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Jhansi News: बामौर में प्राचीन कुओं का अस्तित्व संकट में
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संवाद न्यूज एजेंसी
बामौर। किसी जमाने में पूरे गांव की प्यास बुझाने वाले कुओं का अस्तित्व अब संकट में है। जल संकट से जूझने के बाद भी पानी के इन प्राचीन स्रोतों के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। बामौर में कई कुएं उपेक्षा के चलते जमींदोज हो चुके हैं। शेष बचे करीब आधा दर्जन कुओं के अस्तित्व पर संकट खड़ा हुआ है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार मुखिया का मीठा कुआं, बडगुलया का बड़ा कुआं, बड़े बगीचा का बडा कुआं, बापू का कुआं, कछुुवाह ठाकुरों का कुआं, बड़े स्कूल की कुइयां आदि पूरे गांव की प्यास बुझाया करते थे। सुबह से ही इन कुओं पर पानी भरने आने वाली महिलाओं की भीड़ जमा हो जाती थी। पहले पानी भरने को लेकर महिलाओं के मध्य कुओं पर झगड़े भी हो जाया करते थे। किसी का बर्तन, बाल्टी कुएं में गिर जाने पर कांटे वाले को बुलाया जाता था, जो कांटा डालकर उसमें बर्तन फंसाकर निकाला करता था। कुएं के पानी के सिर पर खेप रखकर महिलाएं गीत गाती हुईं अपने घरों को जाया करती थीं।
इतना ही नहीं, घर में किसी का जन्म होने पर या विवाह होने पर कुआं पूजन की रस्म भी इन्हीं कुओं पर होती थी। हालांकि, परंपरानुसार कुआं पूजन अब भी होता है, लेकिन इसके बाद कुओं की ओर ध्यान नहीं दिया जाता है। कुओं को उनके हाल पर छोड़ रखा गया है, जिससे अब यह अपना अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद करते नजर आते हैं। कुओं की चारदीवार क्षतिग्रस्त अवस्था में हैं। लगातार पानी की निकासी न होने की वजह से इनकी झिर भी कमजोर पड़ गई है और गंदगी भी जमा हो गई है। कुओं में झाड़ियां तक उग आईं हैं। यही हाल रहा तो यह प्राचीन कुएं कहानी-किस्सों में सिमट कर रह जाएंगे।
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बामौर। किसी जमाने में पूरे गांव की प्यास बुझाने वाले कुओं का अस्तित्व अब संकट में है। जल संकट से जूझने के बाद भी पानी के इन प्राचीन स्रोतों के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। बामौर में कई कुएं उपेक्षा के चलते जमींदोज हो चुके हैं। शेष बचे करीब आधा दर्जन कुओं के अस्तित्व पर संकट खड़ा हुआ है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार मुखिया का मीठा कुआं, बडगुलया का बड़ा कुआं, बड़े बगीचा का बडा कुआं, बापू का कुआं, कछुुवाह ठाकुरों का कुआं, बड़े स्कूल की कुइयां आदि पूरे गांव की प्यास बुझाया करते थे। सुबह से ही इन कुओं पर पानी भरने आने वाली महिलाओं की भीड़ जमा हो जाती थी। पहले पानी भरने को लेकर महिलाओं के मध्य कुओं पर झगड़े भी हो जाया करते थे। किसी का बर्तन, बाल्टी कुएं में गिर जाने पर कांटे वाले को बुलाया जाता था, जो कांटा डालकर उसमें बर्तन फंसाकर निकाला करता था। कुएं के पानी के सिर पर खेप रखकर महिलाएं गीत गाती हुईं अपने घरों को जाया करती थीं।
इतना ही नहीं, घर में किसी का जन्म होने पर या विवाह होने पर कुआं पूजन की रस्म भी इन्हीं कुओं पर होती थी। हालांकि, परंपरानुसार कुआं पूजन अब भी होता है, लेकिन इसके बाद कुओं की ओर ध्यान नहीं दिया जाता है। कुओं को उनके हाल पर छोड़ रखा गया है, जिससे अब यह अपना अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद करते नजर आते हैं। कुओं की चारदीवार क्षतिग्रस्त अवस्था में हैं। लगातार पानी की निकासी न होने की वजह से इनकी झिर भी कमजोर पड़ गई है और गंदगी भी जमा हो गई है। कुओं में झाड़ियां तक उग आईं हैं। यही हाल रहा तो यह प्राचीन कुएं कहानी-किस्सों में सिमट कर रह जाएंगे।
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