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रैन बसेरों में नहीं चैन, सड़क किनारे खुले में बीत रही रातें, ठंड कर रही बेचैन

Sun, 05 Dec 2021 01:33 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Sun, 05 Dec 2021 01:33 AM IST
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There is no peace in the night shelters, the nights are passing in the open on the roadside, restless getting cold
झांसी। ठंड बढ़ गई है तो बेघर-बेसहारा लोगों की मुश्किलें भी बढ़ गई हैं। कुछ सड़क किनारे सर्द रात काटने को मजबूर हैं तो कुछ दुकानों और ठेलों के ऊपर-नीचे सिकुड़े बैठे दिख रहे हैं। इनके पास न ओढ़ने का कोई इंतजाम है न ढंग से बिछाने को बिस्तर। यूं तो नगर निगम ने शहर में चार रैन बसेरे खोल रखे हैं पर रात की ठंड में बेहाल कई लाचारों को तो रैन बसेरों का पता ही नहीं है, वहीं कई कह रहे हैं कि रैन बसेरों में ढंग का कोई इंतजाम नहीं है, वहां के कंबल और बिस्तर में इतनी बदबू आती है कि सोना दुश्वार होता है। इसके अलावा सुबह होते ही लोगों को बसेरों से भगा दिया जाता है।
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अमर उजाला की टीम ने शनिवार की रात में शहर के रैन बसेरों का हाल देखा तो पता चला कि चारों रैन बसेरे फिलहाल खाली ही दिखे, जबकि चित्रा चौराहे, सीपरी बाजार, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन सहित तमाम जगहों पर कई बेसहारा पुरुष, महिलाएं और बच्चे खुले आकाश के नीचे ठंड में ठिठुर रहे हैं। उधर, मेडिकल कॉलेज के पास जो रैन बसेरा बना है वह गली के अंदर होने के कारण वहां भी लोगों का पहुंचाना मुश्किल होता है। जेल चौराहा पर अस्थाई रैन बसेरे हर साल बनते हैं। लेकिन, व्यवस्था नाकाफी दिख रही है, हालांकि अपर नगर आयुक्त शादाब असलम का कहना है इन रैन बसेरों का प्रचार-प्रसार कराया जाता है। रात में बाहर सो रहे लोगों को रैन बसेरे तक ले जाने के लिए टीम लगाई गई है।
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स्थान-बस स्टैंड रैन बसेरा, समय रात 8.30 :
बस स्टैंड रैन बसेरे में छाया था सन्नाटा
यहां के रैन बसेरा में सन्नाटा पड़ा था। बरामदे में चौकीदार बैठा था। पूछने पर बताया कि अभी कोई आता नहीं है। दो-चार यात्री ही आते हैं। रैन बसेरे में गद्दे-रजाई व कंबल बिस्तर पर पड़े थे। जबकि कुछ चादर गंदे दिख रहे थे। यहां महिलाओं के लिए अलग कमरा है लेकिन कोई महिला नहीं थी। वहीं यहां पर बाथरूम की कोई व्यवस्था नहीं है।
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स्थान-मुर्गा-मछली मार्केट शिवाजी नगर, समय रात 9.45 :
चौराहों के आसपास ही सड़कों पर रात गुजराते मिले लोग
यहां भी रैन बसेरा खाली पड़ा था। यहां ठंड में इक्का-दुक्का लोग ही पहुंचते हैं। यह रैन बसेरा इलाइट से तकरीबन चार किलोमीटर, रेलवे स्टेशन से तकरीबन छह किलोमीटर, सीपरी से पांच किलोमीटर दूर है। ऐसे में इन चौराहों के पास ठंड से ठिठुरने वाले बेसहारा इन चौराहों के आसपास ही सड़कों पर किसी तरह रात गुजराते मिले। इन लोगों का कहना है कि इन स्थानों से दूर रैन बसेरों में आने-जाने के लिए उनके पास कोई साधन नहीं है। मजबूरी में खुले आसमान के नीचे रात गुजारनी पड़ती है। ठंड लगने पर किसी तरह कूड़ा-करकट जलाकर आग ताप लेते हैं।
स्थान-रैन बसेरा लहरगिर्द, समय 9.15 बजे :
कैसे पहुंचे लोग, सड़क से काफी अंदर है रैन बसेरा
इस रैन बसेरे में आसपास की बिल्डिंगों में काम करने वाले मजदूर परिवार बैठे मिले। इन्होंने बताया कि वह पास में ही मजदूरी करते हैं। अलग-अलग गांवों से आए हैं उनके पास ठंड में रात गुजारने के लिए कोई साधन नहीं है इसलिए रैन बसेरे में आते हैं। उन्होंने बताया कि महिलाएं और बच्चे साथ में हैं। उधर, इनमें से कई मजदूर रैन बसेरे के बाहर मैदान में खाना बनाते दिखे। इधर, आसपास के लोगों का कहना है कि यह रैन बसेरा सड़क से काफी अंदर होने के कारण लोग कम ही आते हैं। कईयों को तो यहां के बारे में जानकारी ही नहीं है।
स्थान-सीपरी बाजार ओवरब्रिज के नीचे, समय रात 9.30 :
ठेलों और पट्टी पर सोते मिले बेसहारा
शहर में चार रैन बसेरे हैं, लेकिन यहां ओवरब्रिज के नीचे आपको रात में कई लोग सोते मिल जाएंगे। टीम को कई लोग ओवरब्रिज के नीचे बनी पट्टी और ठेलों पर ठिठुरते मिले। इनमें कई लोग यहां ठेला लगाने वाले थे तो कई ऐसे थे कि उनके पास रात गुजारने की कोई व्यवस्था नहीं थी। यह लोग आसपास मांग कर अपना गुजारा करते हैं। लहरगिर्द रैन बसेरा यहां से तीन किलोमीटर दूरी पर है।
स्थान-चित्रा चौराहा, समय 9.45:
चौराहे पर ठंड में ठिठुरते मिले बच्चे और बड़े
यहां चौराहे पर तकरीबन 30-35 लोग सड़क किनारे रात गुजारते मिले। यह लोग दिनभर आसपास खिलौने और सामान बेचकर अपना गुजारा करते हैं और रात होने पर यहीं चौराहों के पास किसी तरह सोते हैं। इन लोगों में कई परिवार हैं। इनके साथ महिलाएं और बच्चे-लड़कियां भी हैं। इनका कहना है कि आसपास कोई रैन बसेरा हो तो वह लोग रात आराम से गुजार सकते हैं लेकिन यहां से दूर जाना और सुबह लौटना उनके लिए असंभव है। उधर, इनके छोटे-छोटे ठंड में ठिठुरते नजर आए। बड़ों के पास भी ओढ़ने-बिछाने को बिस्तर नहीं दिखे। वहीं पास में ही चित्रा चौराहे पर ही कई लोग फुटपाथ पर एक कंबल के सहारे लेटे हुए मिले।

कई महीने से नहीं धुली गई चादरें, कंबलों से आ रही बदबू
झांसी। सभी चार जगहों पर रैन बसेरों का एक सा हाल नजर आया। बिस्तर पर पड़ी चादरें कई महीने से नहीं धुली गई। सभी बिस्तरों के लिए सिर्फ एक ही चादर का इंतजाम है। दूसरी चादर यहां नहीं है। इस वजह से महीनों से जो चादर बिछी हैं, वही आज भी है। इसी तरह कंबल भी बेहद गंदे हैं। रखरखाव न होने से उनसे अजीब से बदबू आ रही थी। बिस्तर के काफी गंदा होने से कोई राहगीर इनका इस्तेमाल करना नहीं चाहते।
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