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बचपन के दोस्त को खोने का गम: 15 साल से थी दोस्ती, खेलते-खेलते चंद मिनटों में काल के गाल में समा गया था रविंद्र
Fri, 07 Nov 2025 04:03 PM IST
दीपक महाजन
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी
Published by: दीपक महाजन
Updated Fri, 07 Nov 2025 04:03 PM IST
सार
अभिषेक आर्या ने बताया कि वह पहले सीपरी बाजार थाने के पास रहते थे। 15 साल पहले नालगंज में रहने वाले रविंद्र की उनसे दोस्ती हुई और दोनों के बीच खासा याराना हो गया। वह मिलने, घूमने, खेलने के लिए अधिकतर साथ ही जाते थे।
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मृतक रविंद्र, फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
बचपन से साथ खेले और बड़े हुए। कोचिंग भी साथ गए और दोनों को अलग-अलग क्षेत्र में नौकरी का अवसर मिला। लेकिन, 15 साल में रोजाना साथ उठते बैठते कभी सोचा नहीं था कि एक दिन ऐसा भी समय आएगा कि साथ छूट जाएगा।
मून सिटी में रहने वाले रविंद्र अहिरवार के सबसे करीबी दोस्त अभिषेक आर्या ने बताया कि वह पहले सीपरी बाजार थाने के पास रहते थे। 15 साल पहले नालगंज में रहने वाले रविंद्र की उनसे दोस्ती हुई और दोनों के बीच खासा याराना हो गया। वह मिलने, घूमने, खेलने के लिए अधिकतर साथ ही जाते थे। दोनों ने नौकरी के लिए प्रयास किया। रविंद्र का चयन एलआईसी में और उनका एसबीआई में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर हो गया।
छुट्टी पर बनाया क्रिकेट खेलने का प्लान
नौकरी लगने के बाद भी दोनों मिले बगैर नहीं रहते थे। उन्होंने बताया कि बुधवार को गुरुनानक जयंती के कारण दोनों की छुट्टी थी। इसलिए मंगलवार की शाम दोनों ने अगली सुबह जीआईसी स्थित रानी लक्ष्मीबाई कॉम्प्लेक्स में क्रिकेट खेलने का प्लान बनाया। सुबह खेलने के लिए दोनों हंसी-खुशी मैदान पर पहुंचे। अभिषेक ने बताया कि उन्हें रविंद्र बिल्कुल स्वस्थ लग रहा था और मैदान पर बॉलिंग कर रहा था। एकाएक वह मैदान पर बेहोश हो गया और उनके अलावा मैदान पर मौजूद अन्य खिलाड़ियों को समझ नहीं आया कि आखिर ऐसा क्या हुआ? हड़बड़ी में जब अस्पताल लेकर पहुंचे तो चिकित्सकों के शब्द सुनकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि चंद मिनटों में उनका दोस्त काल के गाल में समा गया।
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अंतिम संस्कार के पहले बेहोश हुआ छोटा भाई, पिता घर पर हुए बेसुध
बृहस्पतिवार सुबह नौ बजे रविंद्र की अंतिम यात्रा नंदनपुरा मुक्तिधाम के लिए प्रस्थान की। इस दौरान मृतक के परिजन के अलावा रिश्तेदार, दोस्त, ऑफिस के अधिकारी-कर्मचारी के साथ आस पड़ोस के लोग मौजूद थे। भाई अरविंद को अंतिम संस्कार करना था। लेकिन, वह सदमे को सहन नहीं कर पाया और अंतिम संस्कार से पूर्व बेहोश हो गया। अंतिम यात्रा निकलने के बाद उसके पिता भी घर पर बेसुध हो गए।
मां शाम तक लगाए रही टकटकी
रविंद्र का अंतिम संस्कार होने के बाद चंद रिश्तेदार घर पर मौजूद थे। लेकिन, रविंद्र की मां दरवाजे पर बैठी रही। ऐसा लग रहा था कि मानो वह अपने बेटे के वापस आने का इंतजार कर रही हो। उनकी यह दशा देख परिजनों ने उन्हें सांत्वना देने का प्रयास किया पर मां अपने बेटे को खोने का गम भूल नहीं पा रही है।
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मून सिटी में रहने वाले रविंद्र अहिरवार के सबसे करीबी दोस्त अभिषेक आर्या ने बताया कि वह पहले सीपरी बाजार थाने के पास रहते थे। 15 साल पहले नालगंज में रहने वाले रविंद्र की उनसे दोस्ती हुई और दोनों के बीच खासा याराना हो गया। वह मिलने, घूमने, खेलने के लिए अधिकतर साथ ही जाते थे। दोनों ने नौकरी के लिए प्रयास किया। रविंद्र का चयन एलआईसी में और उनका एसबीआई में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर हो गया।
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छुट्टी पर बनाया क्रिकेट खेलने का प्लान
नौकरी लगने के बाद भी दोनों मिले बगैर नहीं रहते थे। उन्होंने बताया कि बुधवार को गुरुनानक जयंती के कारण दोनों की छुट्टी थी। इसलिए मंगलवार की शाम दोनों ने अगली सुबह जीआईसी स्थित रानी लक्ष्मीबाई कॉम्प्लेक्स में क्रिकेट खेलने का प्लान बनाया। सुबह खेलने के लिए दोनों हंसी-खुशी मैदान पर पहुंचे। अभिषेक ने बताया कि उन्हें रविंद्र बिल्कुल स्वस्थ लग रहा था और मैदान पर बॉलिंग कर रहा था। एकाएक वह मैदान पर बेहोश हो गया और उनके अलावा मैदान पर मौजूद अन्य खिलाड़ियों को समझ नहीं आया कि आखिर ऐसा क्या हुआ? हड़बड़ी में जब अस्पताल लेकर पहुंचे तो चिकित्सकों के शब्द सुनकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि चंद मिनटों में उनका दोस्त काल के गाल में समा गया।
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अंतिम संस्कार के पहले बेहोश हुआ छोटा भाई, पिता घर पर हुए बेसुध
बृहस्पतिवार सुबह नौ बजे रविंद्र की अंतिम यात्रा नंदनपुरा मुक्तिधाम के लिए प्रस्थान की। इस दौरान मृतक के परिजन के अलावा रिश्तेदार, दोस्त, ऑफिस के अधिकारी-कर्मचारी के साथ आस पड़ोस के लोग मौजूद थे। भाई अरविंद को अंतिम संस्कार करना था। लेकिन, वह सदमे को सहन नहीं कर पाया और अंतिम संस्कार से पूर्व बेहोश हो गया। अंतिम यात्रा निकलने के बाद उसके पिता भी घर पर बेसुध हो गए।
मां शाम तक लगाए रही टकटकी
रविंद्र का अंतिम संस्कार होने के बाद चंद रिश्तेदार घर पर मौजूद थे। लेकिन, रविंद्र की मां दरवाजे पर बैठी रही। ऐसा लग रहा था कि मानो वह अपने बेटे के वापस आने का इंतजार कर रही हो। उनकी यह दशा देख परिजनों ने उन्हें सांत्वना देने का प्रयास किया पर मां अपने बेटे को खोने का गम भूल नहीं पा रही है।