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कोरोना के नए वैरिएंट ने बना दिए दो हजार मधुमेह के मरीज
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झांसी। कोरोना वायरस की दूसरी लहर लोगों पर बहुत भारी पड़ी है। संक्रमण से मुक्त होने के बाद भी लोग नई-नई बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। झांसी में कोरोना वायरस ने मधुमेह के लगभग दो हजार नए मरीज बना दिए हैं। इसमें कई ऐसे रोगी भी हैं, जो प्री-डायबिटिक थे, मगर अब लगातार मधुमेह की दवाएं या इंसुलिन लेनी पड़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे के कारण कोरोना का नए स्ट्रेन और अंधाधुंध स्टेरॉयड के सेवन है।
कोरोना वायरस का नया वैरिएंट साइटोकाइन स्टॉर्म बढ़ जाता है। इसकी वजह से शरीर के सारी अंग, बीटा सेल, फेफड़े, लिवर, किडनी पर असर होता है। ये स्टॉर्म जब ज्यादा बढ़ता है तो बीटा सेल को नष्ट करके इंसुलिन बनाने की प्रक्रिया बाधित कर देता है। जैसे-जैसे कम होने लगता है, वैसे-वैसे मरीज ठीक होता जाता है। वहीं, कुछ मरीजों में यह कम होने के बावजूद हमेशा के लिए डायबिटीज की बीमारी दे जा रहा है। मेडिकल कॉलेज में कई ऐसे मामले सामने भी आ चुके हैं। कई ऐसे भी केस मिले, जिसमें शुगर नियंत्रित करने के लिए दवाओं की डोज भी बढ़ानी पड़ी, जबकि कोरोना संक्रमित होने से पहले मरीज की कम दवाओं में ही मधुमेह नियंत्रित रहती थी। मेडिकल कॉलेज के क्रिटिकल केयर इंचार्ज डॉ. रामबाबू ने बताया कि कोविड के इलाज के बाद लगभग एक हजार प्री डायबिटीज मरीज डायबिटीज के रोगी बन गए, जबकि, 500 नॉन डायबिटिक मधुमेह रोगी बन गए। निजी अस्पतालों में भी भर्ती कई मरीजों में इस तरह के मामले जरूर सामने आए होंगे। उन्होंने बताया कि कई मरीजों को डायबिटीज नियंत्रित करने के लिए हफ्तों दवाइयां, इंसुलिन इंजेक्शन की जरूरत पड़ी। कई ठीक भी हो गए मगर कुछ रोगियों को हमेशा के लिए मधुमेह बीमारी हो गई। उन्होंने सलाह दी कि कोरोना से ठीक होने के बाद चार-पांच हफ्ते तक ब्लड शुगर की निगरानी करें।
कइयों ने दूसरे के पर्चे की दवा खाईं
अस्पतालों में डॉक्टरों ने मरीजों को जल्द ठीक करने के लिए स्टेरॉयड चलाए। वहीं, घर पर रहने वाले संक्रमितों ने कोरोना से ठीक हुए लोगों से पूछ-पूछकर इलाज किया। उनके पर्चे की दवाएं मेडिकल स्टोर से मंगवाईं, जो अब मधुमेह की वजह बन रही है।
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इन्हें न दें स्टेरॉयड
- संक्रमित होने के बाद भी कोरोना के लक्षण न हों।
- अगर कोरोना का हल्का लक्षण हो।
- सीटी स्कैन में स्कोर आठ से कम हो।
- संक्रमण का पांच-सात दिन ही हुआ हो।
- बुखार, सीटी स्कोर एवं सीआरपी की रिपोर्ट नॉर्मल हो।
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कोरोना वायरस का नया वैरिएंट साइटोकाइन स्टॉर्म बढ़ जाता है। इसकी वजह से शरीर के सारी अंग, बीटा सेल, फेफड़े, लिवर, किडनी पर असर होता है। ये स्टॉर्म जब ज्यादा बढ़ता है तो बीटा सेल को नष्ट करके इंसुलिन बनाने की प्रक्रिया बाधित कर देता है। जैसे-जैसे कम होने लगता है, वैसे-वैसे मरीज ठीक होता जाता है। वहीं, कुछ मरीजों में यह कम होने के बावजूद हमेशा के लिए डायबिटीज की बीमारी दे जा रहा है। मेडिकल कॉलेज में कई ऐसे मामले सामने भी आ चुके हैं। कई ऐसे भी केस मिले, जिसमें शुगर नियंत्रित करने के लिए दवाओं की डोज भी बढ़ानी पड़ी, जबकि कोरोना संक्रमित होने से पहले मरीज की कम दवाओं में ही मधुमेह नियंत्रित रहती थी। मेडिकल कॉलेज के क्रिटिकल केयर इंचार्ज डॉ. रामबाबू ने बताया कि कोविड के इलाज के बाद लगभग एक हजार प्री डायबिटीज मरीज डायबिटीज के रोगी बन गए, जबकि, 500 नॉन डायबिटिक मधुमेह रोगी बन गए। निजी अस्पतालों में भी भर्ती कई मरीजों में इस तरह के मामले जरूर सामने आए होंगे। उन्होंने बताया कि कई मरीजों को डायबिटीज नियंत्रित करने के लिए हफ्तों दवाइयां, इंसुलिन इंजेक्शन की जरूरत पड़ी। कई ठीक भी हो गए मगर कुछ रोगियों को हमेशा के लिए मधुमेह बीमारी हो गई। उन्होंने सलाह दी कि कोरोना से ठीक होने के बाद चार-पांच हफ्ते तक ब्लड शुगर की निगरानी करें।
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कइयों ने दूसरे के पर्चे की दवा खाईं
अस्पतालों में डॉक्टरों ने मरीजों को जल्द ठीक करने के लिए स्टेरॉयड चलाए। वहीं, घर पर रहने वाले संक्रमितों ने कोरोना से ठीक हुए लोगों से पूछ-पूछकर इलाज किया। उनके पर्चे की दवाएं मेडिकल स्टोर से मंगवाईं, जो अब मधुमेह की वजह बन रही है।
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इन्हें न दें स्टेरॉयड
- संक्रमित होने के बाद भी कोरोना के लक्षण न हों।
- अगर कोरोना का हल्का लक्षण हो।
- सीटी स्कैन में स्कोर आठ से कम हो।
- संक्रमण का पांच-सात दिन ही हुआ हो।
- बुखार, सीटी स्कोर एवं सीआरपी की रिपोर्ट नॉर्मल हो।