़कर मां फिर से पृथ्वी पर आ जाएगी। पतंग और डोरी खरीदने के लिए पिता की जेब से रुपयों की चोरी करते पकड़े जाने पर कहानी का नायक बालक श्यामू मार खा लेता है । मां के पास भेजी जाने वाली चिट्ठी के लिए वह हर जुल्म सहने को तैयार है। जब श्यामू का पिता पतंग पर चिपकी चिट्ठी पर काकी पढ़ता है, तो उसके आंखों से आंसुओं की झड़ी लग जाती है। सियाराम शरण गुप्त का उपन्यास नारी भी महिला संवेदनाओं से ओतप्रोत है। इस उपन्यास को साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा पुरस्कृत किया गया था तथा इसे देश की अन्य भाषाओं में अनुवाद किया गया है।
माध्यमिक स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल रही कहानी काकी, बनाई गई शॉर्ट फिल्म
प्रमोद कुमार गुप्त बताते हैं कि सियाराम शरण गुप्त की कहानी काकी उनकी साहित्य यात्रा में मील का पत्थर साबित हुई। बालमन की संवेदनाओं की एक ऐसी कहानी जो पाठक को हृदय के अंदर तक झकझोर देती है। इस बाल कहानी को देश के कई प्रांतों के माध्यमिक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया। एनसीईआरटी दिल्ली ने इस पर एक शॉर्ट फिल्म भी बनाई थी, जो लोगों ने खूब देखी। इसी तरह उनके कविता संग्रह अनुरूपा की कविता फूल की चाह में एक बाल पात्र सुखिया है जो दलित की बेटी है, महामारी से गंभीर बीमार सुखिया अपने पिता से देवी मां के चरणों में चढ़े हुए फूल की चाह रखती है और आजादी के पहले के उस दौर में उसका पिता मंदिर के अंदर से देवी मां के प्रसाद के रूप में एक फूल लाने के लिे संघर्ष करते हुए जेल चला जाता है और इधर सुखिया दम तोड़ देती है, बाद में पिता जब लौटकर आता है तो वह अपनी बेटी की राख पर वह फूल चढ़ाता है।
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उपन्यास नारी को पांच भाषाओं में किया गया अनुवाद
चिरगांव निवासी साहित्यकार रामेश्वर प्रसाद साहू बताते है कि सियाराम शरण गुप्त के उपन्यास नारी को साहित्य अकादमी ने हिंदी के अलावा बंगाली, कन्नड़, मलयालम पंजाबी एवं उर्दू में अनुवाद किया था। इसी तरह प्रभु ईशु पर लिखा गया उपन्यास अमृत पुत्र भी हिंदी के अलावा अंग्रेजी में भी अनुवाद किया गया था। इसी तरह मौर्य विजय, अनाथ, विषाद, सुनंदा जैसी रचनाओं ने गुप्त को देश के बड़े कथाकारों की फेहरिस्त में शामिल कर दिया।
देश के बड़ी विभूतियों का रहा सानिध्य
रामेश्वर साहू बताते हैं कि कहानीकार सियाराम शरण गुप्त के बड़े भाई राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त के पास जहां देश के बड़ी विभूतियों का आना जाना था, वहीं सियाशरण गुप्त को भी सुमित्रा नंद पंत, माखन लाल चतुर्वेदी, डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, विष्णु प्रभाकर, बालकृष्ण शर्मा नवीन, महात्मा गांधी, विनोबा भावे जैसी विभूतियों का सानिध्य मिला। कल्पना लोक की कहानियों के चितेरे बुंदेलखंड के लाल की जिंदगी की कहानी पर अचानक 29 मार्च 1963 को विराम लग गया तथा उनका दिल्ली में देहावसान हो गया।
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बालमन की जिज्ञासा और संवेदना का प्रतिबिंब है काकी
कहानीकार सियाराम शरण गुप्त के के प्रपौत्र (बेटी के बेटे) प्रमोद कुमार गुप्त बताते हैं कि उनके नाना को घर में ही साहित्यिक माहौल मिला। चिरगांव की बड़ी बखरी में देश के बड़े कवि और साहित्यकारों का आना जाना था, जिससे सियाराम शरण को साहित्य के क्षेत्र में अपना मुकाम तय करने में ज्यादा कठिनाई नहीं आई।ं उनके मानुषी कथा संग्रह की कहानी काकी और उपन्यास नारी इतना लोकप्रिय हुआ कि उसे देश की कई भाषाओं में प्रकाशित किया गया। काकी एक ऐसे बालक की कहानी है, जिसकी मां जिसे वह काकी कहता था, छोटी सी उम्र ही उसे छोड़कर इस दुनिया से चली जाती है। भोलेभाले श्यामू को लोग बताते हैं कि उसकी मां भगवान के पास आसमान में चली गई है। कहानी संवेदना और करुणा के चरमोत्कर्ष पर तब पहुंचती हैं जब बालमन का भोलाभाला श्यामू अपनी मां को वापस बुलाने के लिए पतंग के जरिए मां को चिट्ठी भेजने का प्रयास करता है। उसके बालमन में यह बात रम जाती है कि इसी पतंग की डोर को पकड़कर मां फिर से पृथ्वी पर आ जाएगी। पतंग और डोरी खरीदने के लिए पिता की जेब से रुपयों की चोरी करते पकड़े जाने पर कहानी का नायक बालक श्यामू मार खा लेता है । मां के पास भेजी जाने वाली चिट्ठी के लिए वह हर जुल्म सहने को तैयार है। जब श्यामू का पिता पतंग पर चिपकी चिट्ठी पर काकी पढ़ता है, तो उसके आंखों से आंसुओं की झड़ी लग जाती है। सियाराम शरण गुप्त का उपन्यास नारी भी महिला संवेदनाओं से ओतप्रोत है। इस उपन्यास को साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा पुरस्कृत किया गया था तथा इसे देश की अन्य भाषाओं में अनुवाद किया गया है।
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माध्यमिक स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल रही कहानी काकी, बनाई गई शॉर्ट फिल्म
प्रमोद कुमार गुप्त बताते हैं कि सियाराम शरण गुप्त की कहानी काकी उनकी साहित्य यात्रा में मील का पत्थर साबित हुई। बालमन की संवेदनाओं की एक ऐसी कहानी जो पाठक को हृदय के अंदर तक झकझोर देती है। इस बाल कहानी को देश के कई प्रांतों के माध्यमिक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया। एनसीईआरटी दिल्ली ने इस पर एक शॉर्ट फिल्म भी बनाई थी, जो लोगों ने खूब देखी। इसी तरह उनके कविता संग्रह अनुरूपा की कविता फूल की चाह में एक बाल पात्र सुखिया है जो दलित की बेटी है, महामारी से गंभीर बीमार सुखिया अपने पिता से देवी मां के चरणों में चढ़े हुए फूल की चाह रखती है और आजादी के पहले के उस दौर में उसका पिता मंदिर के अंदर से देवी मां के प्रसाद के रूप में एक फूल लाने के लिे संघर्ष करते हुए जेल चला जाता है और इधर सुखिया दम तोड़ देती है, बाद में पिता जब लौटकर आता है तो वह अपनी बेटी की राख पर वह फूल चढ़ाता है।
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उपन्यास नारी को पांच भाषाओं में किया गया अनुवाद
चिरगांव निवासी साहित्यकार रामेश्वर प्रसाद साहू बताते है कि सियाराम शरण गुप्त के उपन्यास नारी को साहित्य अकादमी ने हिंदी के अलावा बंगाली, कन्नड़, मलयालम पंजाबी एवं उर्दू में अनुवाद किया था। इसी तरह प्रभु ईशु पर लिखा गया उपन्यास अमृत पुत्र भी हिंदी के अलावा अंग्रेजी में भी अनुवाद किया गया था। इसी तरह मौर्य विजय, अनाथ, विषाद, सुनंदा जैसी रचनाओं ने गुप्त को देश के बड़े कथाकारों की फेहरिस्त में शामिल कर दिया।
देश के बड़ी विभूतियों का रहा सानिध्य
रामेश्वर साहू बताते हैं कि कहानीकार सियाराम शरण गुप्त के बड़े भाई राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त के पास जहां देश के बड़ी विभूतियों का आना जाना था, वहीं सियाशरण गुप्त को भी सुमित्रा नंद पंत, माखन लाल चतुर्वेदी, डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, विष्णु प्रभाकर, बालकृष्ण शर्मा नवीन, महात्मा गांधी, विनोबा भावे जैसी विभूतियों का सानिध्य मिला। कल्पना लोक की कहानियों के चितेरे बुंदेलखंड के लाल की जिंदगी की कहानी पर अचानक 29 मार्च 1963 को विराम लग गया तथा उनका दिल्ली में देहावसान हो गया।