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जिन्हें नाजों से पाला, बुढ़ापे में वही आंसुओं से भर रहे मां-बाप की झोली

Thu, 02 Jun 2022 01:09 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Thu, 02 Jun 2022 01:09 AM IST
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Those who were brought up with pride, in old age the same parents are filled with tears
झांसी। मां-बाप अनमोल हैं। लेकिन बदल रही पीढ़ी कहीं न कहीं उनकी झोली आंसुओं से भर रही है। जिन मां-बाप ने उन्हें नाजों से पाला, वे बुढ़ापे में उन्हें वृद्धाश्रम का रास्ता दिखा रहे हैं। तो कहीं उम्र के आखिरी पड़ाव में उन्हें अकेला छोड़
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कर दूसरे शहरों में बस रहे हैं। हालांकि कई बार ये दूरी कॅ रियर और जॉब को लेकर होती है लेकिन बुजुर्गों की आंखों में सूनापन साफ झलकता है। एक जून को ग्लोबल डे ऑफ पेरेन्ट्स पर किसी न किसी वजह से अपने बच्चों से दूर बुजुर्ग मां-बाप से बात की तो पता चला कि कहीं इकलौते बेटे ने घर बेचकर मां को बेघर कर डाला तो अपने दिवंगत पति का मान बचाने के लिए मां को बेटे के खिलाफ रिपोर्ट तक करानी पड़ गई। वहीं शादी के बाद बच्चे दूसरों शहरों में बस गए तो बुजुर्ग मां-बाप अपना अकेलापन दूर करने के लिए एक-दूसरे में अपनी खुशियां ढूंढने लगे...।
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इकलौते बेटे ने ही घर से बेघर कर दिया
झांसी। ओम शांति नगर में रहने वाली गुरबचनी खन्ना एक ऐसी बुुजुर्ग मां हैं जिनके बेटे ने घर बेचकर उन्हें बेघर कर दिया। एमए, बीएड तक पढ़ी-लिखी 64 साल की यह महिला घर बचाने के लिए थाना-पुलिस के चक्कर लगा रही है। गुरबचनी उर्फ मंजरी खन्ना बता रही हैं कि उनके पति महेंद्र कुमार खन्ना जीआईसी में लेक्चरर थे। छह साल पहले उनकी मौत हो गई। उनकी बेटी और इकलौते बेटे की शादी हो चुकी है। जिस बेटे को उन्होंने अपना पुराना घर बेचकर और कर्ज लेकर पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाया। उसने करोड़ों की प्रॉपर्टी पाने के लिए उनके मरने का इंतजार भी नहीं किया। उनका आरोप है कि बेटे ने कुछ लोगों के साथ मिलकर चालाकी से उनका नया घर बेच दिया। उन्होंने दिल पर पत्थर रखकर बेटे के खिलाफ थाने में मामला दर्ज कराया। वह किसी तरह अपनी जिंदगी काटने के लिए घर पर महिलाओं को कुकिंग और बच्चों को एक्टिविटी सिखा रही है। उनका कहना है कि पति का मान और अपना स्वाभिमान बचाने के लिए वह कानूनी लड़ाई तो लड़ रही हैं लेकिन उनका दिल रो रहा है।
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बच्चे बाहर रहने लगें तो अपनी जिंदगी में रंग भरना सीख लीजिए...
झांसी। सिविल लाइंस निवासी बुजुर्ग अरुण श्रीवास्तव और उनकी पत्नी संध्या श्रीवास्तव ऐसे बुजुर्ग दंपती हैं जिन्होंने अपने एकांकी जीवन को लेकर आंसू बहाने की बजाय एक-दूसरे में ही खुशियां ढूंढ ली हैं। अरुण श्रीवास्तव एसबीआई बैंक से सेवानिवृत्त हैं, वह बताते हैं कि बच्चे पढ़ाई और शादी के बाद दूसरे शहरों में रहते हैं। ऐसे में निराशा पालने की बजाय वह दोनों खुश रहने की पूरी कोशिश में रहते हैं। साथ-साथ मॉर्निंग वॉक पर जाते हैं। इसके बाद घर के काम से फ्री होते हैं तो पूरा अखबार पढ़ते हैं। फिर खबरों पर चर्चा भी करते हैं। सोसाइटी में महिलाओं और पुरुषों के अलग-अलग ग्रुप में शाम को बैठते हैं और घर-गृहस्थी से लेकर देश-दुनिया पर बातें करते हैं। एक-दूसरे से सुख-दुख और तीज-त्योहार की खुशियां बांटते हैं। बच्चों से फोन पर बात होती है। साल-दो साल में बच्चे आते-जाते रहते हैं। दंपती का कहना है कि आजकल जमाना बदल गया है। बच्चे बाहर रहने लगे तो अकेलापन महसूस करने की बजाय अपनी जिंदगी में रंग भरना सीख लेना समय की जरूरत है।
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