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बीस साल बाद सूती मिल फिर शुरू होने की आस

Sun, 22 Apr 2018 02:02 AM IST
amarujala
amarujala Updated Sun, 22 Apr 2018 02:02 AM IST
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suti mil
up goverment, jhansi news - फोटो : demo
बीस साल से बंद पड़ी ग्वालियर रोड स्थित उत्तर प्रदेश राज्य वस्त्र निगम कताई मिल (सूती मिल) के फिर से शुरू होने की उम्मीद जगी है। उत्तर प्रदेश सहकारी कताई मिल्स संघ लिमिटेड ने उप्र राज्य औद्योगिक विकास निगम (यूपीएसआईडीसी) को सूती मिल में दुबारा उद्योग लगाने का प्रस्ताव भेजा है। इस पर सहमति भी बन गई है।
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सूती मिल की शुरुआत 1977 में हुई थी। यह बीस साल तक चली। मिल में बने धागे की बाजार में जबरदस्त मांग हुआ करती थी, जिसके चलते मिल तीन शिफ्टों में चौबीसों घंटे चलती थी। उत्पादन के चरम पर मिल में लगभग साढ़े चार हजार कर्मचारी काम करते थे। लेकिन, मिल के बंद होने की सुगबुगाहट के साथ कर्मचारियों की संख्या घटती गई। लगातार घाटे के चलते नवंबर 1977 में मिल में ताला पड़ गया।
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बंद होने के बाद से ही मिल चुनावों में मुद्दा बनी रही। नेताओं की ओर से जनता को मिल को दुबारा शुरू कराने का भरोसा मिलता रहा, लेकिन हालात नहीं बदले। लेकिन, अब उप्र सहकारी कताई मिल्स संघ ने इस दिशा में पहल की है। झांसी की सूती मिल समेत बंद पड़ीं प्रदेश की सात धागा और कपड़ा बनाने की मिलों में उद्योग लगाने का प्रस्ताव यूपीएसआईडीसी को भेजा है। यूपीएसआईडीसी ने इस पर सहमति भी जता दी है।
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छह अरब से अधिक है मिल की कीमत
छह माह पहले टेक्सटाइल्स कार्पोरेशन के प्रबंध निदेशक के नेतृत्व में तीन सदस्यीय टीम ने सूती मिल का निरीक्षण किया था। इस दौरान 76.69 एकड़ में फैली सूती मिल के आवासीय भवन, वर्कशॉप और खाली भूमि की कीमत का आकलन किया गया था। जिसमें भूमि की कीमत 5.75 अरब आंकी गई थी। जबकि, भवन, कॉलोनी आदि के निर्माण की कीमत 35 करोड़ रुपये आंकी गई थी। समिति द्वारा दी गई रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि मिल की मशीनरी में जंग लग चुका है, जिसे चालू करने में अधिक धनराशि खर्च होगी और आउटपुट बेहतर नहीं मिलेगा।


कर्मचारियों का 42 करोड़ है बकाया
सूती मिल के बंद होने के बाद से यहां के पूर्व कर्मचारी अपने बकाये की भुगतान की लड़ाई लड़ रहे हैं। पूर्व कर्मचारी ओ पी शर्मा ने बताया कि मिल बंद होने के समय यहां 2,346 कर्मचारी कार्यरत थे, लेकिन इनमें से 900 कर्मचारियों को ही प्रबंधन की ओर से वीआरएस दिया गया था। शेष 1,446 कर्मचारियों को सिर्फ छंटनी का मुआवजा ही मिला था। जबकि, सभी कर्मचारियों को वीआरएस दिया जाना चाहिए था। वीआरएस और ग्रेच्युटी का लाभ लेने के लिए कर्मचारी लगातार न्यायालय में लड़ाई लड़ रहे हैं। निचली अदालतों ने कर्मचारियों के हक में फैसला सुनाया है। मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन है।
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