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सूखे पर गंभीर नहीं हैं केंद्र व प्रदेश सरकारें: योगेंद्र

Wed, 01 Jun 2016 01:25 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Wed, 01 Jun 2016 01:25 AM IST
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state govts not serious on drought
yogendra yadav, jhandi hindi news - फोटो : demo
झांसी। जल हल यात्रा का मंगलवार को महोबा में समापन कर झांसी आए स्वराज अभियान के संयोजक योगेंद्र यादव ने पत्रकारों से कहा कि बुंदेलखंड के सूखे को केंद्र व प्रदेश सरकार गंभीरता से नहीं ले रही है। यहां मनरेगा हाशिए पर है और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का लाभ भी सूखाग्रस्त लोगों को नहीं मिल रहा है। मिड डे मील के नाम पर महज औपचारिकता का निर्वहन हो रहा है।
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उन्होंने कहा कि सूखाग्रस्त बुंदेलखंड में मनुष्य तो जैसे-तैसे काम चला ले रहे हैं, लेकिन पानी की कमी से यहां पशु दम तोड़ रहे हैं। उन्होंने उप्र व मध्य प्रदेश के हिस्सों में आने वाले बुंदेलखंड के सभी जनपदों को पर्याप्त व स्थलीय राहत दिलाने की मांग की।
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स्वराज अभियान के संयोजक योगेंद्र यादव के नेतृत्व में महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में लातूर से 21 मई को शुरू की गई जल हल पदयात्रा का मंगलवार को बुंदेलखंड के महोबा जिले में समापन कर दिया गया। यात्रा के समापन के बाद योगेंद्र यादव ने कहा कि केंद्र व राज्य सरकारें बुंदेलखंड के सूखे को गंभीरता से न लेकर महज औपचारिकताएं कर रहीं हैं।
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उन्होंने कहा कि मनरेगा के तहत मप्र में अप्रैल माह में महज 29 प्रतिशत कार्य हुआ, जबकि उप्र के बुंदेलखंड क्षेत्र के जिलों में 130 प्रतिशत कार्य कराया गया। मनरेगा का 12000 करोड़ रुपया केंद्र सरकार ने नहीं दिया तो प्रदेश सरकारों ने योजना बंद कर दी। जब पैसा आया तो काम पुन: चालू कर दिया गया।

इसी प्रकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लाभार्थियों को लाभ देने के बजाए उनका मजाक बनाया जा रहा है। कहीं राशन कार्ड नहीं है तो कहीं कार्ड में परिवार के सदस्यों की कम संख्या चढ़ाई गई है। अब बीपीएल परिवारों को बढ़ाने के बजाए उनकी छंटनी की जा रही है। उन्होंने मिड डे मील को भी निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि मिड डे मील योजना का लाभ जरूरतमंद बच्चों को नहीं मिल रहा है।


इसका उचित प्रचार-प्रसार न होने के कारण लोगों को स्कूल में भोजन मिलने की जानकारी नहीं है, क्योंकि वर्तमान में विद्यालय बंद हैं। शिक्षक भी यह कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं कि बच्चे नहीं आ रहे।

किसानों को मुआवजा नहीं मिल रहा। सरकारें उनके हिस्से का मुआवजा किश्तों में और बहुत मामूली दे रही हैं। इससे उनकी मदद नहीं हो पा रही, बल्कि
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