{"_id":"5c8d5d04bdec22145a0e9fd6","slug":"swarth-k-hote-sansarik-bandhan","type":"story","status":"publish","title_hn":"स्वार्थ के होते हैं सांसारिक बंधन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
स्वार्थ के होते हैं सांसारिक बंधन
Sun, 17 Mar 2019 02:01 AM IST
देवेंद्र कुमार
jhansi
jhansi
Published by: देवेंद्र कुमार
Updated Sun, 17 Mar 2019 02:01 AM IST
विज्ञापन
bhagwat katha
- फोटो : demo
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नगरा हाट के मैदान स्थित गांधी मंच में चल रही श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह के चौथे दिन आचार्य मनोज चतुर्वेदी ने मत्स्य अवतार, समुद्र मंथन, मोहिनी अवतार, गज ग्राह प्रसंग, राम अवतार और कृष्ण अवतार की कथा सुनाई।
उन्होंने कहा कि धरती पर अधर्म बढ़ने पर परमात्मा अवतार धारण कर पृथ्वी के कष्टों का हरण करते हैं। प्राणी मात्र को केवल परमात्मा पर ही विश्वास करना चाहिए। सांसारिक बंधन तो स्वार्थ पूर्ण होते हैं। ग्राह ने जब उपस्थित गजेंद्र को सरोवर में खींच लिया तो उस समय वहां पर उपस्थित गजेंद्र के परिवार ने भी उसकी कोई सहायता नहीं की। जब गजेंद्र ने परमात्मा का स्मरण किया और एक ही पल में गजेंद्र ने ग्राह से बचा लिया। बंधन मुक्त भी कर दिया। कथा व्यास ने कहा कि जीवन में कभी अभिमान नहीं करना है। ज्ञानी बनो पर अभिमानी मत बनो। विरोचन पुत्र राजा बलि ने सौ यज्ञ किए परंतु अभिमान हो गया। तब श्री हरि ने वामन रुप धारण किया और बलि की यज्ञशाला में प्रवेश कर गए। राजा बलि ने बड़ा स्वागत सम्मान किया। आने का कारण पूछा। प्रभु से बलि ने दक्षिणा मांगने को कहा। प्रभु ने तीन पग भूमि मांग ली। तीन पग में उन्होंने त्रिलोक को नाप लिया। कण तक नहीं छोड़ा। मतलब दान हमेशा श्रद्धा से करना चाहिए। अभिमान से नहीं। प्रभु का विराट देखकर बलि ने क्षमा मांगी।
उन्होंने कहा कि जो जीव प्रभु की बात रखते हैं। प्रभु उनके रक्षक द्वारपाल बन जाते हैं। अवतार संतों की रक्षा व दुष्टों का संहार करने आते हैं।
प्रारंभ में भागवत कथा का पूजन आरती हरगोविंद कुशवाहा, ठाकुर उदय सिंह राजपूत, योगेंद्र सिंह यादव, बबली, एके सिंह, मनोज संज्ञा, मैथिली मुदगिल, बृजेंद्र श्रीवास्तव, अर्पित दास, एसपी नामदेव, श्रवण तिवारी, अजय भार्गव ने की। संचालन सियाराम शरण चतर्वुेदी व आभार खूबीराम मिश्रा ने व्यक्त किया।
विज्ञापन
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि धरती पर अधर्म बढ़ने पर परमात्मा अवतार धारण कर पृथ्वी के कष्टों का हरण करते हैं। प्राणी मात्र को केवल परमात्मा पर ही विश्वास करना चाहिए। सांसारिक बंधन तो स्वार्थ पूर्ण होते हैं। ग्राह ने जब उपस्थित गजेंद्र को सरोवर में खींच लिया तो उस समय वहां पर उपस्थित गजेंद्र के परिवार ने भी उसकी कोई सहायता नहीं की। जब गजेंद्र ने परमात्मा का स्मरण किया और एक ही पल में गजेंद्र ने ग्राह से बचा लिया। बंधन मुक्त भी कर दिया। कथा व्यास ने कहा कि जीवन में कभी अभिमान नहीं करना है। ज्ञानी बनो पर अभिमानी मत बनो। विरोचन पुत्र राजा बलि ने सौ यज्ञ किए परंतु अभिमान हो गया। तब श्री हरि ने वामन रुप धारण किया और बलि की यज्ञशाला में प्रवेश कर गए। राजा बलि ने बड़ा स्वागत सम्मान किया। आने का कारण पूछा। प्रभु से बलि ने दक्षिणा मांगने को कहा। प्रभु ने तीन पग भूमि मांग ली। तीन पग में उन्होंने त्रिलोक को नाप लिया। कण तक नहीं छोड़ा। मतलब दान हमेशा श्रद्धा से करना चाहिए। अभिमान से नहीं। प्रभु का विराट देखकर बलि ने क्षमा मांगी।
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि जो जीव प्रभु की बात रखते हैं। प्रभु उनके रक्षक द्वारपाल बन जाते हैं। अवतार संतों की रक्षा व दुष्टों का संहार करने आते हैं।
प्रारंभ में भागवत कथा का पूजन आरती हरगोविंद कुशवाहा, ठाकुर उदय सिंह राजपूत, योगेंद्र सिंह यादव, बबली, एके सिंह, मनोज संज्ञा, मैथिली मुदगिल, बृजेंद्र श्रीवास्तव, अर्पित दास, एसपी नामदेव, श्रवण तिवारी, अजय भार्गव ने की। संचालन सियाराम शरण चतर्वुेदी व आभार खूबीराम मिश्रा ने व्यक्त किया।
विज्ञापन