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कुलपति ने खुद जमा की छात्र की माइग्रेशन फीस
झांसी / ब्यूरो
Updated Fri, 07 Aug 2015 11:05 PM IST
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बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में शुक्रवार को कुलपति की नेकदिली का एक मामला सामने आया। वीसी ने छात्र की माइग्रेशन की फीस के लिए खुद अपनी जेब से एक हजार रुपये का नोट निकाल कर दे दिया। यही नहीं, जो पैसा बचा उसको छात्र से किराए के लिए रखने को कह दिया।
गौरतलब है कि शुक्रवार को अमर उजाला ने ‘बीयू में सुविधा शुल्क के बाद दिए जा रहे माइग्रेशन’ शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी। खबर में चित्रकूट निवासी निर्धन छात्र शंकर चरण मिश्रा की पीड़ा बयां की गई थी। शुक्रवार को शंकर की काउंसलिंग होने के चलते उसने अपने भाई को माइग्रेशन फॉर्म लेने के लिए विश्वविद्यालय भेजा था। शंकर के भाई ने आरोप लगाया कि जब वह माइग्रेशन लेने के लिए गोपनीय विभाग पहुंचा तो एक बीयू कर्मी ने रसीद में उससे माइग्रेशन प्राप्त होने की बात लिखवा ली और प्रमाणपत्र नहीं दिया। यह मामला जब कुलपति प्रो. अविनाश चंद्र पांडेय के सामने पहुंचा तो उन्होंने कर्मचारी को बुला लिया। कर्मचारी ने छात्र के सभी आरोपों को खारिज कर कहा कि वह झूठ बोल रहा है। इस पर वीसी ने कर्मचारी से पूछा कि अब इसको माइग्रेशन कैसे मिलेगा, तो कर्मी ने पुन: आवेदन की प्रक्रिया अपनाने की बात कही। छात्र की दयनीय स्थिति देख कुलपति ने स्वयं अपनी जेब से हजार रुपये का नोट निकालकर दे दिया। छात्र ने उस पैसे से रसीद की रकम जमा की, तब जाकर उसको माइग्रेशन प्रमाणपत्र मिल सका। वहीं, बचा हुआ पैसा कुलपति ने छात्र को किराए के लिए दे दिया।
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गौरतलब है कि शुक्रवार को अमर उजाला ने ‘बीयू में सुविधा शुल्क के बाद दिए जा रहे माइग्रेशन’ शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी। खबर में चित्रकूट निवासी निर्धन छात्र शंकर चरण मिश्रा की पीड़ा बयां की गई थी। शुक्रवार को शंकर की काउंसलिंग होने के चलते उसने अपने भाई को माइग्रेशन फॉर्म लेने के लिए विश्वविद्यालय भेजा था। शंकर के भाई ने आरोप लगाया कि जब वह माइग्रेशन लेने के लिए गोपनीय विभाग पहुंचा तो एक बीयू कर्मी ने रसीद में उससे माइग्रेशन प्राप्त होने की बात लिखवा ली और प्रमाणपत्र नहीं दिया। यह मामला जब कुलपति प्रो. अविनाश चंद्र पांडेय के सामने पहुंचा तो उन्होंने कर्मचारी को बुला लिया। कर्मचारी ने छात्र के सभी आरोपों को खारिज कर कहा कि वह झूठ बोल रहा है। इस पर वीसी ने कर्मचारी से पूछा कि अब इसको माइग्रेशन कैसे मिलेगा, तो कर्मी ने पुन: आवेदन की प्रक्रिया अपनाने की बात कही। छात्र की दयनीय स्थिति देख कुलपति ने स्वयं अपनी जेब से हजार रुपये का नोट निकालकर दे दिया। छात्र ने उस पैसे से रसीद की रकम जमा की, तब जाकर उसको माइग्रेशन प्रमाणपत्र मिल सका। वहीं, बचा हुआ पैसा कुलपति ने छात्र को किराए के लिए दे दिया।
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