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Jhansi News: सहकारिता से होकर गुजरता है गांव और ग्रामीणों की खुशहाली का रास्ता
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अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। कृभको के चेयरमैन और अंतरराष्ट्रीय सहकारी संगठन के एशिया रीजन के अध्यक्ष डा. चंद्रपाल सिंह यादव ने कहा कि गांव और ग्रामीणों की खुशहाली का रास्ता सहकारिता से होकर गुजरता है। आने वाले दिनों में सहकारी समितियां गांवों की आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बनेंगी। इस दिशा में कोशिशें शुरू कर दीं गईं हैं। इसके अलावा उन्होंने कहा कि भारत का सहकारी आंदोलन दुनिया में सबसे बड़ा है। यहां आठ लाख सहकारी संस्थाएं काम कर रहीं हैं, जिनके 32 करोड़ ग्रामीण सदस्य हैं। ये ग्रामीण सीधे तौर पर सहकारिता से जुड़े हुए हैं। साथ ही कहा कि देश के 99 प्रतिशत गांवों में सहकारिता की पहुंच है। यह बात उन्होंने अमर उजाला से हुई खास बातचीत में कही।
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पहली बार सरकार ने समझा सहकारिता का महत्व
आजादी के बाद से अब तक पहली बार सरकार ने सहकारिता के महत्व को समझा है। इसका अलग मंत्रालय बनाया गया है। इसके अलावा अब तक सहकारी समितियां खाद-बीज के वितरण और किसानों को बैंकों से ऋण दिलाने भर तक सीमित थीं, लेकिन अब प्राथमिक सहकारी समितियों को 40 प्रकार के कामों के लिए अधिकृत किया गया है। सरकार के सहयोग से अब सहकारी समितियां कृषि उत्पाद खरीद सकेंगी, उनका भंडारण कर सकेंगी, साथ ही प्रोसेसिंग यूनिट भी स्थापित कर सकेंगी। इसके अलावा पेट्रोल पंप लगाने व गैस एजेंसी खोलने में भी सहकारी समितियों को प्राथमिकता दी जाएगी। सरकार की ओर से इसकी नियमावली समितियों को भेज दी गई है।
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सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर बनाईं तीन संस्थाएं
सहकारी आंदोलन को और मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर तीन सहकारी संस्थाओं का गठन किया है। इनमें से एक संस्था कृषि निर्यात का काम देखेगी, दूसरी अच्छे बीजों के उत्पादन पर काम करेगी, जबकि तीसरी संस्था ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने का काम करेगी। राष्ट्रीय स्तर की यह तीनों संस्थाएं पोर्टल के जरिये गांवों में मौजूद प्राथमिक सहकारी समितियों से सीधे तौर पर जुड़ी रहेंगी। इस प्रक्रिया में बिचौलियों का काम खत्म हो जाएगा। किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिलेगा, जबकि समिति के सदस्यों को भी लाभांश मिलेगा। सहकारिता के इतिहास में सरकार द्वारा उठाया गया यह बहुत बड़ा कदम है। इसके सकारात्मक परिणाम आने वाले दिनों में सामने आएंगे।
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सहकारी समितियों के हाथ में हो सरकारी योजनाओं का संचालन
सरकारी योजनाओं का लाभ गांव के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को भी मिल जाए, इसके लिए सरकार को सरकारी योजनाओं का संचालन सहकारी समितियों के माध्यम से करना चाहिए। मसलन, सरकार राशन वितरण का काम सहकारी समितियों को दे सकती है। इसी तरह से अन्य योजनाओं के संचालन की जिम्मेदारी भी सहकारी समितियों को दी जा सकती है। सहकारी समितियों का गांव में बड़ा नेटवर्क होता है, इसका लाभ सरकार अपनी योजनाओं के संचालन में ले सकती है। इसका प्रस्ताव भी सरकार को दिया गया है।
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यूरिया उत्पादन में आत्मनिर्भर हो रहा है भारत
देश में यूरिया की मांग 300 लाख टन प्रतिवर्ष की है। पहले इसका ज्यादातर हिस्सा दूसरे देशों से आयात किया जाता था, लेकिन अब देश में 250 लाख टन यूरिया का उत्पादन होने लगा है। आने वाले दिनों में मांग के अनुरूप यूरिया अपने देश में ही पैदा होने लगेगी। जबकि, प्रति वर्ष 150 लाख टन डीएपी की देश में मांग होती है। हालांकि, इसका ज्यादातर हिस्सा अब भी विदेशों से ही आ रहा है। इसकी वजह यहां कच्चे माल की उपलब्धता न होना है।
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तीन बायो एथेनॉल प्लांट शुरू कर रहा कृभको
कृभको देश में तीन बायो एथेनॉल प्लांट लगा रहा है। आने वाले दो महीनों में यह प्लांट शुरू हो जाएंगे और इनसे एक हजार केएलपीडी बायो एथेनॉल का उत्पादन प्रतिदिन होगा। यह प्लांट गुजरात के हजीरा, आंध्र प्रदेश के कृष्णपटनम और तेलंगाना के करीम नगर में बनाए जा रहे हैं। इन प्लांटों में किसानों के अनुपयुक्त चावल (टूटे चावल) और बाजरा से बायो एथेनॉल बनाया जाएगा। कृभको किसानों को उनकी उपज की अच्छी कीमत देगा और खुद भी लाभ हासिल करेगा। रोजगार की दिशा में भी यह बड़ा काम होगा। इसके अलावा डीएपी के उत्पादन के लिए प्लांट लगाने की योजना पर काम चल रहा है। यह प्लांट विदेश में भी लगाया जा सकता है।
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सहकारिता के प्रति किया जा रहा जागरूक
कृभको की ओर से देश के लोगों को सहकारिता के प्रति जागरूक किया जा रहा है। इसके लिए देश भर में ट्रेनिंग और एजूकेशन के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इसके जरिये लोगों में सहकारिता की समझ पैदा की जा रही है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इससे जुड़ें। सहकारिता ही एकमात्र ऐसा आंदोलन है, जो बगैर किसी भेदभाव के आगे बढ़ रहा है।
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झांसी। कृभको के चेयरमैन और अंतरराष्ट्रीय सहकारी संगठन के एशिया रीजन के अध्यक्ष डा. चंद्रपाल सिंह यादव ने कहा कि गांव और ग्रामीणों की खुशहाली का रास्ता सहकारिता से होकर गुजरता है। आने वाले दिनों में सहकारी समितियां गांवों की आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बनेंगी। इस दिशा में कोशिशें शुरू कर दीं गईं हैं। इसके अलावा उन्होंने कहा कि भारत का सहकारी आंदोलन दुनिया में सबसे बड़ा है। यहां आठ लाख सहकारी संस्थाएं काम कर रहीं हैं, जिनके 32 करोड़ ग्रामीण सदस्य हैं। ये ग्रामीण सीधे तौर पर सहकारिता से जुड़े हुए हैं। साथ ही कहा कि देश के 99 प्रतिशत गांवों में सहकारिता की पहुंच है। यह बात उन्होंने अमर उजाला से हुई खास बातचीत में कही।
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पहली बार सरकार ने समझा सहकारिता का महत्व
आजादी के बाद से अब तक पहली बार सरकार ने सहकारिता के महत्व को समझा है। इसका अलग मंत्रालय बनाया गया है। इसके अलावा अब तक सहकारी समितियां खाद-बीज के वितरण और किसानों को बैंकों से ऋण दिलाने भर तक सीमित थीं, लेकिन अब प्राथमिक सहकारी समितियों को 40 प्रकार के कामों के लिए अधिकृत किया गया है। सरकार के सहयोग से अब सहकारी समितियां कृषि उत्पाद खरीद सकेंगी, उनका भंडारण कर सकेंगी, साथ ही प्रोसेसिंग यूनिट भी स्थापित कर सकेंगी। इसके अलावा पेट्रोल पंप लगाने व गैस एजेंसी खोलने में भी सहकारी समितियों को प्राथमिकता दी जाएगी। सरकार की ओर से इसकी नियमावली समितियों को भेज दी गई है।
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सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर बनाईं तीन संस्थाएं
सहकारी आंदोलन को और मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर तीन सहकारी संस्थाओं का गठन किया है। इनमें से एक संस्था कृषि निर्यात का काम देखेगी, दूसरी अच्छे बीजों के उत्पादन पर काम करेगी, जबकि तीसरी संस्था ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने का काम करेगी। राष्ट्रीय स्तर की यह तीनों संस्थाएं पोर्टल के जरिये गांवों में मौजूद प्राथमिक सहकारी समितियों से सीधे तौर पर जुड़ी रहेंगी। इस प्रक्रिया में बिचौलियों का काम खत्म हो जाएगा। किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिलेगा, जबकि समिति के सदस्यों को भी लाभांश मिलेगा। सहकारिता के इतिहास में सरकार द्वारा उठाया गया यह बहुत बड़ा कदम है। इसके सकारात्मक परिणाम आने वाले दिनों में सामने आएंगे।
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सहकारी समितियों के हाथ में हो सरकारी योजनाओं का संचालन
सरकारी योजनाओं का लाभ गांव के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को भी मिल जाए, इसके लिए सरकार को सरकारी योजनाओं का संचालन सहकारी समितियों के माध्यम से करना चाहिए। मसलन, सरकार राशन वितरण का काम सहकारी समितियों को दे सकती है। इसी तरह से अन्य योजनाओं के संचालन की जिम्मेदारी भी सहकारी समितियों को दी जा सकती है। सहकारी समितियों का गांव में बड़ा नेटवर्क होता है, इसका लाभ सरकार अपनी योजनाओं के संचालन में ले सकती है। इसका प्रस्ताव भी सरकार को दिया गया है।
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यूरिया उत्पादन में आत्मनिर्भर हो रहा है भारत
देश में यूरिया की मांग 300 लाख टन प्रतिवर्ष की है। पहले इसका ज्यादातर हिस्सा दूसरे देशों से आयात किया जाता था, लेकिन अब देश में 250 लाख टन यूरिया का उत्पादन होने लगा है। आने वाले दिनों में मांग के अनुरूप यूरिया अपने देश में ही पैदा होने लगेगी। जबकि, प्रति वर्ष 150 लाख टन डीएपी की देश में मांग होती है। हालांकि, इसका ज्यादातर हिस्सा अब भी विदेशों से ही आ रहा है। इसकी वजह यहां कच्चे माल की उपलब्धता न होना है।
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तीन बायो एथेनॉल प्लांट शुरू कर रहा कृभको
कृभको देश में तीन बायो एथेनॉल प्लांट लगा रहा है। आने वाले दो महीनों में यह प्लांट शुरू हो जाएंगे और इनसे एक हजार केएलपीडी बायो एथेनॉल का उत्पादन प्रतिदिन होगा। यह प्लांट गुजरात के हजीरा, आंध्र प्रदेश के कृष्णपटनम और तेलंगाना के करीम नगर में बनाए जा रहे हैं। इन प्लांटों में किसानों के अनुपयुक्त चावल (टूटे चावल) और बाजरा से बायो एथेनॉल बनाया जाएगा। कृभको किसानों को उनकी उपज की अच्छी कीमत देगा और खुद भी लाभ हासिल करेगा। रोजगार की दिशा में भी यह बड़ा काम होगा। इसके अलावा डीएपी के उत्पादन के लिए प्लांट लगाने की योजना पर काम चल रहा है। यह प्लांट विदेश में भी लगाया जा सकता है।
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सहकारिता के प्रति किया जा रहा जागरूक
कृभको की ओर से देश के लोगों को सहकारिता के प्रति जागरूक किया जा रहा है। इसके लिए देश भर में ट्रेनिंग और एजूकेशन के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इसके जरिये लोगों में सहकारिता की समझ पैदा की जा रही है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इससे जुड़ें। सहकारिता ही एकमात्र ऐसा आंदोलन है, जो बगैर किसी भेदभाव के आगे बढ़ रहा है।